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Thermonuclear Bomb: थर्मोन्यूक्लियर बम, जिसे हाइड्रोजन बम भी कहा जाता है। यह परमाणु बम से कई गुना अधिक खतरनाक होता है। परमाणु बम और हाइड्रोजन बम में ताकत का अंतर समझना इसकी खतरनाक क्षमता को जानने का पहला कदम है।

परमाणु बम फिशन (Nuclear Fission) की प्रक्रिया पर काम करता है। इसमें यूरेनियम-235 या प्लूटोनियम-239 जैसे भारी तत्व टूटते हैं, जिससे भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है। जैसे 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर गिराया गया ‘लिटिल बॉय’ और ‘फैट मैन’ बम 15 किलोटन (15,000 टन टीएनटी) और 21 किलोटन के बराबर था। इस बम ने हिरोशिमा और नागासाकी शहर को तबाह कर दिया, जिसमें लाखों लोग तुरंत मारे गए और कई बाद में रेडिएशन से प्रभावित हुए लेकिन इसके द्वारा मचाई गई तबाही एक सीमित दायरे में थी।

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वहीं, हाइड्रोजन बम फ्यूजन (Nuclear Fusion) पर आधारित है, जो सूरज में होने वाली प्रक्रिया की तरह है। इसमें हाइड्रोजन के दो रूप, ड्यूटेरियम और ट्रिटियम, मिलकर हीलियम बनाते हैं और इस दौरान अकल्पनीय ऊर्जा निकलती है। जैसे, साल 1961 में परीक्षण किया जाने वाला रूस का ‘त्सार बोम्बा’ (1961) 50 मेगाटन (50 मिलियन टन टीएनटी) का था, जो हिरोशिमा में गिराए गए बम से 3,333 गुना ताकतवर था।

इसका मतलब है कि जहां परमाणु बम एक छोटे शहर को तबाह कर सकता है तो वहीं, हाइड्रोजन बम कई शहरों और उनके आसपास के इलाकों को मिटा सकता है। इसकी ताकत इतनी होती है कि यह पूरे मेट्रो सिटी को सेकंडों में राख में बदल सकता है। हाइड्रोजन बम में बहुत अधिक तापमान होता है, जो लगभग 100 मिलियन डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। यह अंतर ही हाइड्रोजन बम को इतना खतरनाक बनाता है, और यही वजह है कि इसे दुनिया का सबसे घातक हथियार माना जाता है। यह धरती को एक झटके में वीरान कर सकता है।

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कैसे काम करता है हाइड्रोजन बम?

हाइड्रोजन बम की कार्यप्रणाली समझना थोड़ा टेक्निकल है, लेकिन इसे आसान भाषा में समझें तो यह दो स्टेप में काम करता है। पहला स्टेप एक छोटा परमाणु बम (फिशन बम) का विस्फोट है। यह बम इतनी गर्मी और प्रेशर पैदा करता है कि तापमान लाखों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जैसा सूरज के केंद्र में होता है। इस गर्मी की जरूरत फ्यूजन प्रक्रिया शुरू करने के लिए होती है। इस स्टेप में यूरेनियम या प्लूटोनियम टूटता है, जो अपने आप में भारी ऊर्जा पैदा करता है।

दूसरा स्टेप फ्यूजन का है। इस गर्मी से हाइड्रोजन के दो रूप, ड्यूटेरियम और ट्रिटियम, आपस में मिलकर हीलियम बनाते हैं। इस प्रक्रिया में इतनी ज्यादा ऊर्जा निकलती है कि यह बम को परमाणु बम से कई गुना ताकतवर हो जाता है।

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इसके लिए लिथियम ड्यूटेराइड जैसे पदार्थ का यूज होता है, जो विस्फोट के दौरान ट्रिटियम बनाता है। यह पूरी प्रक्रिया इतनी तेज है कि एक सेकंड से भी कम समय में भयानक तबाही मचा सकती है।

यह वही प्रक्रिया है जो सूरज को उसकी ताकत देती है, लेकिन बम में इसे कंट्रोल्ड तरीके से तबाही के लिए यूज किया जाता है। इस जटिल लेकिन सुपर पावरफुल प्रक्रिया की वजह से हाइड्रोजन बम काफी खतरनाक होता है।

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इसमें भी होता है रेडिएशन

हाइड्रोजन बम में रेडिएशन होता है, और यह परमाणु बम से कहीं ज्यादा खतरनाक हो सकता है। इसके रेडिएशन को तीन हिस्से में समझा जा सकता है।

पहला हिस्सा

इसमें तुरंत रेडिशन होता है, जब बम फटता है परमाणु बम की क्रिया होती है। इससे तुरंत रेडिशन निकलता है। विस्फोट के समय गामा किरणें और न्यूट्रॉन जैसे आयनकारी विकिरण निकलते हैं, जो 3-5 किमी के दायरे में हर जीवित चीज को तुरंत खत्म कर सकते हैं।

