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भारत अंग्रेजों की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। भारतीय जनता का दमन करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने रॉलेट एक्ट बनाया था। महात्मा गांधी ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ अहिंसक सत्याग्रह का आह्वान किया था। इस सत्याग्रह की शुरुआत 6 अप्रैल 1919 को हड़ताल से हुई थी। इसके बाद 9 अप्रैल को ब्रिटिश सेना ने पंजाब में राष्ट्रवादी नेता डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू को बेवजह गिरफ्तार करके अज्ञात स्थान पर ले जाकर कैद कर दिया।
गोल्डन टेंपल के पास जलियांवाला बाग

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सत्यपाल और सैफुद्दीन की गिरफ्तारी से लोगों में आक्रोश फैल गया। 10 अप्रैल को विरोध स्वरूप हजारों भारतीय एकजुट होकर सड़कों पर उतरे और नारेबाजी की। विरोध प्रदर्शन कर दमन करने के लिए अंग्रेजों ने मार्शल लॉ लागू कर दिया और ब्रिगेडियर जनरल डायर को विरोध की आवाज दबाने का अधिकार दे दिया। लेकिन 13 अप्रैल को पंजाब के अमृतसर जिले में गोल्डन टेंपल के पास जलियांवाला बाग में हजारों लोग एकजुट हुए।
रॉलेट एक्ट के खिलाफ विरोध प्रदर्शन

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जलियांवाला बाग में लोग रॉलेट एक्ट के विरोध में एकजुट हुए थे, लेकिन जैसे ही जनरल डायर को मार्शल लॉ लागू होने के बावजूद लोगों के जुटने की खबर मिली, वह सैनिकों के साथ जलियांवाला बाग में पहुंचा। उसने बाग से निकलने का इकलौता रास्ता बंद करा दिया और निहत्थे भीड़ पर गोलीबारी का आदेश दिया। हंटर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार, जनरल डायल का आदेश मिलते ही सैनिकों ने 10 मिनट में करीब 1650 राउंड फायरिंग की।
कुएं में कूद गए थे महिलाएं और बच्चे

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प्रत्यक्षदर्शियों ने अपनी आंखों से जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार का खौफनाक मंजर देखा। जैसे ही गोलियां चली, बाग में जुटी भीड़ जाने बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगी। दीवारें इतनी ऊंची थी कि लोग उन्हें फांद नहीं पाए। आज भी जलियांवाला बाग की दीवारों पर गोलियां से हुए छेद देखे जा सकते हैं। महिलाएं अपनी और बच्चों की जान बचाने को कुंए में कूद गईं। वह कुंआ तो उस दिन लाशों से भर गया था, आज भी बाग में देखा जा सकता है।
हत्याकांड ने स्वतंत्रता संग्राम का रुख बदला

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13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में चली 1650 गोलियां की भयानक आवाजों ने धरती को ऐसे दहलाया कि लोगों की चीखें निकल गईं। खून से सनी दीवारें, लाशों से भरा कुंआ, गोलियों से छलनी महिलाओं, छोटे-छोटे बच्चों के शवों को देखकर लोगों के मन में बदले की भावना भड़की। जलियांवाला बाग हुए हत्याकांड ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को वो मोड़ दिया, जिसने अंग्रेजों की जड़ें हिला दीं और 1947 को भारत छोड़कर जाने के लिए मजबूर कर दिया।
गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया

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जलियांवाला बाग हत्याकांड राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के लिये असहयोग आंदोलन शुरू करने का कारण बन गया। हत्याकांड से व्यथित होकर गांधीजी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि त्याग दी। 18 अप्रैल 1919 को आंदोलन वापस ले लिया। रवींद्रनाथ टैगोर ने नाइटहुड की उपाधि लौटा दी। विरोध की ज्वाला बढ़ते देख ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिये हंटर आयोग का गठन किया, जिसकी 1920 में जारी हुई रिपोर्ट में जनरल डायर के कृत्यों की निंदा की गई, लेकिन दंडात्मक कार्रवाई की सिफारिश नहीं हुई।
ऊधम सिंह ने जनरल डायर का मर्डर किया

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राम मोहम्मद सिंह आजाद उर्फ ऊधम सिंह के सीने में जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला लेने की ज्वाला धधकती रही। वह जनरल डायर को मौत देने के प्रयास करने लगा, लेकिन भारतीयों का आक्रोश देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने जनरल डायर को लंदन भेज दिया था। ऊधम सिंह उसके पीछे-पीछे लंदन पहुंचे और गोलियां मारकर लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर की हत्या कर दी। ब्रिटिश सेना ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 1940 में फांसी पर चढ़ा दिया। 1974 में अंग्रेजों ने उनकी अस्थियां भारत को लौटाईं।