15 अगस्त सिर्फ आजादी का जश्न नहीं, बल्कि उन बलिदानों को याद करने का दिन है, जिनसे हमें स्वतंत्र भारत मिला. इसी भावना के साथ गौतम अदाणी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने साथियों से संवाद किया और अपने जीवन के अनुभव साझा किए.

उन्होंने माता-पिता से मिले संस्कारों, कम उम्र में घर छोड़ने और मुंबई में काम शुरू करने के दिनों को याद करते हुए मेहनत,धैर्य और विश्वास को सफलता की अहम सीख बताया. अदाणी ने साथ ही ऐसे विकसित भारत का सपना साझा किया, जहां देश की प्रगति के साथ आम लोगों की जिंदगी भी बेहतर हो और भारत दुनिया में और मजबूत पहचान बनाए. इसी विश्वास की भावना के साथ, गौतम अदाणी ने अपने साथियों के साथ अपने जीवन के सफर और उससे मिली सीखों को साझा किया.

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अदाणी का संदेश,

मेरे अदाणी परिवार के साथियों,

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आप सभी को मेरा स्नेहपूर्ण नमस्कार.

15 अगस्त हमारे लिए सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उस आजादी की याद है, जिसकी नींव अनगिनत लोगों के संघर्ष और बलिदान से रखी गई. जिस स्वतंत्र भारत में आज हम अपने सपनों को पूरा करने की आजादी रखते हैं, उसके पीछे कई पीढ़ियों की मेहनत और कुर्बानी रही है.

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किसी ने अपना घर छोड़ा. किसी ने अपना परिवार छोड़ा. किसी ने अपने जीवन के सबसे अच्छे वर्ष देश के नाम कर दिए. और किसी ने अपना जीवन ही न्योछावर कर दिया. आज हम जो कुछ भी कर पा रहे हैं, जो कुछ भी बना पा रहे हैं और जो भविष्य के सपने देख पा रहे हैं, वह उनके त्याग का ही परिणाम है.

और यदि मैं अपने जीवन के सफ़र को देखूं, तो मुझे भी यही सत्य दिखाई देता है. ईश्वर की कृपा से जीवन ने मुझे मेरी अपेक्षाओं से कहीं ज़्यादा दिया, लेकिन उससे भी ज़्यादा जीवन ने मुझे सिखाया. और शायद अब समय आ गया है कि परिवार के मुखिया होने के नाते जीवन ने जो मुझे सिखाया, उसमें से कुछ बातें मैं आप सभी के साथ साझा करूं.

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साथियों, कुछ महीने पहले 1 मई, श्रमिक दिवस के अवसर पर, हमने “अपनी बात, अपनों के साथ” शुरू किया था. जब हम पहली बार “अपनी बात, अपनों के साथ” के माध्यम से जुड़े थे, तब हमने श्रम के सम्मान की बात की थी. मैंने कहा था कि किसी भी संस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मशीनें नहीं, उसके लोग होते हैं.

उस दिन मेरे मन में एक और बात थी कि इतने बड़े परिवार में संवाद केवल मीटिंग्स और कम्युनिकेशन तक सीमित नहीं होना चाहिए. उसमें अपनापन भी होना चाहिए, विश्वास भी होना चाहिए और एक-दूसरे से सीखने का अवसर भी होना चाहिए. इसी भावना से यह संवाद शुरू हुआ.

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आज हमारी दूसरी मुलाकात है. और मुझे विश्वास है कि आने वाले वर्षों में “अपनी बात, अपनों के साथ” हमारे अदाणी परिवार की एक सुंदर परंपरा बन जाएगी—एक ऐसा अवसर जहां हम सिर्फ अपने काम की नहीं, अपने जीवन की भी बात करेंगे.

