फाइल स्टेट से एल्गोरिदमिक स्टेट तक, भारत में डिजिटल शासन का बदलता दौर

2014 के ‘फाइल स्टेट’ से डिजिटल-एल्गोरिदमिक स्टेट तक भारत के बदलाव को समझिए. आधार, UPI, DBT, डिजीलॉकर और ग्रामीण डिजिटल क्रांति ने शासन को कैसे बदला?

Satish Upadhyay

सतीश उपाध्याय (विधायक मालवीय नगर एवं उपाध्यक्ष दिल्ली जल बोर्ड).

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नरेंद्र मोदी के कार्यकाल को अक्सर चुनाव जीतने, जीडीपी ग्रोथ, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण और सामाजिक घटनाक्रमों के चश्मे से देखा जाता है. ये सभी पैमाने सही हो सकते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में उस मौलिक पहलू को नजरअंदाज कर दिया जाता है जो भावी इतिहासकारों के लिए सबसे ज्यादा मायने रखेगा—नागरिक और सरकार के बीच के रिश्ते में आया ऐतिहासिक बदलाव. मूल सवाल यह नहीं है कि भारत सरकार ने क्या हासिल किया, बल्कि सवाल यह है कि आज एक आम भारतीय सरकार को किस तरह महसूस और अनुभव करता है. इतिहास नरेंद्र मोदी को अंततः उस प्रधानमंत्री के रूप में याद रख सकता है, जिनके कार्यकाल में भारत ‘औद्योगिक-प्रशासनिक राज्य’ (Industrial-Administrative State) के पुराने ढांचे से निकलकर एक आधुनिक ‘डिजिटल-एल्गोरिदमिक राज्य’ (Digital-Algorithmic State) में परिवर्तित हो गया.

विरासत में मिला ‘फाइल स्टेट’

मई 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने पद संभाला, तब देश का प्रशासनिक ढांचा ब्रिटिश राज के समय से चले आ रहे पुराने ढर्रे पर ही टिका हुआ था, जहाँ आम नागरिक सरकार को केवल फाइलों, अर्जियों, अंतहीन लाइनों, लालफीताशाही और बिचौलियों के माध्यम से जानता था. सुधारों से पहले कल्याणकारी योजनाओं की स्थिति यह थी कि गरीबों के लिए आवंटित हर रुपये में से सिर्फ 15 पैसे ही असली लाभार्थी तक पहुँच पाते थे, जबकि बाकी 85 पैसे बिचौलियों की भेंट चढ़ जाते थे.
2014 में देश में इंटरनेट की पहुँच केवल 19 प्रतिशत (लगभग 24.3 करोड़ यूजर्स) तक सीमित थी, जन धन खातों का अस्तित्व नहीं था, और न ही UPI या डिजीलॉकर जैसी तकनीकों की अवधारणा थी. इसके अलावा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में चोरी और फर्जीवाड़े के कारण 40 प्रतिशत अनाज का नुकसान होता था तथा LPG सब्सिडी का अनुचित लाभ 5.4 करोड़ फर्जी कनेक्शन उठा रहे थे.

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जिस भारत पर शासन किया — ‘प्लेटफॉर्म स्टेट’

