सत्यजीत रे भारतीय सिनेमा के कीमती रत्न के समान हैं, जिनके योगदानों ने बॉलीवुड का अलग स्तर दिया. उनकी आखिरी फिल्म ने यह साबित कर दिया, कि 1992 में भारत ने फिल्म जगत के एक हीरे को खो दिया है.
सत्यजीत रे की आखिरी फिल्म

2 / 8
'अगंतुक' (Agantuk) सत्यजीत रे के निर्देशन में बनी आखिरी फीचर फिल्म है, जो आधुनिक समाज के अंधविश्वास, अविश्वास और खोखलेपन को बहुत ही संजीदगी से पर्दे पर उतारती है. साल 1991 में बनी इस फिल्म ने दर्शकों को अलग नजरिया दिया था.
फिल्म की खासियत

3 / 8
सत्यजीत रे की इस फिल्म की खासियत थी कि कैसे इंसानी फितरत समय समय पर बदलती रहती है. भरोसा सिर्फ शब्द मात्र रह जाता है. साल 1991 की इस फिल्म को सिनेमा प्रेमियों ने खूब सराहा.
फिल्म 'अगंतुक' की उपलब्धियां

4 / 8
साल 1992 के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में इस फिल्म ने धूम मचाई थी. इसे सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म (Best Feature Film) का सबसे बड़ा पुरस्कार मिला और खुद सत्यजीत रे को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक (Best Director) के नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया था.
शहरी समाज का अंधविश्वास

5 / 8
यह फिल्म खौफनाक सच दिखाती है कि कैसे आधुनिक, पढ़ा-लिखा शहरी समाज कागजों, पासपोर्ट और वसीयत के 'अंधविश्वास' में इस कदर जकड़ा हुआ है कि वह सामने दिख रही सादगी और इंसानियत पर भरोसा ही नहीं कर पाता.
सोच की संकीर्णता

6 / 8
सुधीर और उसके दोस्त उस मेहमान को चोर-उच्चक्का साबित करने के लिए किसी भी हद तक गिर जाते हैं. उनके भीतर का यह अविश्वास किसी खौफनाक सामाजिक बीमारी की तरह नजर आता है.
आदिवासी बनाम सभ्य दुनिया

7 / 8
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष तब सामने आता है जब मुख्य किरदार मनमोहन मित्रा बताते हैं कि शहरों में रहने वाले तथाकथित 'सभ्य' लोग अंधविश्वासी और शकी होते हैं, जबकि जंगलों के आदिवासियों के मन में कोई कपट नहीं होता.
फिल्म 'अगंतुक' (द स्ट्रेंजर) की रेटिंग

8 / 8
सत्यजीत रे की इस आखिरी फिल्म को 8 IMDb रेटिंग भी मिली है. इसे आप YouTube पर देख सकते हैं. अगर आप सिनेमा प्रेमी हैं, तो सत्यजीत रे की यह कल्ट क्लासिक आपको जरूर पसंद आएगी.