जब मैं अपने जीवन के सफ़र को याद करता हूं, तो सबसे पहले अपने माता-पिता के चेहरे सामने आते हैं. मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जहां साधन सीमित थे, लेकिन संस्कार असीमित थे. मेरे पिताजी, शांतिलाल जी, ने हमें कभी बड़े-बड़े उपदेश नहीं दिए. उन्होंने हमें सिखाया कि ईमानदारी कोई नीति नहीं होती; वह आपके स्वभाव में होती है. उन्होंने हमें सिखाया कि वचन छोटा या बड़ा नहीं होता, वचन तो वचन होता है, और उसे निभाना ही होता है. और यदि लोग आपके शब्द पर विश्वास करते हैं, तो जीवन में उससे बड़ा कोई सम्मान नहीं.

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो महसूस करता हूं कि यदि मेरे जीवन की कोई सबसे बड़ी विरासत है, तो वह धन की नहीं, विश्वास की विरासत है.

मेरी माताजी ने हमें एक अलग तरह की सीख दी. उन्होंने त्याग क्या होता है, सादगी क्या होती है और परिवार का अर्थ क्या होता है, यह बिना कहे सिखाया. मां बहुत कम बोलती थीं, लेकिन उनका स्नेह हमेशा बोलता था. आज भी जब बचपन को याद करता हूं, तो सबसे पहले मां के हाथ के खाने की खुशबू याद आती है, घर की गर्माहट याद आती है और मां का पूछा हुआ एक छोटा-सा प्रश्न याद आता है: “खाना खाया?”

शायद हम सभी के जीवन में कुछ ऐसी यादें होती हैं जो समय के साथ पुरानी नहीं होतीं. और यही यादें हमें जमीन से जोड़े रखती हैं.

आप लोग जानते हैं कि मुझे आगे की पढ़ाई करने का अवसर नहीं मिला. उस समय शायद यह एक कमी लगती थी. लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं, तो लगता है कि ईश्वर ने मेरे लिए सीखने का एक दूसरा रास्ता चुन रखा था. मेरे Teachers बहुत रहे, लेकिन उनमें सबसे बड़ा टीचर जीवन था.

जीवन की सबसे बड़ी सीख हमें हमेशा बड़ी घटनाओं से नहीं मिलती. कई बार वह छोटी घटनाओं में भी छिपी होती है. और कई बार वह सीख हमें हर रोज मिलने वाले लोग सिखा जाते हैं. कभी मोहल्ले का छोटा-सा किराना दुकानदार, जो बिना किसी कागज के सिर्फ विश्वास पर उधार दे देता है; कभी किसी तकनीशियन की कर्तव्यनिष्ठा या किसी सिक्योरिटी स्टाफ की सावधानी हमें जिम्मेदारी का अर्थ समझा देती है. यदि सीखने की विनम्रता हो, तो जीवन में हर व्यक्ति आपका टीचर बन सकता है.

फिर भी, मैं अपने सभी युवा साथियों और आपके बच्चों से एक बात अवश्य कहना चाहता हूं. यदि आपको अच्छी पढ़ाई का अवसर मिला है, तो उसे पूरे मन से अपनाइए. क्योंकि अच्छी पढ़ाई आपको सोचने की शक्ति देती है, और जीवन आपको उन विचारों की परीक्षा लेने का अवसर देता है. दोनों साथ हों तो सीख भी गहरी होती है और व्यक्तित्व भी निखरता है.

समय का चक्र आगे बढ़ा, और एक दिन घर छोड़ने का समय भी आ गया. मैं मात्र 16 वर्ष का था. दिल में उत्साह भी था, सपने भी थे और थोड़ी-सी आशंका भी. मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि जीवन मुझे कहां ले जाएगा. मेरे पास कोई बहुत बड़ा Plan नहीं था. बस एक विश्वास था कि मेहनत करूंगा तो जीवन रास्ता दिखा देगा.

मुझे लगता है कि आपमें से बहुत-से साथियों ने भी अपने जीवन में ऐसा ही कोई दिन देखा होगा, जब आपने अपने गांव, अपने शहर और अपने परिवार को पीछे छोड़कर एक नए भविष्य की तलाश में पहला कदम रखा होगा. उस समय हम केवल एक शहर नहीं छोड़ते; हम अपने जीवन का एक हिस्सा पीछे छोड़ जाते हैं. आज भी मुझे लगता है कि जीवन का सबसे कठिन कदम अक्सर पहला ही होता है. लेकिन वही पहला कदम हमें आकार देने लगता है.

