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Opinion

आखिर क्यों शादी से दूर भाग रही है जेनरेशन Z!

शादी को लेकर युवाओं,खासकर GenZ की सोच चर्चा के केंद्र में है। इस पीढ़ी के अधिकांश लोग शादी नहीं करना चाहते, शादी उनकी प्राथमिकता सूची में ऊपर से लेकर नीचे तक कहीं भी नहीं है। युवाओं की शादी को लेकर बदलती सोच के कई कारण हैं, लेकिन एक जिसने उनके दिमाग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वो है शादी की बदलती परिभाषा।

हर कुछ साल के बाद दुनिया बदलाव से गुजरती है। यह बदलाव आर्थिक ही नहीं सामाजिक भी होते हैं। कुछ बदलाव स्वीकार्य होते हैं और कुछ ऐसे जो लंबे समय तक बहस या चर्चा का मुद्दा बने रहते हैं। मौजूदा समय में शादी को लेकर युवाओं, खासकर GenZ की सोच चर्चा के केंद्र में है। इस पीढ़ी के अधिकांश लोग शादी नहीं करना चाहते, शादी उनकी प्राथमिकता सूची में ऊपर से लेकर नीचे तक कहीं भी नहीं है। पहले 100 में से इक्का-दुक्का लोग ही ऐसे मिलते थे,जो शादी को ‘बंधन’ मानते थे, लेकिन अब ऐसी सोच वालों की संख्या काफी बढ़ गई है।

शादी की परिभाषा बदली 

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इस सामाजिक बदलाव पर बहस के साथ-साथ चिंतन भी जरूरी है, क्योंकि इसके दूरगामी परिणाम होंगे। युवाओं की शादी को लेकर बदलती सोच के कई कारण हैं, लेकिन एक जिसने उनके दिमाग को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वो है शादी की बदलती परिभाषा। 80,90,2000 के दशक से लेकर अब तक शादी की परिभाषा काफी बाद तक बदल चुकी है या कहें कि विकृत हो गई है। आज शादी को नफे-नुकसान और फायदे के तराजू में तौलने वालों की कोई कमी नहीं। इस वजह से मनमुटाव का स्तर बढ़ा है और आपकी कलह आम हो गई है। इसके अलावा, एलमनी भी आजकल एक ट्रेंड बन गई है। हाल के दिनों में ही कई हाई प्रोफाइल मामले सामने आए हैं जहां एलमनी की डिमांड ने सुर्खियां बंटोरी।

इस कारण शादी से दूर भाग रहे युवा 

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अपने आसपास ही अगर हम देखें तो हर 10 में से कुछ न कुछ घर ऐसे जरूर मिलेंगे,जहां एक छत के नीचे रहने वालों के बीच भी कोसों मील की दूरी है। युवा यही सब देख रहे हैं। आमतौर पर जब हम किसी के बारे में एक जैसी बातें सुनते या देखते हैं, तो अपनी एक राय कायम कर लेते हैं और उससे बाहर निकलने की कोशिश नहीं करते। युवाओं के साथ भी यही हो रहा है। उन्हें लगने लगा है कि शादी उन्हें भी उस कैटेगरी में लाकर खड़ा कर देगी, जहां दूसरे उनकी गलतियों से सबक लेंगे और वह खुद को गलत साबित होते देखना नहीं चाहते।

लिव-इन लाइफ ने युवाओं को बनाया कूल 

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आजकल शादी का अल्टरनेटिव भी मौजूद है। लिव-इन। बड़े शहरों में इस विकल्प को आजमाने वालों की तादाद काफी ज्यादा है। एक-दूसरे को पसंद करने वाले दो लोग एक-साथ आते हैं, साथ रहते हैं और पसंद का स्तर जब कम होता है, तो अपने-अपने रास्ते निकल जाते हैं। न कोई कमिटमेंट,न कोई बंदिश और न एलमनी जैसे स्यापे। यह लाइफ युवाओं को कूल लगने लगी है। पैसा जब हाथ में हो तो इनसान एक्सपेरिमेंट से हिचकता नहीं है। आजकल युवा खूब पैसा कमा रहे हैं और इसलिए वह अपनी लाइफ को लेकर हर तरह का प्रयोग कर रहे हैं। पैसा, पार्टी, एन्जॉयमेंट, उनके जीवन का एक आधार बन गया है और इसमें शादी कहीं फिट नहीं बैठती।

