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कौन थे मुकुल रॉय? बंगाल राजनीति के कैसे बने चाणक्य

मुकुल रॉय बंगाल राजनीति के दिग्गज नेता और तृणमूल कांग्रेस के संस्थापक सदस्य रहे हैं. अपनी संगठनात्मक कुशलता और चुनावी रणनीति के कारण उन्हें बंगाल की राजनीति का 'चाणक्य' कहा जाता है.

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Written By: Raja Alam Updated: Feb 23, 2026 08:44

पश्चिम बंगाल की राजनीति के दिग्गज नेता और पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का 73 वर्ष की आयु में कोलकाता के एक अस्पताल में निधन हो गया है. उन्होंने रात करीब 1:30 बजे अंतिम सांस ली. वह लंबे समय से गंभीर बीमारियों से जूझ रहे थे. मुकुल रॉय भारतीय राजनीति का एक ऐसा नाम हैं जिन्हें पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकारों में गिना जाता रहा है. उनका जन्म 17 अप्रैल 1954 को पश्चिम बंगाल के कांचरापाड़ा में हुआ था. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत युवा कांग्रेस के साथ की थी, लेकिन 1998 में जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाई, तब मुकुल रॉय इसके संस्थापक सदस्यों में से एक थे. लंबे समय तक उन्हें पार्टी में ममता बनर्जी के बाद दूसरा सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता रहा. वह संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और चुनाव प्रबंधन में माहिर थे, जिसके कारण उन्हें बंगाल की राजनीति का ‘चाणक्य’ भी कहा जाता था.

रेल मंत्री के रूप में राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ता कद

मुकुल रॉय का राष्ट्रीय राजनीति में कद तब बढ़ा जब उन्हें केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गईं. साल 2012 में जब दिनेश त्रिवेदी ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिया, तब मुकुल रॉय को देश का रेल मंत्री बनाया गया था. इससे पहले उन्होंने जहाज रानी मंत्रालय में राज्य मंत्री के रूप में भी अपनी सेवाएं दी थीं. रेल मंत्री के रूप में उनका कार्यकाल छोटा रहा लेकिन वह हमेशा चर्चाओं में बने रहे. राज्यसभा सदस्य के रूप में उन्होंने लंबे समय तक संसद में अपनी बात रखी और केंद्र व राज्य के बीच एक मजबूत कड़ी के रूप में काम किया. प्रशासनिक कार्यों पर उनकी पकड़ और फाइलों की गहरी समझ उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाती थी.

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यह भी पढ़ें: देश के पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय का निधन, ममता बनर्जी के करीबी थे, 2017 में TMC छोड़ BJP में हुए थे शामिल

टीएमसी से बीजेपी और फिर घर वापसी का घटनाक्रम

राजनीति के इस मंझे हुए खिलाड़ी के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उन्होंने 2017 में अपनी पुरानी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया. बीजेपी ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी और 2019 के लोकसभा चुनाव व 2021 के विधानसभा चुनाव में बंगाल में पार्टी को मजबूत करने का काम सौंपा. हालांकि 2021 के चुनाव परिणाम आने के कुछ समय बाद ही उन्होंने एक बार फिर चौंकाने वाला फैसला लिया और वापस टीएमसी में लौट आए. उनके इस कदम ने बंगाल की राजनीति में बड़ी हलचल पैदा कर दी थी. वह एक ऐसे नेता रहे जिन्होंने सत्ता की कमान संभाली और विपक्षी खेमे में रहकर भी अपनी महत्ता बनाए रखी.

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विवादों और व्यक्तिगत चुनौतियों के बीच राजनीतिक जीवन

मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर केवल उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्हें कई बार जांच एजेंसियों और विवादों का सामना भी करना पड़ा. नारदा और सारदा जैसे चर्चित मामलों में उनका नाम उछला, जिससे उनकी छवि पर राजनीतिक सवाल भी खड़े हुए. इसके साथ ही बीते कुछ वर्षों में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और व्यक्तिगत जीवन की चुनौतियों से भी जूझना पड़ा है. बावजूद इसके, बंगाल के राजनीतिक इतिहास में मुकुल रॉय का नाम एक ऐसे संगठनकर्ता के रूप में दर्ज है जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया. उनकी रणनीति और गठबंधन बनाने की कला आज भी नए राजनेताओं के लिए एक केस स्टडी की तरह देखी जाती है.

First published on: Feb 23, 2026 07:53 AM

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