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दूसरा हिस्सा

दूसरा हिस्सा रेडियोएक्टिव पार्टिकल्स फॉलआउट है। विस्फोट के बाद रेडियोधर्मी कण हवा में फैलते हैं और हवा या बारिश के साथ सैकड़ों किमी तक पहुंचते हैं। ये कण कैंसर, जेनेटिक डैमेज और दूसरी गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं। हाइड्रोजन बम में फिशन स्टेप की वजह से ज्यादा रेडियोधर्मी कण बनते हैं, जो फॉलआउट को और खतरनाक बनाता है।

तीसरा हिस्सा

तीसरा हिस्सा लॉन्ग टर्म इफेक्ट है। रेडियोधर्मी कण मिट्टी, पानी और हवा में सालों तक रह सकते हैं। ये खेती, पानी के स्रोत और इकोसिस्टम को बर्बाद कर देते हैं। EPA के मुताबिक, ये कण ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचा सकते हैं और क्लाइमेट चेंज को बढ़ा सकते हैं। ह्यूमन हेल्थ पर इसका असर कैंसर, ल्यूकेमिया और जेनेटिक म्यूटेशन के रूप में दिखता है। कुछ मॉडर्न हाइड्रोजन बम कम रेडिएशन वाले डिजाइन के हैं, लेकिन ज्यादातर में फॉलआउट का खतरा बहुत बड़ा होता है। इस वजह से हाइड्रोजन बम का रेडिएशन न सिर्फ तुरंत बल्कि पीढ़ियों तक नुकसान पहुंचा सकता है।

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दशकों तक प्रभावित रहा ये स्थान

1954 के ‘कैसल ब्रावो’ नाम के हाइड्रोजन बम के टेस्ट में 15 मेगाटन विस्फोट ने मार्शल आइलैंड्स में भारी फॉलआउट फैलाया, जिसने वहां के लोगों, जानवरों और पर्यावरण को दशकों तक प्रभावित किया।

किस देश के पास कितने हैं हाइड्रोजन बम

हाइड्रोजन बम बनाना टेक्निकली बहुत मुश्किल और महंगा है, इसलिए ये कुछ ही देशों के पास है। SIPRI, Arms Control Association के आधार पर कुछ ऐसे देश हैं, जिन्होंने इस सफल परीक्षण किया है और उनके पास यह बम है।

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संयुक्त राज्य अमेरिका

अमेरिका ने 1952 में पहला हाइड्रोजन बम टेस्ट (‘आइवी माइक’) किया। 2024 तक, अमेरिका के पास कुल 3,708 परमाणु हथियार हैं, जिनमें हाइड्रोजन बम जैसे B-41 (25 मेगाटन) और B-83 (1.2 मेगाटन) शामिल हैं। हाइड्रोजन बम की सटीक संख्या अज्ञात है, लेकिन इसका स्टॉक बहुत बड़ा माना जाता है। अमेरिका की मिसाइल और बॉम्बर टेक्नोलॉजी इसे और खतरनाक बनाती है।

रूस

1955 में पहला टेस्ट और 1961 में ‘त्सार बोम्बा’ (50 मेगाटन) का टेस्ट। रूस के पास 4,380 परमाणु हथियार हैं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है। हाइड्रोजन बम की संख्या गुप्त है, लेकिन रूस का स्टॉक सबसे ताकतवर माना जाता है। इसकी मिसाइल टेक्नोलॉजी इसे ग्लोबल थ्रेट बनाती है।

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यूनाइटेड किंगडम

यूके ने 1957 में पहला टेस्ट किया गया था। ब्रिटेन के पास 225 परमाणु हथियार हैं, जिनमें कुछ हाइड्रोजन बम शामिल हैं। यह संख्या सीमित है, लेकिन ब्रिटेन की ट्राइडेंट मिसाइल सिस्टम इसे प्रभावी बनाती है।

चीन

चीन ने 1967 में पहला टेस्ट किया था। चीन के पास 500 परमाणु हथियार हैं। हाइड्रोजन बम की संख्या अज्ञात है, लेकिन इसका स्टॉक तेजी से बढ़ रहा है। चीन की मिसाइल रेंज इसे एशिया और उससे बाहर खतरनाक बनाती है।

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फ्रांस के पास भी हैं ये बम

फ्रांस ने 1968 में पहला टेस्ट किया था। फ्रांस के पास 290 परमाणु हथियार हैं, जिनमें हाइड्रोजन बम शामिल हैं। संख्या अज्ञात है लेकिन फ्रांस का फोकस सटीक और मॉडर्न हथियारों पर है।

उत्तर कोरिया

2017 में हाइड्रोजन बम टेस्ट का दावा किया, लेकिन विशेषज्ञ इसे कम शक्तिशाली थर्मोन्यूक्लियर बम मानते हैं। उत्तर कोरिया के पास 50 परमाणु हथियार हैं, लेकिन हाइड्रोजन बम की संख्या संदिग्ध है। इस देश का मिसाइल प्रोग्राम काफी खतरनाक है।

