यह दिमागी नक्सल सीरीज का भाग 3 है. यहां पढ़ें भाग-1 और भाग-2
अगर किसी शब्द का अर्थ साफ है तो वह बहस को समझने में मदद करता है लेकिन अगर उसका अर्थ हर व्यक्ति अपनी सुविधा के हिसाब से तय करने लगे तो वही शब्द बहस को खत्म करने का हथियार भी बन सकता है. 'दिमागी नक्सल' के साथ भी यही सवाल खड़ा होता है. क्या इसका मतलब उस व्यक्ति से है जो हिंसक नक्सलवाद को वैचारिक रूप से सही मानता है? या उस व्यक्ति से जो सरकार की आलोचना करता है? क्या वह व्यक्ति भी इसके दायरे में आएगा जो आदिवासी अधिकारों की बात करता है, सुरक्षा बलों की किसी कार्रवाई पर सवाल उठाता है या पूंजीवाद की आलोचना करता है? अगर इन सभी सवालों का जवाब हां है, तो शब्द इतना व्यापक हो जाएगा कि लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच का फर्क ही मिट जाएगा.
---विज्ञापन---
लेकिन दूसरी तरफ एक दूसरी अतिशयोक्ति भी उतनी ही खतरनाक है. सिर्फ इसलिए कि किसी व्यक्ति के हाथ में बंदूक नहीं है, उसके विचारों की जांच बंद नहीं की जा सकती. अगर कोई व्यक्ति खुले तौर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म करने की बात करता है, चुनाव को निरर्थक बताता है, संविधान को अस्वीकार करता है और हिंसा के जरिए सत्ता पर कब्जे को सही मानता है, तो इसे केवल ‘सरकार से असहमति’ कहकर छोड़ देना भी सही नहीं होगा. विचारों की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है, लेकिन हिंसा को राजनीतिक साधन के रूप में सही ठहराना एक अलग सवाल है. इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ की बहस में सबसे पहली जरूरत किसी को दोषी या निर्दोष घोषित करने की नहीं, बल्कि इन दोनों स्थितियों के बीच फर्क करने की है.
सरकार की आलोचना लोकतंत्र विरोधी नहीं है बल्कि लोकतंत्र में सरकार की आलोचना जरूरी है. कोई नागरिक कहता है कि सरकार की आर्थिक नीति गलत है, बेरोजगारी बढ़ रही है, किसानों के साथ अन्याय हुआ है, किसी कानून से नागरिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं या किसी आदिवासी क्षेत्र में प्रशासन ने गलत कार्रवाई की है तो उसका सवाल अपने आप में नक्सलवाद या दिमागी नक्सल नहीं हो जाता. सरकार और राज्य एक ही चीज नहीं हैं क्योंकि सरकार बदल सकती है, नीति बदल सकती है, कानून बदला जा सकता है. लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था इसी संभावना पर टिकी है कि जनता अपनी सरकार से सवाल कर सकती है और जरूरत पड़ने पर उसे बदल सकती है.
---विज्ञापन---
इसलिए सरकार की आलोचना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को खत्म करने की इच्छा के बीच फर्क करना जरूरी है. एक व्यक्ति कहता है कि सरकार गलत है और दूसरी सरकार आनी चाहिए. दूसरा व्यक्ति कहता है कि सरकारें बदलने का पूरा लोकतांत्रिक तरीका ही गलत है और सत्ता बंदूक के जरिए बदली जानी चाहिए. दोनों को सिर्फ इसलिए एक नहीं किया जा सकता कि दोनों मौजूदा सरकार से असहमत हैं. असहमति का स्तर और उसका उद्देश्य अलग हो सकता है, उसका तरीका अलग हो सकता है और उसका लोकतंत्र के प्रति रवैया बिल्कुल अलग हो सकता है.
यही वह जगह है जहां ‘विचार’ और ‘विचारधारा’ के बीच भी फर्क करना पड़ता है. किसी व्यक्ति के मन में व्यवस्था को लेकर असंतोष हो सकता है. वह क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित हो सकता है. वह मार्क्स पढ़ सकता है, माओ पढ़ सकता है, समाजवाद या साम्यवाद में विश्वास कर सकता है. लेकिन सिर्फ किसी किताब को पढ़ लेना या किसी विचारधारा से प्रभावित होना किसी व्यक्ति को हिंसक संगठन का समर्थक नहीं बना देता. लोकतंत्र में विचारों का आना कोई अपराध नहीं है. भारत में वामपंथी दल चुनाव लड़ते हैं, सरकारें चलाते हैं, संसद में बैठते हैं और लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हैं, इसलिए वामपंथ और नक्सलवाद को एक ही मान लेना इतिहास और राजनीति दोनों को बहुत सरल बना देना होगा.