यह केवल गौतम अदाणी की कहानी नहीं है. यह हर उस साथी की कहानी है, जिसने अपने घर से दूर रहकर देश के किसी कोने में एक Project को अपना सपना बनाया. यह उन बहुत-से इंजीनियरों की कहानी है, उन लाखों श्रमिकों की कहानी है और उन परिवारों की कहानी है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को देश निर्माण के लिए घर से दूर भेजा. यह आप सबकी कहानी है—आपके परिश्रम की कहानी है, आपके त्याग की कहानी है और आपके विश्वास की कहानी है.

क्योंकि जीवन में एक दिन हम सबको अपना घर छोड़कर अपने सपनों की ओर वह पहला कदम रखना पड़ता है.

जब मैं पहली बार मुंबई पहुंचा, तो मैं सीखना चाहता था. काम को समझना चाहता था. लोगों को समझना चाहता था. और शायद खुद को भी समझना चाहता था. मुंबई मेरे लिए केवल एक शहर नहीं था; वह मेरी पहली यूनिवर्सिटी थी.

मुंबई में मैंने हीरों के व्यापार से काम शुरू किया. लोग हीरे की चमक देखते हैं, लेकिन मैंने एक और बात देखी कि कोई भी हीरा अपनी खान से निकलते ही नहीं चमकता. उसे धैर्य से, लगन से और बार-बार तराशना पड़ता है.

आज लगता है कि इंसान भी शायद ऐसा ही होता है. हम सबके भीतर एक संभावना होती है, लेकिन उस संभावना की चमक जीवन की मेहनत, संघर्ष और अनुभवों से ही बाहर आती है.

समय के साथ मैंने एक बात समझी कि व्यापार की असली नींव माल या पैसे पर नहीं, विश्वास पर खड़ी होती है. किसी भी सौदे से पहले लोग आप पर विश्वास करते हैं, और वही सबसे बड़ी पूंजी बन जाती है.

धीरे-धीरे जीवन आगे बढ़ता गया. साथी जुड़ते गए. जिम्मेदारियां बढ़ती गईं. छोटी-छोटी कोशिशें धीरे-धीरे एक बड़े समूह में बदल गईं. लेकिन यदि कोई मुझसे पूछे कि इस सफ़र में सबसे बड़ा निवेश क्या था, तो मेरा उत्तर होगा… विश्वास. Trust.

मुन्द्रा जैसा Port बनाना, खावड़ा जैसा विश्व का सबसे बड़ा Renewable Energy Park खड़ा करना, Navi Mumbai जैसा International Airport बनाना या गोड्‌डा जैसे प्रोजेक्ट को साकार करना बेशक अत्यंत कठिन कार्य हैं. लेकिन इन सभी अनुभवों ने मुझे एक ही बात सिखाई. सबसे कठिन निर्माण किसी प्रोजेक्ट का नहीं विश्वास का होता है.

और शायद जीवन ने मुझे सबसे बड़ी सीख भी विश्वास के बारे में ही दी. धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि विश्वास ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है. जिसके पास विश्वास है उसके पास सब कुछ है. और जिसने विश्वास खो दिया उसने सब कुछ खो दिया.

जीवन ने मुझे यह भी सिखाया कि विश्वास परिवार का हो मित्रों का हो सहकर्मियों का हो हमारे Employees और Workers का हो ग्राहकों का हो भागीदारों का हो या समाज का उसकी नींव हमेशा चरित्र पर खड़ी होती है. विश्वास मांगा नहीं जाता. कमाया जाता है. और एक बार नहीं हर दिन कमाया जाता है.

शायद इसी कारण जीवन ने मुझे एक और बहुत बड़ी सीख दी. जितना बड़ा सफ़र होगा उतना बड़ा मंथन होगा और उतनी ही बड़ी परीक्षा होगी.

