जब देश की अर्थव्यवस्था सुपरफास्ट स्पीड से दौड़ रही हो, तो आमतौर पर उसकी करेंसी भी सीना तानकर मजबूत खड़ी होती है. लेकिन भारतीय रुपये के साथ यह लॉजिक उलटा बैठ रहा है. एक तरफ भारत की आर्थिक विकास दर (GDP Growth) चीन से भी तेज है, तो दूसरी तरफ डॉलर के सामने रुपया लगातार घुटने टेक रहा है.
12 साल में कितना लुढ़का रुपया

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आज हालत यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के सफर में रुपया 58.94 से लुढ़ककर करीब 96 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है- यानी कुल 62.33% की भारी गिरावट! हालांकि, रुपये के टूटने का इतिहास पुराना है; मनमोहन सिंह के 10 वर्षों के राज में भी यह 31.65% गिरा था। लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि जब भारत का रुपया साल-दर-साल कमजोर हो रहा है, तब हमारे आस-पास के कई एशियाई देशों की मुद्राएं डॉलर को आंखें दिखा रही हैं। आइए समझते हैं कि बाकी देशों की तिजोरी में ऐसा कौन सा जादू चल रहा है, जो भारत के पास मिसिंग है.
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मलेशिया का रिंगिट: विदेशी निवेशकों का नया क्रश

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जहां पिछले साल भारत का रुपया 4.40% टूटा, वहीं मलेशिया का रिंगिट 9.25% मजबूत होकर सात साल के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया। मलेशिया की इस छलांग के पीछे उसका करंट अकाउंट सरप्लस (कमाई ज्यादा, खर्च कम), मजबूत घरेलू बाजार और 2025 में रही 4.9% की शानदार जीडीपी ग्रोथ है। अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर का मलेशिया ने बखूबी फायदा उठाया। उसने चीन, यूरोपीय संघ और मिडिल-ईस्ट के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए, जिससे विदेशी निवेश (FDI) की ऐसी बाढ़ आई कि तीसरी तिमाही में यह 1.6 अरब से सीधे 8.5 अरब रिंगिट पहुंच गया।
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थाईलैंड का बाट्स: इलेक्ट्रॉनिक्स और ट्रेड सरप्लस का बूस्टर

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थाईलैंड की मुद्रा बाट पिछले एक साल में डॉलर के मुकाबले 10% से अधिक मजबूत होकर जून 2021 के बाद के अपने सबसे बेस्ट लेवल (प्रति डॉलर 31 से नीचे) पर आ गई। थाईलैंड की उदार मौद्रिक नीति के बावजूद, अमेरिका के साथ उसका व्यापार सरप्लस (Trade Surplus) 35.6 अरब डॉलर से छलांग लगाकर 51.3 अरब डॉलर पहुंच गया। इसमें सबसे बड़ा रोल थाईलैंड के धांसू इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट का रहा।
सिंगापुर डॉलर: एआई (AI) की लहर पर सवार

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सिंगापुर की करेंसी पिछले पांच महीनों में करीब 1% मजबूत हुई है और अब एक अमेरिकी डॉलर के लिए सिर्फ 1.28 सिंगापुर डॉलर देने होते हैं। पूरी दुनिया में आए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बूम ने सिंगापुर की लॉटरी लगा दी है। इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में 66.7% की रेकॉर्ड छलांग की बदौलत पहली तिमाही में सिंगापुर की जीडीपी ग्रोथ अनुमान (4.6%) को पछाड़ते हुए 6% पर जा पहुंची।
चीन का युआन: जानबूझकर कमजोर, फिर भी सबसे मजबूत

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चीन की करेंसी रेनमिन्बी (युआन) डॉलर के मुकाबले तीन साल के सबसे मजबूत स्तर (6.84) पर आ टिकी है। अमेरिका और यूरोप हमेशा चिल्लाते हैं कि चीन ग्लोबल मार्केट पर कब्जा बनाए रखने के लिए अपनी करेंसी को जानबूझकर कमजोर रखता है (गोल्डमैन सैक्स के अनुसार यह अब भी 20% अंडरवैल्यू है)। पिछले साल यूरो के मुकाबले 8% कमजोर रहकर चीन ने यूरोपीय संघ में रिकॉर्ड एक्सपोर्ट कर डाला।
सरप्राइज पैकेज: पाकिस्तान का रुपया भी हुआ स्थिर!

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जहां भारतीय रुपया इस साल 6% से ज्यादा गिरा है, वहीं कंगाली के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान का रुपया पिछले छह महीनों में 1.31% मजबूत हुआ है (फिलहाल ₹278 प्रति डॉलर)। यह मजबूती कोई बहुत बड़े आर्थिक सुधार से नहीं, बल्कि बाहरी परिस्थितियों के सपोर्ट से आई है। मार्च तिमाही में पाकिस्तान को करंट अकाउंट सरप्लस मिला, सऊदी अरब से वित्तीय मदद आई और चार साल बाद उसने यूरोबॉन्ड मार्केट में वापसी की, जिससे निवेशकों का डर थोड़ा कम हुआ।
तो फिर भारत का रुपया बीमार क्यों है?

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पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम और अर्थशास्त्रियों की मानें तो रुपये की इस बीमारी के पीछे केवल वर्तमान में चल रहा ईरान युद्ध या मिडिल-ईस्ट संकट ही एकमात्र विलेन नहीं है. इसके पीछे कुछ अंदरूनी और कुछ बाहरी बड़े झटके हैं:
डोनाल्ड ट्रंप का टैरिफ बम: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय सामानों पर लगाए गए भारी आयात शुल्क ने भारतीय एक्सपोर्ट को तगड़ी चोट पहुंचाई।
विदेशी निवेशकों का पलायन (FII Outflow): गिरते रुपये के डर से वैश्विक निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड 23 अरब डॉलर की पूंजी निकालकर बाहर बेच डाली। जब देश से डॉलर इतनी तेजी से बाहर भागेगा, तो रुपये का गिरना लाजमी है। आरबीआई के आक्रामक हस्तक्षेप भी इसे पूरी तरह नहीं थाम पा रहे हैं।
रुपया गिरने के नुकसान (The Bad)

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महंगाई की मार: कच्चा तेल, रसोई गैस, फर्टिलाइजर और इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात महंगा हो जाता है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर सामान बाहर से डॉलर में खरीदता है।
विदेशी निवेशकों का डर: रिटर्न कम होने के डर से विदेशी फंड्स भारतीय बाजार से दूरी बनाने लगते हैं, जिससे चालू खाता घाटा (CAD) संभालना मुश्किल होता है।
रुपये के गिरने के फायदा

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एक्सपोर्टर्स की चांदी: कमजोर रुपये के कारण विदेशों में भारतीय सामान और सेवाएं सस्ती व अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाती हैं, जिससे ब्रिटेन जैसे देशों के साथ नए ट्रेड डील में मदद मिल सकती है।
रेमिटेंस का बंपर फायदा: विदेशों (खासकर खाड़ी देशों) में काम करने वाले भारतीय जब डॉलर घर भेजते हैं, तो उनके परिवारों को हर डॉलर के बदले ज्यादा रुपये मिलते हैं (मार्च 2025 तक भारत को रिकॉर्ड 135 अरब डॉलर का रेमिटेंस मिला)।