---विज्ञापन---
फिर सवाल उठता है कि असली सीमा कहां है?
शायद इसका उत्तर किसी व्यक्ति के राजनीतिक रंग में नहीं, बल्कि उसके लोकतंत्र और हिंसा के प्रति रवैये में छिपा है. क्या वह चुनाव को स्वीकार करता है? क्या वह संविधान में विश्वास करता है? क्या वह सत्ता परिवर्तन के लोकतांत्रिक रास्ते को स्वीकार करता है? क्या वह अपने विरोधी को बोलने का अधिकार देता है? क्या वह हिंसा को राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने का वैध साधन मानता है? क्या वह निर्दोष लोगों की हत्या को किसी बड़े राजनीतिक उद्देश्य के नाम पर उचित ठहरा सकता है? ये सवाल किसी भी विचारधारा पर समान रूप से लागू होने चाहिए और यहीं एक असहज लेकिन जरूरी सवाल सामने आता है कि क्या यही कसौटी दक्षिणपंथ पर भी लागू होगी?
अगर ‘दिमागी नक्सल’ का अर्थ केवल इतना है कि कोई व्यक्ति विचार के जरिए समाज को बदलना चाहता है, तो फिर यह कसौटी सिर्फ वामपंथ तक सीमित नहीं रह सकती. दक्षिणपंथ भी समाज को एक खास दिशा में ले जाना चाहता है. उसके पास अपने विचार हैं, संगठन हैं, सामाजिक अभियान हैं, साहित्य है, राजनीतिक लक्ष्य हैं और समाज को प्रभावित करने की कोशिश है. दक्षिणपंथ भी चाहता है कि उसकी विचारधारा समाज की सोच और राजनीति को प्रभावित करे. तो क्या विचार के जरिए समाज बदलने की कोशिश को ही ‘दिमागी नक्सल’ कहा जा सकता है? जाहिर है, नहीं लेकिन फिर फर्क कहां है?
---विज्ञापन---
पार्ट - 1 यहां पढ़ें : ‘दिमागी नक्सल’ आखिर कौन? समझिए असहमति और उग्र विचारधारा के बीच की पतली रेखा
---विज्ञापन---
यही सवाल इस पूरी बहस को एक महत्वपूर्ण दिशा देता है. विचार का राजनीतिक लक्ष्य कुछ भी हो सकता है जैसे कोई समाजवाद चाहता है, कोई पूंजीवाद, कोई सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, कोई उदार लोकतंत्र, कोई अधिक राज्य नियंत्रण चाहता है और कोई कम राज्य नियंत्रण और लोकतंत्र की खूबसूरती है कि वह इन विचारों के बीच प्रतिस्पर्धा की अनुमति देता है. असली समस्या तब पैदा होती है जब कोई विचार यह कहने लगे कि दूसरे विचार को अस्तित्व का अधिकार ही नहीं है और उसे खत्म करने के लिए हिंसा जायज है इसलिए किसी विचार को उसके नाम से नहीं, उसके तरीकों से भी परखना होगा.
यही बात नक्सलवाद पर भी लागू होती है. अगर कोई व्यक्ति आदिवासी अधिकारों की बात करता है, तो उससे पूछा जा सकता है कि वह उन अधिकारों को कैसे हासिल करना चाहता है. अगर वह लोकतांत्रिक आंदोलन, कानूनी लड़ाई, जनसंगठन और राजनीतिक दबाव की बात करता है, तो यह एक रास्ता है. अगर वह बंदूक के जरिए राज्य को उखाड़ फेंकने की बात करता है, तो यह दूसरा रास्ता है और यह जाहिर सी बात है कि दोनों को एक ही नाम देना सही नहीं होगा.
इसी तरह अगर कोई दक्षिणपंथी व्यक्ति समाज को बदलना चाहता है, तो उससे भी वही सवाल पूछा जा सकता है. क्या वह चुनाव और संविधान को स्वीकार करता है? क्या वह दूसरे धर्म, दूसरे विचार या दूसरे राजनीतिक मत रखने वाले लोगों के अधिकार को स्वीकार करता है? क्या वह राजनीतिक हिंसा को सही मानता है? अगर कसौटी समान है, तभी बहस निष्पक्ष होगी और यही लोकतंत्र की असली परीक्षा है. किसी विचारधारा को उसके नाम से नहीं, उसके व्यवहार से परखना. क्योंकि सिर्फ वामपंथ, दक्षिणपंथ, राष्ट्रवाद, समाजवाद या क्रांति जैसे शब्द अपने आप में किसी विचार को लोकतांत्रिक या अलोकतांत्रिक नहीं बना देते. सवाल यह है कि वह विचार सत्ता, कानून, नागरिक स्वतंत्रता और असहमति के साथ कैसा संबंध बनाता है.