पिछले एक दशक में इस पुरानी व्यवस्था को JAM ट्रिनिटी (जन धन-आधार-मोबाइल) पर आधारित एक राष्ट्रीय डिजिटल स्टैक से बदल दिया गया. आज 1.38 अरब आधार नंबर जारी किए जा चुके हैं, जो देश की 99 प्रतिशत वयस्क आबादी को कवर करते हुए दुनिया का सबसे बड़ा बायोमेट्रिक पहचान तंत्र बन गया है. वित्त वर्ष 2024-25 में आधार ऑथेंटिकेशन की संख्या 2,707 करोड़ से अधिक रही. अगस्त 2014 से अब तक 56 करोड़ जन धन खाते खोले गए हैं, जिनमें से 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं और 67 प्रतिशत ग्रामीण व अर्ध-शहरी इलाकों में हैं; इन खातों में कुल जमा राशि 2.68 लाख करोड़ रुपये से अधिक है. प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) के माध्यम से फर्जी लाभार्थियों और बिचौलियों को बाहर कर 2024 तक 3.48 लाख करोड़ रुपये की सीधी बचत की गई है. लाभार्थियों की संख्या 11 करोड़ से बढ़कर 176 करोड़ पहुँच गई है, जिससे वेलफेयर एफिशिएंसी इंडेक्स 0.32 (2014) से बढ़कर 0.91 (2023) हो गया है. अकेले वित्त वर्ष 2024-25 में विभिन्न योजनाओं के तहत 6.9 लाख करोड़ रुपये सीधे नागरिकों के खातों में ट्रांसफर किए गए, जिससे कुल सब्सिडी खर्च सरकारी बजट के 16 प्रतिशत से घटकर 9 प्रतिशत पर आ गया. इस डिजिटल ढांचे की सबसे बड़ी रीढ़ यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) बनकर उभरा है. अप्रैल 2016 में शुरू हुए UPI ने वित्त वर्ष 2024-25 में 185.8 अरब ट्रांजैक्शन प्रोसेस किए, जो कैलेंडर वर्ष 2025 में बढ़कर 228.3 अरब हो गए और इनकी कुल वैल्यू 299.7 लाख करोड़ रुपये रही. 2026 के मध्य तक UPI प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ ट्रांजैक्शन हैंडल कर रहा है और वैश्विक रियल-टाइम पेमेंट ट्रांजैक्शन वॉल्यूम में भारत की हिस्सेदारी 49 प्रतिशत हो चुकी है, जिसे आईएमएफ (IMF) ने दुनिया का सबसे बड़ा रिटेल फास्ट-पेमेंट सिस्टम स्वीकार किया है. इसके साथ ही, जून 2025 तक डिजीलॉकर के 53.9 करोड़ यूजर्स हो चुके हैं, जिनके पास 940 करोड़ डिजिटल दस्तावेज सुरक्षित हैं.

ग्रामीण भारत में डिजिटल क्रांति

भारत के इस डिजिटल परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका मुख्य केंद्र बेंगलुरु या गुरुग्राम के तकनीकी शहर नहीं, बल्कि देश के गाँव और अर्ध-शहरी इलाके रहे हैं. देश के 95.8 करोड़ एक्टिव इंटरनेट यूजर्स में से 57 प्रतिशत ग्रामीण भारत से आते हैं, जहाँ इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या शहरी क्षेत्रों की तुलना में दोगुनी गति से बढ़ रही है. अप्रैल 2024 तक देश के 6,44,131 गाँवों में से 6,12,952 गाँवों (95.15 प्रतिशत) तक 3G या 4G कनेक्टिविटी पहुँच चुकी है, और ग्रामीण ब्रॉडबैंड योजना ‘भारतनेट’ ने 6,92,299 किलोमीटर ऑप्टिकल फाइबर बिछाकर 2,14,843 ग्राम पंचायतों को जोड़ दिया है. कृषि क्षेत्र में, राष्ट्रीय कृषि बाजार (e-NAM) प्लेटफॉर्म से 1.7 करोड़ किसान और 1,000 से अधिक मंडियाँ जुड़ चुकी हैं, जिसने पारंपरिक बिचौलियों के एकाधिकार को समाप्त किया है. PM-KISAN योजना के तहत 11 करोड़ किसानों के आधार-लिंक्ड खातों में 3.24 लाख करोड़ रुपये सीधे भेजे गए हैं, जिससे 2022 और 2024 के बीच किसानों द्वारा डिजिटल पेमेंट अपनाने की दर 11 प्रतिशत से बढ़कर 43 प्रतिशत हो गई है.

पूर्वोत्तर और सीमांत गाँव: ‘पहला गाँव’ दृष्टिकोण

शासन के इस नए मॉडल का सबसे स्पष्ट उदाहरण पूर्वोत्तर और भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के प्रति दृष्टिकोण में आया बदलाव है. दशकों से मुख्यधारा से कटे पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए विकास मंत्रालय ने 2014-15 से 2024-25 के बीच 6.11 लाख करोड़ रुपये खर्च किए और क्षेत्र का रेल बजट 2,122 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 10,440 करोड़ रुपये सालाना कर दिया. PMGSY के तहत 46,296 किलोमीटर लंबी ग्रामीण सड़कें बनाई गईं तथा 3,718 नए मोबाइल टावर लगाकर 5,366 गाँवों को नेटवर्क कनेक्टिविटी दी गई. ‘एक्ट ईस्ट Policy’ के तहत अगरतला-अखौरा रेल लिंक, भारत-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे और सितवे पोर्ट प्रोजेक्ट्स ने इस पूरे क्षेत्र को दक्षिण-पूर्व एशिया के नए प्रवेश द्वार में बदल दिया है. साथ ही असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम के बीच दशकों पुराने अंतर-राज्यीय सीमा विवादों को आपसी सहमति से सुलझाया गया है.