हम सबने समुद्र मंथन की कथा सुनी है. जैसे-जैसे जीवन आगे बढ़ता गया, समझ आया कि वह केवल एक कथा नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है. मंथन होगा तो सबसे पहले अमृत नहीं निकलेगा. सबसे पहले विष निकलेगा. और यहीं से जीवन हमारी परीक्षा लेने लगता है. मंथन परिस्थितियों की परीक्षा नहीं लेता. मंथन चरित्र की परीक्षा लेता है.

हर व्यक्ति के जीवन में, हर परिवार के जीवन में, हर संस्था के जीवन में ऐसी परीक्षाएं आती हैं. कुछ हम खुद चुनते हैं. और कुछ जीवन खुद हमारे सामने लेकर आता है.

जितना मैं हमारी सभ्यता, हमारे इतिहास और हमारे महापुरुषों के जीवन को पढ़ता हूं, उतना ही एक सत्य और स्पष्ट होता जाता है. बड़े सफ़र कभी सरल नहीं होते. भगवान राम का जीवन देखिए; वनवास के बिना रामायण पूरी नहीं होती. भगवान श्रीकृष्ण का जीवन देखिए; जन्म से लेकर अंत तक हर चरण एक नई चुनौती लेकर आया. समुद्र मंथन की कथा देखिए; अमृत की प्राप्ति से पहले विष का निकलना अनिवार्य था. महादेव ने उस विष को धारण किया ताकि सृष्टि की रक्षा हो सके.

महाभारत देखिए. धर्म पांडवों के साथ था. फिर भी वनवास मिला. अपमान भी सहना पड़ा. और युद्ध भी लड़ना पड़ा. यदि हम अपने स्वतंत्रता संग्राम को देखें तो महात्मा गांधी हों, सरदार पटेल हों, नेताजी सुभाषचंद्र बोस हों या अन्य स्वतंत्रता सेनानी, इनमें से किसी का मार्ग संघर्ष से अलग नहीं था. तब लगता है शायद जीवन का यही नियम है. जिन्हें बड़ी ज़िम्मेदारियां निभानी होती हैं, उनके जीवन में बड़ी परीक्षाएं भी आती हैं.

कुछ वर्ष पहले हमारे समूह के सामने भी ऐसी ही एक बड़ी परीक्षा आई. Hindenburg की Report आई. शेयर बाजार में अनेक प्रश्न उठे. Uncertainty का वातावरण बन गया. उसी समय, हमारा Follow-on Public Offer, जिसे FPO भी कहते हैं, चल रहा था. देश-विदेश के बहुत-से Investors ने हम पर विश्वास करते हुए लगभग ₹20,000 करोड़ का निवेश किया था. फिर Hindenburg Report के बाद हमारे Share Prices में तेज गिरावट आई. इसका असर उन Investors पर पड़ा जिन्होंने हमारे FPO में निवेश किया था. उनके निवेश का मूल्य तेजी से घट गया था.

कानूनी दृष्टि से हमारे पास उस पूरी प्रक्रिया को जारी रखने का पूरा अधिकार था. शेयर बाजार में कीमतों का ऊपर-नीचे होना एक सामान्य बात है. हम चाहते तो वह राशि अपने पास रख सकते थे. लेकिन जीवन में हर निर्णय केवल कानून से नहीं लिया जाता. कानून हमें अधिकार देता है. लेकिन हमारा Value System बताता है उस अधिकार का उपयोग कब करना है और कब नहीं.

उस समय मुझे अपने पिताजी की एक ही सीख याद आई. विश्वास किसी भी कानूनी अधिकार से बड़ा होता है. मुझे यह स्वीकार नहीं था कि जिन लोगों ने हम पर विश्वास करके अपना पैसा लगाया, वे पहले ही दिन अपने निवेश का मूल्य घटता हुआ देखें.