लेकिन यहां एक और सावधानी जरूरी है कि लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि हर विचार को सही मान लिया जाए. लोकतंत्र आपको विचार रखने का अधिकार देता है, लेकिन वह आपको अपने विचार के हर परिणाम से मुक्त नहीं करता. अगर कोई व्यक्ति हिंसा को बढ़ावा देता है, निर्दोष लोगों को मारने को उचित बताता है या सशस्त्र संगठन के जरिए राज्य को गिराने की कोशिश करता है, तो कानून की भूमिका सामने आएगी. किसी विचार का राजनीतिक उद्देश्य उसे कानून से ऊपर नहीं कर देता.
यही कारण है कि दिमागी नक्सल जैसे शब्द का इस्तेमाल करते समय सबसे बड़ी सावधानी उसकी परिभाषा को लेकर होनी चाहिए कि अगर यह शब्द हिंसक नक्सलवाद के वैचारिक समर्थन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, तो उसे स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए और अगर इसका इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया जा रहा है जो केवल सरकार की आलोचना करते हैं, तो यह लोकतांत्रिक असहमति को अपराध की भाषा में बदल देगा और दोनों के बीच का फर्क सिर्फ शब्दों का फर्क नहीं है. यह लोकतंत्र की बुनियादी संरचना का फर्क है.
यहीं फिर सुकरात याद आता है कि उसके पास कोई सेना नहीं थी. वह सत्ता पर कब्जा करने नहीं निकला था. वह लोगों से सवाल पूछता था. उसका तरीका यह था कि सामने वाले के दावे को सवालों के जरिए जांचो. आज की लोकतांत्रिक राजनीति में भी इस तरीके की जरूरत है. सरकार से सवाल हो तो पूछा जाए कि, क्यों? नक्सली हिंसा के समर्थक से सवाल हो तो पूछा जाए, क्यों? किसी विचारधारा के समर्थक से सवाल हो तो पूछा जाए,क्यों? किसी नीति के विरोधी से भी सवाल हो, क्यों? यानी लोकतंत्र में सवाल किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं हो सकता.
भारत की अपनी बौद्धिक परंपरा भी यही बताती है. यहां शास्त्रार्थ हुआ, बहस हुई, मतभेद हुए. उपनिषदों में सवाल पूछे गए. बुद्ध के सामने प्रश्न रखे गए. चार्वाक ने उन मान्यताओं को चुनौती दी जिन्हें बहुत से लोग अंतिम सत्य मानते थे. अलग-अलग दर्शन एक-दूसरे से असहमत रहे. इसका मतलब यह नहीं कि हर विचार सही था. इसका अर्थ यह है कि विचारों को परखा गया, उनसे बहस हुई और उन्हें चुनौती दी गई.
आज की लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी यही तरीका सबसे महत्वपूर्ण है. किसी विचार से असहमति है तो उसका तर्क से विरोध कीजिए. किसी विचार में हिंसा है तो उसकी हिंसा को उजागर कीजिए. कोई व्यवस्था-विरोधी बात कर रहा है तो पूछिए कि उसका विकल्प क्या है. लेकिन किसी विचार को समझने से पहले उसे एक नाम देकर खारिज कर देना शायद सबसे आसान रास्ता है, और लोकतंत्र हमेशा आसान रास्ते से मजबूत नहीं होता.
‘दिमागी नक्सल’ शब्द की बहस इसलिए सिर्फ नक्सलवाद की बहस नहीं है. यह इस बात की बहस भी है कि हम असहमति को किस तरह देखते हैं. क्या सत्ता की आलोचना को सत्ता के खिलाफ षड्यंत्र समझा जाएगा? क्या व्यवस्था में बदलाव की मांग को व्यवस्था के विनाश की मांग मान लिया जाएगा? क्या किसी विचारधारा से सहानुभूति रखने और हिंसक संगठन का समर्थन करने के बीच कोई अंतर रखा जाएगा? अगर इन सवालों का जवाब साफ नहीं है, तो यह शब्द जितना स्पष्ट करने के लिए इस्तेमाल होगा, उतना ही भ्रम पैदा कर सकता है.
