पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से 'वनस्पति तेल' कम इस्तेमाल करने की अपील की. पहली बार में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन आप इसके पीछे एक आर्थिक गणित छिपी है. सवाल यह उठता है कि भारत, जो एक कृषि प्रधान देश है और पूरी दुनिया को अनाज खिलाता है, वह अपने खुद के खाने के तेल के लिए कैसे दूसरे देशों का मोहताज है.
तेल का गणित
भारत अपनी जरूरत का करीब 60% खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है. भारत हर साल लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये सिर्फ खाद्य तेल मंगाने पर खर्च कर रहा है. भारत सालाना करीब 160 लाख टन तेल (पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी का तेल) आयात करता है. यह पैसा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर एक बहुत बड़ा बोझ है.
भारत के किसान क्यों नहीं उगाते?
भारत में लाखों किसान हैं और करोड़ों हेक्टेयर जमीन, फिर भी हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हैं? एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक के हवाले से लिखा है कि इसके पीछे मुख्य कारण हैं कि चावल और गेहूं की तरह तिलहन (सरसों, मूंगफली) पर वैसी 'खरीद गारंटी' नहीं है. किसानों को डर रहता है कि अगर फसल खराब हुई या दाम गिरे, तो वे बर्बाद हो जाएंगे.
साथ ही उन्होंने बताया कि तिलहन को अक्सर ऐसी जमीन पर उगाया जाता है जहां पानी कम है और मिट्टी उपजाऊ नहीं है. इसमें होता यह है कि अगर खराब जमीन पर फसल उगाएंगे, तो पैदावार भी कम ही मिलेगी.
इसके अलावा उन्होंने बताया कि पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में मुफ्त बिजली और MSP के कारण किसान गेहूं-चावल उगाना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि तेल की फसलें आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद हो सकती हैं.
आत्मनिर्भर बनने का मास्टरप्लान
भारत सरकार ने अब 'नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयलसीड्स' शुरू किया है. इसका मकसद है कि 2030-31 तक तिलहन उत्पादन को 39 मिलियन टन से बढ़ाकर 70 मिलियन टन तक ले जाना. इसके लिए 10,103 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. इसके अलावा सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और सूरजमुखी के साथ-साथ अब राइस ब्रान (चावल की भूसी) और कपास के बीज से भी तेल निकालने की तकनीक पर फोकस किया जा रहा है.
पीएम नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से ‘वनस्पति तेल’ कम इस्तेमाल करने की अपील की. पहली बार में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन आप इसके पीछे एक आर्थिक गणित छिपी है. सवाल यह उठता है कि भारत, जो एक कृषि प्रधान देश है और पूरी दुनिया को अनाज खिलाता है, वह अपने खुद के खाने के तेल के लिए कैसे दूसरे देशों का मोहताज है.
तेल का गणित
भारत अपनी जरूरत का करीब 60% खाद्य तेल विदेशों से आयात करता है. भारत हर साल लगभग 1.61 लाख करोड़ रुपये सिर्फ खाद्य तेल मंगाने पर खर्च कर रहा है. भारत सालाना करीब 160 लाख टन तेल (पाम ऑयल, सोयाबीन और सूरजमुखी का तेल) आयात करता है. यह पैसा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर एक बहुत बड़ा बोझ है.
भारत के किसान क्यों नहीं उगाते?
भारत में लाखों किसान हैं और करोड़ों हेक्टेयर जमीन, फिर भी हम आत्मनिर्भर क्यों नहीं हैं? एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक के हवाले से लिखा है कि इसके पीछे मुख्य कारण हैं कि चावल और गेहूं की तरह तिलहन (सरसों, मूंगफली) पर वैसी ‘खरीद गारंटी’ नहीं है. किसानों को डर रहता है कि अगर फसल खराब हुई या दाम गिरे, तो वे बर्बाद हो जाएंगे.
साथ ही उन्होंने बताया कि तिलहन को अक्सर ऐसी जमीन पर उगाया जाता है जहां पानी कम है और मिट्टी उपजाऊ नहीं है. इसमें होता यह है कि अगर खराब जमीन पर फसल उगाएंगे, तो पैदावार भी कम ही मिलेगी.
इसके अलावा उन्होंने बताया कि पंजाब-हरियाणा जैसे राज्यों में मुफ्त बिजली और MSP के कारण किसान गेहूं-चावल उगाना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि तेल की फसलें आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद हो सकती हैं.
आत्मनिर्भर बनने का मास्टरप्लान
भारत सरकार ने अब ‘नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयलसीड्स’ शुरू किया है. इसका मकसद है कि 2030-31 तक तिलहन उत्पादन को 39 मिलियन टन से बढ़ाकर 70 मिलियन टन तक ले जाना. इसके लिए 10,103 करोड़ रुपये का बजट रखा गया है. इसके अलावा सरसों, मूंगफली, सोयाबीन और सूरजमुखी के साथ-साथ अब राइस ब्रान (चावल की भूसी) और कपास के बीज से भी तेल निकालने की तकनीक पर फोकस किया जा रहा है.