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NCERT ने सिलेबस में किया बदलाव, सोशल साइंस में शामिल किया ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ चैप्टर

NCERT ने कक्षा 8 की नई सोशल साइंस के सिलेबस में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका अध्याय के अंतर्गत न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक खंड शामिल किया है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट।

Author Edited By : Raghav Tiwari
Updated: Feb 24, 2026 11:21

NCERT Syllabus: राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) ने कक्षा 8 के सिलेबस में बदलाव किया है। कक्षा 8 की नई सोशल साइंस के सिलेबस में हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका अध्याय के अंतर्गत न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर एक खंड शामिल किया है। NCRET ने इसके लिए सूचना जारी कर दी है।

इस अध्याय में न्यायिक व्यवस्था के सामने मौजूद “चुनौतियों” के रूप में “न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार” और “कई कारणों से मामलों का भारी लंबित बोझ- जैसे न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या का अभाव, जटिल कानूनी प्रक्रियाएं और कमजोर बुनियादी ढांचा” का जिक्र है।

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पुरानी पाठ्यपुस्तक में केवल न्यायपालिका की भूमिका, स्वतंत्र न्यायपालिका क्या है, अदालतों की संरचना और उन तक पहुंच का वर्णन था। उसमें भ्रष्टाचार का कोई उल्लेख नहीं था। हालांकि, उसमें एक अनुच्छेद था जिसमें कहा गया था कि आम व्यक्ति की न्याय तक पहुंच को प्रभावित करने वाले मुद्दों में अदालतों द्वारा मामलों की सुनवाई में लगने वाले सालो की देरी भी शामिल है। उसमें कहा गया था कि “न्याय में देरी, न्याय से वंचित होना” (Justice delayed is justice denied) वाक्यांश का अक्सर उपयोग उस लंबे समय को दर्शाने के लिए किया जाता है जो अदालतें किसी मामले को निपटाने में लेती हैं।

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पुस्तक के अनुसार, साल 2017 और 2021 के बीच इस तंत्र के माध्यम से 1,600 से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं। इस लेख में गंभीर मामलों में न्यायाधीशों को हटाने के संवैधानिक प्रावधान की भी व्याख्या की गई है। इसमें कहा गया है, गंभीर आरोपों वाले मामलों में, संसद महाभियोग प्रस्ताव पारित करके न्यायाधीश को हटा सकती है।

ऐसे प्रस्ताव पर उचित जांच के बाद ही विचार किया जाता है, जिसके दौरान न्यायाधीश को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया जाता है। साथ ही, पुस्तक में जनता की चिंताओं को भी स्वीकार किया गया है। अध्याय में कहा गया है कि फिर भी, न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों पर लोगों को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है। गरीबों और वंचितों के लिए, इससे न्याय तक पहुंच का मुद्दा और भी गंभीर हो सकता है।

First published on: Feb 24, 2026 11:12 AM

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