इसलिए हमने पूरी राशि वापस लौटाने का निर्णय लिया. उस समय बहुत-से लोगों ने कहा “ऐसा मत कीजिए.” कुछ लोगों ने कहा “इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ.” कुछ लोगों ने कहा “यह भावनात्मक निर्णय है.” हो सकता है वे अपनी जगह सही रहे हों. लेकिन उस समय मेरे सामने केवल एक प्रश्न था. क्या जिन लोगों ने हम पर विश्वास करके अपना पैसा लगाया है हम उनके विश्वास के साथ न्याय कर रहे हैं?

जब मैंने खुद से पूरी ईमानदारी के साथ यह प्रश्न पूछा, तो उत्तर बिल्कुल स्पष्ट था. हमें उनका पैसा वापस लौटा देना चाहिए. तो मेरे लिए बाकी सभी तर्क महत्वहीन हो गए. इसलिए हमने ₹20,000 करोड़ की पूरी राशि वापस लौटा दी.

उस दिन हमने कोई असामान्य निर्णय नहीं लिया. हमने केवल वही किया जो हमारे संस्कार हमारे Values और मेरे पिताजी की सीख हमें करने के लिए कह रही थी. अपने पिताजी से मिली विश्वास की विरासत निभाई.

साथियों, साख एक दिन में नहीं बनती, और एक निर्णय से भी नहीं बनती. उसे दशकों तक हर छोटे-बड़े निर्णय में जीना पड़ता है. हमारी निरंतर कोशिश रही है कि जिसका भी हमारे ऊपर एक रुपया भी देय है, उसका सम्मानपूर्वक और समय पर भुगतान हो. चाहे वह कोई बैंक हो, कोई Investor हो, कोई बॉण्डधारक हो या हमारा कोई छोटा-सा ऑपरेशनल पार्टनर.

विश्वास केवल बड़े निर्णयों से नहीं बनता. वह हर दिन अपने दायित्व निभाने से बनता है. आज यही Adani Group का defining culture है.

Hindenburg आया और चला भी गया. लेकिन Adani Group अपनी Values पर अडिग रहा. अपने लोगों के विश्वास पर खड़ा रहा. और पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा. लेकिन मुझे आज भी एक बात का अफ़सोस है. कुछ लोगों के लालच की वजह से Share Market में बहुत-से छोटे Investors को नुकसान उठाना पड़ा. उस समय हमने अपने Investors के हित को सबसे ऊपर रखा. और शायद यही हमारे विश्वास की सबसे बड़ी कसौटी थी.

लेकिन जीवन की परीक्षाएं यहीं समाप्त नहीं हुईं. उसके बाद एक और कठिन परीक्षा हमारे सामने आई. अमेरिका में एक न्यायिक प्रक्रिया चालू हुई. स्वाभाविक रूप से उसने भी अनेक प्रश्न खड़े किए. बहुत-सी बातें कही गईं. बहुत-सी धारणाएं बनाई गईं. कई लोगों ने निर्णय भी बहुत जल्दी सुना दिए. लेकिन हमें अपने सत्य पर पूरा विश्वास था. इसलिए हमने शोर का रास्ता नहीं चुना. हमने धैर्य का रास्ता चुना. हमने संयम रखा. हमने न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान किया. तथ्यों पर भरोसा रखा. और सबसे बढ़कर अपने सत्य पर विश्वास रखा. मैंने अपने आप से बार-बार एक ही बात कही: सत्य को शोर की आवश्यकता नहीं होती. उसे केवल समय की आवश्यकता होती है.

आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो संतोष इस बात का नहीं है कि हमने कठिन समय पार किया. संतोष इस बात का है कि उसी दौरान हम सबने मिलकर Adani Group को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. इन दो वर्षों में हमने अपने इतिहास का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया. नए प्रोजेक्ट आगे बढ़े. नई उपलब्धियां हासिल हुईं. और सबसे बड़ी बात, हमारा भविष्य पहले से अधिक मजबूत हुआ. यही मेरे लिए मंथन का अमृत है.

