50, 100, 500 के नए नोट होंगे जारी! RBI खत्‍म कर सकता है कागज की करेंसी; जानें क्यों और क्या है प्लानिंग?

भारत में 50-100 और 500 के नए नोट जारी हो सकते हैं। क्योंकि रिजर्व बैंक एक नई करेंसी लॉन्च करने की तैयारी में है। यह करेंसी दुनियाभर के करीब 60 देशों में प्रचलित है और अब इसे भारत में भी चलन में लाने की योजना है। आइए इस करेंसी के बारे में और इसके फायदे जानते हैं...

Indian Currency
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देश में कैश की मांग बढ़ती जा रही है। UPI पेमेंट और ऑनलाइन ट्रांजेक्शन के लिए भी कैश की ज्यादा जरूरत पड़ने लगी है। इसलिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने प्लास्टिक या पॉलीमर के नोट छापने और इन्हें चलन में लाने की योजना पर फिर से काम करना शुरू कर दिया है और जल्दी ही एक पायलट प्रोजेक्ट शुरू हो सकता है। रिजर्व बैंक की पटना और मुंबई में हुई बोर्ड मीटिंग में प्लास्टिक के नोट वाले प्रोजेक्ट पर विस्तार से चर्चा की गई है।

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क्यों लागू करने हैं प्लास्टिक के नोट?

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सूत्रों के अनुसार, प्लास्टिक के नोटों को छापने में कम लागत लगती है और यह नोट टिकाऊ भी हैं। इसलिए RBI भारत में भी प्लास्टिक के नोट जारी करना चाहता है। क्योंकि भारत नई टेक्नोलॉजी अपना रहा है तो नई करेंसी अपनाकर भारत खुद को 2047 के विकसित भारत के रूप में पेश करना चाहता है। प्लास्टिक के नोटों को ATM से आसानी से निकालने के लिए मशीन को अपग्रेड करने की योजना भी इस प्रोजेक्ट में है।

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पुराने नोट क्यों बदला चाहता है RBI?

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RBI के अनुसार, कागज के नोट ज्यादा साल नहीं चल पाते। वे गंदे हो जाते हैं और फट भी जाते हैं। गंदे और फटे हुए होने की वजह से वे चलन से बाहर हो जाते है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में करीब 23.8 अरब के नोट नष्ट करने पड़े, जबकि साल 2023-24 में 21.24 अरब के नोट नष्ट किए गए थे। सबसे ज्यादा नोट 500 और 100 रुपये के थे। इतनी करेंसी को पहले छापना, फिर नष्ट कर देने से सरकारी खर्च पर बढ़ता है। क्योंकि वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने में 6372.8 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। प्लास्टिक के नोट छपने से यह लागत कम होगी।

2012 में फेल हो चुका एक ट्रायल

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बता दें कि प्लास्टिक के नोट जारी करने का एक ट्रायल फेल हो चुका है। साल 2012 में रिजर्व बैंक ने 1 अरब के प्लास्टिक के 10 रुपये के नोट जारी करने का फैसला किया था, लेकिन ATM मशीनों और बैंकों में टेक्निकल प्रॉब्लम के कारण इस ट्रायल को रोक दिया गया था। लेकिन अब ATM मशीनों को नए टूल्स के साथ अपग्रेड करने के बाद ही प्लास्टिक नए नोट जारी किए जाएंगे। मशीनों में प्लास्टिक नोट से जुड़े टूल्स शामिल करने के लिए उन देशों के साथ डील की जा सकती हैं, जो पहले से ही प्लास्टिक के नोट इस्तेमाल कर रहे हैं।

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दुनिया के 60 देशों में प्लास्टिक नोट

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बता दें कि दुनियाभर के 60 देशों में पॉलिमर या प्लास्टिक के नोट चलन में हैं। ऑस्ट्रेलिया में 1988 में पहली बार प्लास्टिक का 10 डॉलर का नोट जारी हुआ था। उसके बाद इस करेंसी को सिंगापुर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, मलेशिया, रोमानिया और कनाडा ने अपनाया। यूरोप में रोमानिया ने 1998 में सबसे पहले प्लास्टिक नोट चलाया, जबकि कनाडा ने 2011 में इस करेंसी को अपने देश में चलाया। हालांकि अमेरिकी डॉलर अभी भी कपास और लिनन के मिक्सचर से बनाया जाता है, लेकिन भारत प्लास्टिक के नोट जारी करके अमेरिका को भी पीछे छोड़ सकता है।

नोटबंदी के बाद जारी हुए थे नए नोट

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बता दें कि भारत में मोदी सरकार ने नोटबंदी की थी। 10, 20, 50, 100, 500 के पुराने नोट बंद करके नए नोट जारी किए थे, जो साइज में छोटे हैं, लेकिन नए डिजाइन के साथ हैं। सरकार ने 2000 का गुलाबी रंग का नोट भी जारी किया था, लेकिन प्रचलित न होने के कारण उन्हें बंद कर दिया गया था। अब केंद्र सरकार रिजर्व बैंक के साथ मिलकर कागज की पुरानी करेंसी को खत्म करके प्लास्टिक के नोट जारी करना चाहती है।

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

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खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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