लेकिन दूसरी ओर, यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसा कोई सवाल है ही नहीं. किसी हिंसक आंदोलन को केवल इसलिए कमजोर नहीं समझा जा सकता कि उसके सभी समर्थक हथियार लेकर जंगल में नहीं हैं. किसी भी आंदोलन की ताकत उसके विचार, संगठन, जनसमर्थन और राजनीतिक प्रभाव से बनती है. अगर कोई व्यक्ति हिंसा को वैचारिक रूप से सही ठहराता है, उसके लिए तर्क गढ़ता है या उसे राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बनाने की कोशिश करता है, तो उस भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है लेकिन सवाल उठाने और लेबल लगाने के बीच भी एक अंतर है. किसी पर आरोप लगाने के लिए स्पष्ट आधार चाहिए, केवल असहमति काफी नहीं हो सकती.
यही वजह है कि इस पूरी बहस को दो आसान निष्कर्षों में बांटना खतरनाक होगा. पहला आसान निष्कर्ष यह है कि जो भी सरकार का विरोध करता है, वह ‘दिमागी नक्सल’ है. दूसरा आसान निष्कर्ष यह है कि जो भी नक्सलवाद की वैचारिक भाषा बोलता है, वह सिर्फ असहमति का प्रतिनिधि है और दोनों ही बातें वास्तविकता को छोटा कर देती हैं.
लोकतंत्र शायद इन दोनों के बीच की उस पतली जगह का नाम है जहां सवाल पूछने की आजादी भी बची रहे और हिंसा को वैचारिक ढाल भी न मिले, जहां सरकार से सवाल करना नागरिक अधिकार हो, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था को हिंसा के जरिए खत्म करने की कोशिश को सिर्फ असहमति कहकर टाला न जाए. जहां वामपंथ को नक्सलवाद से अलग समझा जाए, लेकिन नक्सली हिंसा को भी केवल सामाजिक असंतोष का दूसरा नाम न बना दिया जाए, जहां दक्षिणपंथ को भी वही कसौटी दी जाए जो वामपंथ को दी जाती है.
आखिरकार किसी भी विचारधारा की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि वह सत्ता में है या सत्ता के खिलाफ. असली परीक्षा यह है कि वह सत्ता को कैसे देखती है, नागरिक को कितना अधिकार देती है और अपने विरोधी के लिए कितनी जगह छोड़ती है. जो विचार अपने विरोधी के अस्तित्व को स्वीकार करता है, वह लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा बन सकता है. जो विचार विरोधी को खत्म करने के लिए हिंसा को जरूरी मानता है, वहां लोकतंत्र को सावधान होना पड़ेगा.
तो फिर ‘दिमागी नक्सल’ कौन है? शायद इस सवाल का कोई आसान एक शब्द का जवाब नहीं है. अगर इसका अर्थ उस व्यक्ति से है जो हिंसक नक्सलवाद को वैचारिक रूप से सही मानता है, तो उस विचार की जांच होनी चाहिए. अगर इसका अर्थ हर उस व्यक्ति से है जो सरकार की आलोचना करता है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक विस्तार होगा. अगर इसका अर्थ हर वामपंथी से है, तो यह राजनीतिक इतिहास की गलत समझ होगी और अगर इसका अर्थ सिर्फ व्यवस्था बदलने की इच्छा रखने वाले से है, तो फिर वही कसौटी हर विचारधारा पर लागू करनी पड़ेगी, दक्षिणपंथ पर भी, वामपंथ पर भी और उन तमाम आंदोलनों पर भी जो समाज को अपनी पसंद की दिशा में बदलना चाहते हैं.
शायद इसलिए इस पूरे शब्द को समझने का सबसे बेहतर तरीका यह है कि हम व्यक्ति को उसके लेबल से पहले उसके विचार और उसके रास्ते से समझें कि वह क्या चाहता है, क्यों चाहता है और उसे हासिल करने के लिए कौन-सा रास्ता चुनता है और इन तीन सवालों के बिना किसी भी राजनीतिक पहचान को समझना मुश्किल है.