आज बहुत-से लोग इसे हमारी जीत मानते हैं. मैं उनकी भावना का सम्मान करता हूं. लेकिन आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे यह किसी एक प्रकरण की जीत से कहीं बड़ी बात लगती है. मुझे यह एक संस्था के रूप में हम सबकी सामूहिक सीख दिखाई देती है. हमने सीखा कि विश्वास की सबसे कठिन परीक्षा कठिन समय में होती है. हमने सीखा कि किसी संस्था की सबसे बड़ी शक्ति उसके लोग होते हैं. और हमने यह भी सीखा कि विश्वास एक बार जीत लेने भर की बात नहीं है. उसे हर दिन अपने काम से, अपने व्यवहार से और अपने चरित्र से बार-बार अर्जित करना पड़ता है.

आज यदि मेरे मन में सबसे अधिक कोई भावना है तो वह विजय की नहीं, आभार की है. आभार आप सबके प्रति. आपके परिवारों के प्रति. उन सभी साथियों के प्रति जिन्होंने सामान्य परिस्थितियों में ही नहीं बल्कि सब कुछ असामान्य होते हुए भी अपना विश्वास बनाए रखा. अपना काम नहीं छोड़ा. अपनी निष्ठा नहीं छोड़ी. और इस संस्था का हाथ नहीं छोड़ा.

यदि आज इस पूरे सफ़र की सबसे बड़ी उपलब्धि के बारे में मुझसे पूछा जाए, तो मेरा उत्तर… मुन्द्रा नहीं होगा, खावड़ा नहीं होगा, गोड्‌डा नहीं होगा और Navi Mumbai Airport भी नहीं होगा. मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि… आप हैं. हमारा अदाणी परिवार है. क्योंकि प्रोजेक्ट इंजीनियरिंग से बनते हैं. लेकिन महान संस्थाएं लोगों के चरित्र से बनती हैं.

कुछ समय पहले मैं खावड़ा गया था. 45 डिग्री से अधिक तापमान, तेज धूप, दूर-दूर तक फैला रेगिस्तान और उन कठिन परिस्थितियों में दिन-रात काम करते हमारे बहुत-से साथी. मैं वहां एक युवा इंजीनियर अमित कुमार से मिला. वह बिहार के एक छोटे-से गांव से था. मैंने उससे पूछा, “घर से इतने महीनों तक दूर रहकर इतनी कठिन परिस्थितियों में काम करना मुश्किल नहीं लगता?”

वह मुस्कुराया और बोला: “सर, मुश्किल तो लगता है. मां की याद भी आती है. लेकिन जब यह प्रोजेक्ट पूरा होगा तो मुझे जीवन भर गर्व रहेगा कि उसमें मेरा भी थोड़ा-सा योगदान है.”

मैंने उससे उसके परिवार के बारे में पूछा. उसने बताया कि उसकी मां की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे कम होती जा रही है. समय पर अच्छा इलाज उपलब्ध नहीं हो पाया. और उसे सबसे अधिक चिंता अपनी नौकरी की नहीं, अपनी मां की आंखों की थी.

उस दिन मैंने महसूस किया कि विकास केवल Ports, पावर प्लांट या Airports बनाने का नाम नहीं है. विकास किसी मां की आंखों में फिर से रोशनी लाने का नाम भी है. शायद उसी क्षण मेरे मन में एक विचार और स्पष्ट हुआ. यदि हम World-class Infrastructure बना सकते हैं, तो क्या हम लाखों लोगों के जीवन में नई रोशनी भी नहीं ला सकते?

बाद में बिहार के सफ़र के दौरान, जब अनेक परिवारों से मिला, तो महसूस हुआ कि यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं थी. यह बहुत-से परिवारों की कहानी थी. उसी अनुभव ने हमारी सोच को एक नई दिशा दी. और इसी भावना से अखंड ज्योति के साथ हमारी साझेदारी प्रारम्भ हुई.

आज यह केवल एक अस्पताल या आंखों के स्वास्थ्य की एक परियोजना नहीं है. यह इस विश्वास का विस्तार है कि किसी भी उद्योग की सबसे बड़ी सफलता तब होती है, जब उसका लाभ समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे.