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भारत

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में 1998 में पोखरण-2 टेस्ट में हाइड्रोजन बम का दावा किया गया है। भारत के पास 172 परमाणु हथियार हैं, लेकिन हाइड्रोजन बम की पुष्टि आधिकारिक तौर पर नहीं है।

पाकिस्तान

पाकिस्तान के पास 170 परमाणु हथियार हैं, लेकिन हाइड्रोजन बम की पुष्टि नहीं है।

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इजरायल

इजरायल अपनी न्यूक्लियर पॉलिसी को गुप्त रखता है। इस देश के पास 90 परमाणु हथियार होने के अनुमान है। हालांकि हाइड्रोजन बम की स्थिति साफ नहीं है।

इस देश के पास है सबसे पावरफुल हाइड्रोजन बम

रूस का ‘त्सार बोम्बा’ अब तक का सबसे ताकतवर हाइड्रोजन बम है। 30 अक्टूबर 1961 को आर्कटिक सर्कल में इसका टेस्ट हुआ, जिसकी शक्ति 50 मेगाटन थी। इसे 100 मेगाटन तक बनाया जा सकता था, लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए शक्ति कम की गई थी।

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इस विस्फोट ने 1,000 किमी दूर के घरों की खिड़कियां तक तोड़ दी थीं और इसका मशरूम क्लाउड 64 किमी ऊंचा गया था। आज रूस और अमेरिका के पास सबसे एडवांस्ड हाइड्रोजन बम हैं, जो छोटे लेकिन सटीक और ताकतवर हैं। रूस का स्टॉक सबसे बड़ा और ताकतवर माना जाता है, खासकर इसका मिसाइल डिलीवरी सिस्टम इसको दोगुना पावरफुल बनाता है।

अमेरिका के पास भी B-83 जैसे बम हैं, जो 1.2 मेगाटन के हैं, लेकिन ये त्सार बोम्बा जितने ताकतवर नहीं हैं। दोनों देशों की टेक्नोलॉजी इतनी एडवांस्ड है कि उनके बम अब छोटे साइज में ज्यादा डैमेज कर सकते हैं। फिर भी, त्सार बोम्बा का रिकॉर्ड आज तक कोई नहीं तोड़ पाया है।

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कितनी हो सकती है तबाही?

हाइड्रोजन बम का विस्फोट ऐसी तबाही लाता है, जिसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। यह पांच तरीके से डैमेज कर सकता है।

पहला

इसमें पहला चरण तुंरत विनाश है। 50 मेगाटन का बम 20-30 किमी के दायरे में सब कुछ मिटा देता है। इमारतें, सड़कें, लोग, पेड़-पौधे आदि सब कुछ सेकंडों में खत्म हो जाती हैं। इस दायरे में कोई नहीं बच सकता है। उदाहरण के लिए, त्सार बोम्बा के टेस्ट में 55 किमी दूर तक के पेड़ जल गए थे।

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दूसरा

दूसरा हीट वेव है। विस्फोट की गर्मी 100 किमी तक आग और जलन फैला सकती है। लोग और चीजें इतनी दूर तक जलकर राख हो सकते हैं।

तीसरा

रेडियोधर्मी फॉलआउट कई किमी तक फैल जाते हैं। ये कैंसर, जेनेटिक डैमेज और बीमारियां पैदा करते हैं। ये कण मिट्टी और पानी को सालों तक दूषित रखते हैं, जिससे खेती और पीने का पानी खत्म हो सकता है। कैसल ब्रावो टेस्ट इसका उदाहरण है, जहां फॉलआउट ने दूर-दूर तक तबाही मचाई थी।

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चौथा

चौथा इनवायरमेंटल डैमेज होता है। रेडिएशन और गर्मी ओजोन लेयर को नुकसान पहुंचाते हैं, जिससे सूरज की हानिकारक किरणें धरती तक पहुंचती हैं। यह क्लाइमेट चेंज को बढ़ाता है और इकोसिस्टम को बर्बाद करता है। पौधे, जानवर और समुद्री जीवन खत्म हो सकते हैं।

पांचवां

पांचवां सबसे बड़ा ह्यूमन लॉस है। अगर 50 मेगाटन बम न्यूयॉर्क जैसे शहर में फटे, तो लाखों लोग तुरंत मर सकते हैं। बचे हुए लोग रेडिएशन, भूख, पानी की कमी और बीमारियों से जूझेंगे। एक अनुमान के मुताबिक, 1 मेगाटन बम 8-10 किमी तक पूरी तबाही मचा सकता है, तो 50 मेगाटन का असर अकल्पनीय होगा। इसका असर सिर्फ लोकल नहीं, बल्कि ग्लोबल लेवल पर होगा, क्योंकि फॉलआउट और क्लाइमेट चेंज पूरी दुनिया को प्रभावित करेंगे।

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First published on: May 15, 2025 09:37 PM

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About the Author

Mohit Tiwari

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