संयुक्त परिवारों की दरकती नींव भी एक कारण 

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पारिवारिक ढांचे यानी संयुक्त परिवारों की दरकती नींव भी इसमें योगदान देती है। पहले जब परिवार एक होते थे, तो समय पर शादी प्राथमिकता होती थी। परिवारों के छोटे होने के साथ ही इस प्राथमिकता का स्तर खिसकता गया और अब पढ़ाई, नौकरी के लिए युवाओं ने घर छोड़कर दूसरे शहरों का रुख किया, तो प्राथमिकता की लिस्ट से शादी गायब ही हो गई। क्योंकि प्रत्यक्ष तौर पर शादी के लिए जोर डालने वाला कोई नहीं रहा। फोन पर हुई बातों और सामने-सामने की मुलाकातों में काफी फर्क होता है। बच्चे जब सामने होते हैं तो उनके माता-पिता की बातों को सुनने-समझने की संभावना बढ़ जाती है। यह डायरेक्ट कम्युनिकेशन अब बेहद कम हो गया है।

अब पेरेंट्स भी बच्चों पर नहीं डालते शादी का दबाव 

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एक पहलू यह भी है कि अब पेरेंट्स भी बच्चों पर शादी के लिए ज्यादा दबाव नहीं डालते। केवल लड़के ही नहीं,लड़कियों के मामले में भी ऐसा है। क्योंकि उन्हें दबाव से जिंदगी के बिखरने का खतरा लगा रहता है। कई ऐसे मामले हैं जहां दबाव में हुई शदियां दुखद अंत बनकर सामने आईं। कुल मिलाकर कहें तो समाज एक बहुत बड़े बदलाव से गुजर रहा है। तमाम कारकों ने मिलकर एक ऐसा परिदृश्य तैयार किया है, जो युवाओं को शादी से दूर ले जा रहा है। अब इसके क्या फायदे हैं और क्या नुकसान यह एक अलग बहस का मुद्दा हो सकता है।

(ये लेखक के निजी विचार हैं) 

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First published on: Apr 07, 2025 06:04 PM

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About the Author

Abhishek Mehrotra

अभिषेक मेहरोत्रा उन चुनिंदा पत्रकारों में शुमार हैं, जो हमेशा कुछ नया करने और खुद को समय से आगे रखने में प्रयासरत रहते हैं. प्रिंट मीडिया से अपने करियर की शुरुआत करने वाले अभिषेक ने डिजिटल जर्नलिज्म में अपनी एक अलग पहचान स्थापित की है. बतौर ग्रुप एडिटर डिजिटल News24 से जुड़ने से पहले अभिषेक मेहरोत्रा बिज़नेस वर्ल्ड में डिजिटल एडिटर की जिम्मेदारी निभा रहे थे. उन्होंने Zee मीडिया में डिजिटल एडिटर के रूप में उल्लेखनीय कार्य किया है. उनकी लीडरशिप में ज़ी न्यूज़ की वेबसाइट न केवल लोगों की पसंदीदा वेबसाइट बनी, बल्कि उसने नंबर 1 न्यूज़ वेबसाइट का मुकाम भी हासिल किया. अभिषेक मेहरोत्रा के कार्यकाल में जी न्यूज़ की वेबसाइट ने 100 मिलियन यूजर्स का आंकड़ा पार कर लिया था, जो अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है. अभिषेक मेहरोत्रा ने अपना करियर आगरा के स्वराज्य टाइम्स से जर्नलिज्म की पढाई के दौरान शुरू किया। उसके बाद अमर उजाला, दैनिक जागरण और नवभारत टाइम्स के जरिए अपनी पत्रकारिता की पारी को आगे बढ़ाया। वे उन चुनिंदा पत्रकारों में है जो आज के युग के मीडिया यानी वेब जर्नलिज्म के अच्छे जानकार माने जाते हैं। नवभारतटाइम्स ऑनलाइन के साथ वेब पत्रकारिता शुरू करने वाले अभिषेक का जागरण डॉट कॉम को एक बड़ी ऊंचाई तक पहुंचाने में अहम योगदान रहा है। अभिषेक ने काफी पहले ही वेब वर्ल्ड की बारीकियों को समझ लिया था, क्योंकि वह जानते थे कि पत्रकारिता का भविष्य डिजिटल मीडिया में ही निहित है. आज वह अपनी उस समझ, ज्ञान, अनुभव और खबरों को बेहतर ढंग से समझने के कौशल के बल पर पत्रकारिता के स्तंभ को और मजबूती प्रदान कर रहे हैं. उन्होंने 5 सालों तक मीडिया स्ट्रीम से जुड़ी वेबसाइट समाचार4मीडिया डॉट कॉम में संपादकीय प्रभारी का दायित्व भी निभाया है. मीडिया जगत और वहां के बिजनेस मॉडल पर उनकी पैनी नजर के चलते वे मीडिया विश्लेषक के तौर पर भी जाने जाते हैं। खबरों की दुनिया के तमात दबाव और चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपने अंदर के व्यंगकार को जीवित रखा है. उनके लेख अमर उजाला, आउटलुक हिंदी, चौथी दुनिया में बतौर व्यंग्यकार निरंतर प्रकाशित होते है. राज्यसभा डॉट कॉम और दैनिक जागरण के लिए वे विदेशी और समसमायिक मुद्दों पर लिखने वाले स्थापित कॉलमिनिस्ट हैं।

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