भारत ने नक्सलवाद के खिलाफ लंबे समय तक बंदूक से लड़ाई लड़ी है. सुरक्षा बलों ने संघर्ष किया, हजारों लोग मारे गए, कई इलाकों में विकास और सुरक्षा की स्थिति बदली लेकिन अगर किसी हिंसक विचारधारा की जमीन केवल बंदूक से खत्म की जा सकती, तो दुनिया की कई क्रांतियां और विद्रोह बहुत पहले समाप्त हो चुके होते. विचार का जवाब केवल सुरक्षा से नहीं, विचार से भी देना पड़ता है और विचार का जवाब देने का सबसे मजबूत तरीका उसे प्रतिबंधित करना नहीं, बल्कि उसके तर्क को चुनौती देना है जहां वह सही सवाल पूछता है, वहां समाधान देना और जहां वह हिंसा को सही ठहराता है, वहां स्पष्ट असहमति दर्ज करना.
शायद यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ की बहस को किसी एक राजनीतिक खांचे में बंद करना ठीक नहीं होगा. यह सवाल सत्ता से भी पूछा जाना चाहिए और सत्ता के विरोधियों से भी. सरकार से पूछा जाना चाहिए कि असहमति की सीमा कहां है. नक्सली विचार के समर्थक से पूछा जाना चाहिए कि हिंसा क्यों. दक्षिणपंथ से पूछा जाना चाहिए कि उसके विचार में विरोधी के लिए कितनी जगह है. वामपंथ से पूछा जाना चाहिए कि क्रांति और लोकतंत्र का रिश्ता क्या है. और हर नागरिक से पूछा जाना चाहिए कि क्या वह अपने विरोधी के सवाल को सुनने के लिए तैयार है.
क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत यह नहीं कि उसमें कोई गलत विचार पैदा ही न हो बल्कि उसकी ताकत यह है कि गलत, खतरनाक या असुविधाजनक विचारों से निपटने के लिए उसके पास बहस, कानून, चुनाव, संविधान और जनता का विवेक मौजूद हो.
नक्सलवाद की कहानी इसलिए सिर्फ बंदूक की कहानी नहीं है. यह विचार की ताकत और उसकी सीमा की कहानी भी है. यह बताती है कि वास्तविक अन्याय किसी विचार को जन्म दे सकता है, लेकिन कोई भी विचार अपने रास्ते के लिए हमेशा सही नहीं हो जाता. यह भी बताती है कि राज्य की गलतियों की आलोचना जरूरी है, लेकिन राज्य के खिलाफ हिंसा को सही ठहराना लोकतांत्रिक असहमति का दूसरा नाम नहीं है, और शायद सबसे जरूरी निष्कर्ष यही है कि हर सवाल नक्सलवाद नहीं है, हर विचार लोकतांत्रिक भी नहीं है.
लोकतंत्र की असली परीक्षा इन दोनों के बीच फर्क करने में है क्योंकि बंदूक को रोकना सुरक्षा की जिम्मेदारी हो सकती है, लेकिन उस विचार को समझना और चुनौती देना समाज की जिम्मेदारी है जो बंदूक को सही ठहराता है और उसी समाज की एक दूसरी जिम्मेदारी भी है कि वह सवाल पूछने वाले हर नागरिक को बंदूक की विचारधारा से जोड़कर न देखे.
आखिर में किसी लोकतंत्र में सबसे सुरक्षित समाज वह नहीं होता जहां सवाल पूछने वाले खत्म हो जाएं बल्कि सबसे सुरक्षित समाज वह होता है जहां सवाल पूछे जाते हैं, जवाब दिए जाते हैं, गलत विचारों से बहस की जाती है और हिंसा को राजनीति का रास्ता बनने नहीं दिया जाता.
इसलिए शायद अंतिम सवाल यह नहीं होना चाहिए कि दिमागी नक्सल कौन है? अंतिम सवाल इससे थोड़ा कठिन है कि क्या हम किसी विचार को इसलिए खारिज कर रहे हैं क्योंकि वह गलत है, या इसलिए क्योंकि वह हमारे लिए असुविधाजनक है? और अगर कोई विचार सचमुच गलत है, लोकतंत्र के खिलाफ है या हिंसा को सही ठहराता है, तो उससे डरने की नहीं, उसे समझने और उसके तर्क को हराने की जरूरत है क्योंकि बंदूक को हराना एक सुरक्षा अभियान हो सकता है, लेकिन दिमाग में पैदा हुई हिंसा को हराना अंततः विचार की लड़ाई है और विचार की इस लड़ाई में सबसे मजबूत हथियार शायद वही है, जिससे हमने शुरुआत की थी, सवाल.
डिस्क्लेमर – लेखक ललित सिहाग जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं, वह रिसर्चर हैं और वर्तमान में नीति एवं राजनीति पर लिखते हैं. लेख में साझा किए गए तथ्य लेखक के निजी विचार हैं.