मुझे यह कहते हुए भी संतोष होता है कि डॉ. प्रीति अदाणी के नेतृत्व में अदाणी फ़ाउंडेशन इसी सोच को देश के अनेक हिस्सों में पढ़ाई, स्वास्थ्य, पोषण, Women Empowerment और सामुदायिक विकास के माध्यम से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.
हम जानते हैं कि देश की आवश्यकताएं बहुत बड़ी हैं. हमारा योगदान उसकी तुलना में बहुत छोटा है. लेकिन यदि हम किसी एक परिवार के जीवन में आशा जगा सकें, यदि किसी एक बच्चे को बेहतर भविष्य दे सकें, यदि किसी एक मां की आंखों की रोशनी बचा सकें, तो वह कोशिश सार्थक है.

जब भारत अपनी आजादी के 100 वर्ष पूरे करेगा, तब इतिहास केवल यह नहीं पूछेगा कि हमने कितने Gigawatt की उत्पादन क्षमता स्थापित की. कितने पोर्ट बनाए. कितने Airports बनाए. इतिहास यह भी पूछेगा कि हमने कितने जीवन बदले. कितने सपनों को नई उड़ान दी. कितने परिवारों के जीवन में नई रोशनी लाई. और उस प्रश्न का उत्तर कोई रिपोर्ट नहीं देगी. कोई प्रोजेक्ट नहीं देगा. उस प्रश्न का उत्तर आपका योगदान देगा. आपकी निष्ठा देगी.

क्योंकि भारत का भविष्य किसी एक व्यक्ति के हाथों में नहीं, करोड़ों युवाओं के हाथों में है. और मुझे पूरा विश्वास है कि आपका योगदान भारत के उस भविष्य का सबसे प्रभावी उत्तर होगा.

वैसे बच्चन कहते ही हम सबके मन में सबसे पहले अमिताभ बच्चन जी का नाम आता है. लेकिन आज मैं Big B नहीं Bigger B की बात कर रहा हूं. जी हां, मैं डॉ. हरिवंश राय बच्चन की बात कर रहा हूं.

उन्होंने लिखा है: “तू न थकेगा कभी… तू न रुकेगा कभी…” बाकी कविता आप अवश्य पढ़िएगा. लेकिन इन दो पंक्तियों में मुझे जीवन का सार दिखाई देता है.

साथियों, जीवन में चुनौतियां आएंगी. वे आनी ही हैं. हमारे समूह के सामने भी आएंगी. आपके जीवन में भी आएंगी. कोई भी बड़ा सफ़र उनसे अछूता नहीं रहता. लेकिन जब भी जीवन आपके सामने कोई नया समुद्र मंथन लेकर आए, अपनी Values को मत छोड़िए. अपने चरित्र से समझौता मत कीजिए. अपने साथियों पर विश्वास रखिए. अपने परिवार पर विश्वास रखिए. अपने देश पर विश्वास रखिए. और सबसे बढ़कर सत्य पर विश्वास रखिए. क्योंकि जीवन ने मुझे यही सिखाया है कि मंथन से मत डरिए. मंथन मत रोकिए.

आज हमारी दूसरी मुलाकात थी. लेकिन हमारी बातचीत अभी पूरी नहीं हुई है. अभी बहुत-से सफ़र बाकी हैं. बहुत-सी कहानियां बाकी हैं. मुंद्रा की भी, खावड़ा की भी, धारावी की भी, Adani Foundation की भी और उन बहुत-से साथियों की भी जो इन कहानियों के वास्तविक नायक हैं.

हम फिर मिलेंगे. इसी अपनेपन के साथ. इसी विश्वास के साथ. इसी परिवार के साथ. मैं आप सभी को और आपके परिवारों को हृदय से प्रणाम करता हूं. आपका विश्वास ही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है. ईश्वर से केवल यही प्रार्थना करता हूं कि वह हम सबको स्वस्थ रखे, मजबूत रखे और मिलकर भारत की सेवा करने की शक्ति देता रहे.

आप सभी को और आपके परिवारों को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं.

धन्यवाद.

जय हिन्द. जय भारत.