आज जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होने पर चर्चा होती है, तब कई लोग इसे अर्थव्यवस्था की नाकामी मानते हैं. लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत ने एक बार रुपए को जानबूझकर काफी कमजोर किया था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में सरकार ने रुपए का 36.5 प्रतिशत अवमूल्यन कर दिया. इस फैसले ने न सिर्फ देश में तीखी बहस छेड़ दी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी प्रभावित किया.
कब गिराई गई थी रुपये की वैल्यू?

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6 जून 1966 को इंदिरा गांधी सरकार ने रुपए का भारी अवमूल्यन किया. एक डॉलर की कीमत 4.76 रुपये से बढ़कर 7.50 रुपये हो गई. इस फैसले से रुपया 36.5 प्रतिशत कमजोर हुआ, जबकि डॉलर की ताकत रुपये के मुकाबले 57.4 प्रतिशत बढ़ गई. यह फैसला भारत के इतिहास में सबसे विवादास्पद आर्थिक निर्णयों में से एक माना जाता है.
क्या था रुपये की वैल्यू गिराने का कारण?

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अवमूल्यन का मुख्य कारण भारत की गंभीर आर्थिक स्थिति थी. 1962 में चीन के साथ युद्ध और 1965 में पाकिस्तान से लड़ाई के बाद देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गई थी. भयंकर सूखे ने खाद्यान्न उत्पादन को बुरी तरह प्रभावित किया, जिसके चलते भारत को पहली बार बड़े पैमाने पर गेहूं और चावल आयात करने पड़े.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार

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उस समय भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बेहद कम हो गया था. 1965 में आयात 2,194 करोड़ रुपये का था, जबकि निर्यात सिर्फ 1,264 करोड़ रुपये का. व्यापार घाटा 930 करोड़ रुपये तक पहुंच गया. विश्व बैंक और अमेरिका के दबाव में इंदिरा गांधी को यह कदम उठाना पड़ा, क्योंकि विदेशी सहायता के बिना खाद्यान्न संकट का सामना करना मुश्किल था.
अमेरिका ने कैसे उतारा अहसान?

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अमेरिका ने इस अवमूल्यन के बाद भारत को भारी मदद दी. लगभग 1.6 करोड़ टन गेहूं, 10 लाख टन चावल और करीब एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई गई. लेकिन इस मदद को स्वीकार करने का फैसला इंदिरा गांधी के लिए राजनीतिक रूप से काफी महंगा साबित हुआ.
सोवियत संघ हो गया था नाराज

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सोवियत संघ इस फैसले से बेहद नाराज हुआ. सोवियत नेता एलेक्सी कोस्यगिन ने इसे 'बड़ी भूल' बताया. मॉस्को में भारतीय राजदूत को समझाने की कोशिश में 'बहरों के बीच संवाद' जैसी स्थिति बन गई. सोवियत संघ को आशंका थी कि भारत अमेरिकी खेमे की ओर झुक रहा है.
इंदिरा के फैसले की तीखी आलोचना

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देश में इस फैसले की तीखी आलोचना हुई. कांग्रेस के अंदर भी विरोध हुआ. तत्कालीन वाणिज्य मंत्री मनुभाई शाह ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह 'स्वतंत्रता के बाद की सबसे बड़ी गलती' है. उन्होंने अवमूल्यन से पहले वाली निर्यात सब्सिडी को फिर से बहाल कर दिया, जिससे अवमूल्यन का मूल मकसद कमजोर पड़ गया.
क्या सही था इंदिरा का फैसला?

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हालांकि कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह फैसला जरूरी था. अवमूल्यन के बाद निर्यात बढ़ा और व्यापार घाटा काफी कम हुआ. टीएन निनान जैसे विश्लेषकों ने लिखा कि मध्यम अवधि में इस कदम ने सकारात्मक प्रभाव दिखाया, हालांकि तत्कालीन राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण यह विवादास्पद बना रहा.