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नारी शक्ति: लाभार्थी से ‘निर्माता’ तक का सफर

डिजिटल और सामाजिक परिवर्तन ने महिलाओं को केवल योजनाओं के लाभार्थी से आगे बढ़ाकर आर्थिक निर्माता बनाया है. DAY-NRLM के तहत 83 लाख स्वयं-सहायता समूहों (SHG) से 9 करोड़ महिलाओं को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा गया, जिसके परिणामस्वरूप 1 करोड़ से अधिक ‘लखपति दीदी’ बन चुकी हैं. ‘नमो ड्रोन दीदी’ योजना के तहत 1,261 करोड़ रुपये के खर्च से 15,000 महिला SHG को कृषि ड्रोन और ट्रेनिंग दी जा रही है, जिससे प्रत्येक समूह सालाना कम से कम 1 लाख रुपये की अतिरिक्त आय अर्जित करेगा. इसके अलावा, उच्च शिक्षा में महिलाओं के नामांकन में 28 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और देश के 1.59 लाख DPIIT मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स में से 43 प्रतिशत की संस्थापक महिलाएँ हैं.

युवा, स्टार्टअप्स और गिग इकॉनमी

भारत आज अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम बन चुका है. 2016 में स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के समय मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स की संख्या महज 500 थी, जो 2026 के मध्य तक बढ़कर 2 लाख से अधिक हो चुकी है और इसमें 126 से ज्यादा यूनिकॉर्न शामिल हैं. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 51 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप्स टियर-II और टियर-III शहरों से उभर रहे हैं. असंगठित और गिग क्षेत्र के 40 करोड़ से अधिक श्रमिकों के लिए अगस्त 2021 में शुरू किए गए ई-श्रम पोर्टल पर 31.82 करोड़ वर्कर पंजीकृत हो चुके हैं, जिन्हें यूनिवर्सल अकाउंट नंबर (UAN) के जरिए 15 केंद्रीय योजनाओं और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ा गया है.

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नेशनल डिजिटल स्टैक और ‘विकसित भारत 2047’

भारत ने आधार (पहचान), UPI (पेमेंट), डिजीलॉकर (दस्तावेज) और उमंग (23 भाषाओं में 2,300 सेवाएँ) को मिलाकर एक एकीकृत ‘नेशनल ऑपरेटिंग सिस्टम’ तैयार किया है. पोषण ट्रैकर, आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और PM-किसान जैसे सिस्टम आपस में मिलकर नागरिक सेवा को पारदर्शी बना रहे हैं. वैश्विक मंच पर, G20 में ‘नई दिल्ली लीडर्स डिक्लेरेशन’ पर सर्वसम्मति बनाना, अफ्रीकी यूनियन को स्थायी सदस्यता दिलाना और 2026 में BRICS शिखर सम्मेलन का सफल नेतृत्व करना भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है. 2047 तक 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था और पूरी तरह विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य चार प्रमुख स्तंभों—युवा, गरीब, महिला और किसान पर आधारित है. यद्यपि ग्रामीण डिजिटल साक्षरता (27 प्रतिशत) और डेटा प्राइवेसी जैसी चुनौतियाँ मौजूद हैं, फिर भी शासन की दिशा पूरी तरह तय हो चुकी है. भारत अब ऐसा देश नहीं रहा जो अपनी सरकार को केवल डिजिटल बनाने की कोशिश कर रहा हो, बल्कि यह एक ऐसा राष्ट्र है जिसकी सरकार अपने मूल स्वरूप में ही डिजिटल, पारदर्शी और एल्गोरिदमिक हो चुकी है.

लेखक- सतीश उपाध्याय, विधायक मालवीय नगर एवं उपाध्यक्ष दिल्ली जल बोर्ड

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(डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई राय सिर्फ़ लेखक की है और यह News24, इसके मैनेजमेंट या इसके स्टाफ़ के विचारों को नहीं दिखाती है.)

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