Justice Ujjal Bhuyan On Judicial Appointments: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शनिवार, 1 अगस्त को जजों के अपॉइंटमेंट प्रॉसेस में ज्यादा ट्रांस्पेरेंसी की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि नागरिकों को ये जानने का अधिकार है कि न्यायधीशों की नियुक्ति कैसे होती है और कुछ खास उम्मीदवारों की ही सिफारिश क्यों की जाती है.
जस्टिस भुइयां ने जताई फिक्र
'विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी' की 'JALDI' इनिशिएटिव की एक रिपोर्ट जारी होने के मौके पर बोलते हुए, जस्टिस भुइयां ने चिंता जताई कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पिछले 3 फैसलों (रिजॉल्यूशन) में सिफारिशों के पीछे की वजहें नहीं बताई गई थीं. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ये पारदर्शिता के उस सिद्धांत से पीछे हटने जैसा है, जिसके आधार पर पहले नियुक्तियां होती थीं.
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'नागरिकों को जानने का हक'
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम के पुराने फैसलों में आम तौर पर कम से कम संक्षिप्त जानकारी तो दी ही जाती थी, भले ही वो बहुत डिटेल्ड न हों. उनके मुताबिक, ऐसी जानकारी से जनता को जजों की नियुक्ति का आधार समझने में मदद मिलती थी. उन्होंने कहा कि नागरिकों को ये जानने का हक है कि उनके जज कौन हैं, उन्होंने क्या फैसले सुनाए हैं और उनके सिलेक्शन के पीछे क्या कारण हैं; साथ ही, ऐसी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए.
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पहले की नियुक्ति को किया याद
पुरानी मिसाल का जिक्र करते हुए, जस्टिस भुइयां ने 2022 में पूर्व चीफ जस्टिस यूयू ललित के कार्यकाल में जारी कॉलेजियम के एक फैसले का जिक्र किया और उसे ठोस तर्कों वाला दस्तावेज बताया. उन्होंने 18 जनवरी 2023 के उस फैसले का भी जिक्र किया जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट के जज के तौर पर सौरभ कृपाल की नियुक्ति की सिफारिश को दोहराया गया था; उन्होंने कहा कि उन्हें इसके पीछे का तर्क सही लगा. हालांकि उन्होंने ये भी बताया कि सिफारिश दोहराए जाने के बावजूद, 3 साल से ज्यादा समय बीतने पर भी इस पर कोई आगे की कार्रवाई नहीं हुई.
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'काबिल जजों को नुकसान मुमकिन'
जस्टिस भुइयां ने चेतावनी दी कि नियुक्ति के कारणों को दर्ज न करने से काबिल जजों का नुकसान हो सकता है और साथ ही अयोग्य उम्मीदवारों के न्यायपालिका में आने की गुंजाइश बन सकती है. उन्होंने कहा कि पारदर्शिता से संस्थान और जनहित, दोनों का भला होता है.
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अपने बयान पर दी सफाई
अपनी बात को क्लियर करते हुए, जस्टिस भुइयां ने कहा कि 'असंवैधानिक टिप्पणियों' का उनका जिक्र इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक पूर्व जज द्वारा 2024 के एक कार्यक्रम में दिए गए बयानों से जुड़ा था. उन्होंने जोर देकर कहा कि उनके कमेंट्स न्यायपालिका के किसी मौजूदा सदस्य के खिलाफ नहीं थे, बल्कि उन्होंने जजों की नियुक्ति में संवैधानिक मूल्यों को बनाए रखने की अहमियत पर जोर डाला.
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