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देश

हमें पावर नहीं चाहिए, RSS को समझना है तो अंदर आइये… संघ के 100 साल के सफर पर बोले मोहन भागवत

आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर मोहन भागवत ने मुंबई में स्वदेशी और भारतीय पहचान पर जोर दिया. उन्होंने 'इंडिया' की जगह 'भारत' बोलने और घर से संस्कार शुरू करने का आह्वान किया. पढ़िये मुंबई से राहुल पांडे की रिपोर्ट.

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Edited By : Raja Alam Updated: Feb 7, 2026 20:04

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने के मौके पर मुंबई में आयोजित कार्यक्रम में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने संगठन की विचारधारा और कार्यशैली पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने कहा कि संघ का काम दुनिया में अपने आप में अनोखा है जिसे देखने के लिए पांचों महाद्वीपों से लोग आते हैं. भागवत ने जोर देकर कहा कि संघ को दूर से नहीं समझा जा सकता. इसे जानने के लिए इसका हिस्सा बनकर अनुभव लेना जरूरी है. उन्होंने स्पष्ट किया कि 100 साल के सफर के बाद आज वे दुनिया को बता रहे हैं कि असल में संघ क्या है और इसका मकसद क्या है.

किसी का विरोध नहीं, देश का उत्थान ही लक्ष्य

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि संघ किसी दूसरे संगठन के मुकाबले या किसी के विरोध में खड़ा नहीं हुआ है. संघ का मुख्य उद्देश्य बिना किसी का विरोध किए निस्वार्थ भाव से देश के लिए काम करना है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि संघ को सत्ता या पावर की भूख नहीं है. संघ केवल उन सभी नेक कामों को आगे बढ़ाने का माध्यम है जो देश के हित में चल रहे हैं. 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र करते हुए उन्होंने याद दिलाया कि एकजुटता की कमी के कारण हम अपने ही घर में विदेशियों से हार गए थे. संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जन्मजात देशभक्त थे और उन्हीं के पदचिह्नों पर संघ देश सेवा में लगा है.

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इंडिया नहीं ‘भारत’ बोलें, अपनी पहचान पर करें गर्व

दूसरे सत्र में मोहन भागवत ने स्वबोध और स्वदेशी की भावना पर गहरा जोर दिया. उन्होंने सवाल उठाया कि हम खुद को ‘इंडिया’ से क्यों कहें, जब हम ‘भारत’ से हैं. भागवत के अनुसार सामान्य शब्दों का अनुवाद हो सकता है लेकिन विशेष नाम और पहचान को बदला नहीं जा सकता. भारतीयों की अपनी भाषा, वेशभूषा और जीवनशैली है जिस पर हर नागरिक को गर्व होना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारतीय पहचान केवल अंग्रेजी शब्दों से नहीं बल्कि हमारी सोच और परंपराओं से बनती है. अगर हम अपनी जड़ों को भूलेंगे तो आने वाली पीढ़ी का देश से दूर होना तय है.

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घर से शुरू करें बदलाव, संस्कारों में लाएं स्वदेशी

सांस्कृतिक चेतना को लेकर उन्होंने कड़ा संदेश दिया कि बदलाव की शुरुआत समाज या स्कूल से नहीं बल्कि अपने घर से होनी चाहिए. उन्होंने उदाहरण दिया कि तकिए पर ‘वेलकम’ की जगह ‘सुस्वागतम’ लिखा जा सकता है और हस्ताक्षर के लिए विदेशी भाषा का दबाव जरूरी नहीं है. भागवत ने टोकते हुए कहा कि ‘मम्मी-पापा’ की जगह ‘माता-पिता’ बोलने में संकोच कैसा. बच्चों के संस्कृति से दूर जाने की शिकायत करने से पहले माता-पिता को आत्ममंथन करना होगा. अगर घर के भीतर भाषा, भोजन, भजन और रहन-सहन में भारतीयता होगी, तो अगली पीढ़ी अपने आप अपनी जड़ों से जुड़ी रहेगी.

First published on: Feb 07, 2026 07:56 PM

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