भारतीय सेना के जवानों की शारीरिक ताकत बढ़ाने के लिए एक ह्यूमन एग्जोसूट बनाया गया है, जिसे राजस्थान के कोटा निवासी इंजीनियर गौरव राय ने बनाया है. केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के IDEX प्रोजेक्ट और अदिति प्रोग्राम के तहत इस एग्जोसूट के 3 वर्जन डेवलप किए गए हैं. इस एग्जोसूट का मकसद भारतीय सेना के जवानों की युद्ध क्षमता और शारीरिक सहनशक्ति को बढ़ाना है. युद्ध के दौरान पहाड़ों पर चढ़ते समय, दुर्गम पथरीले इलाकों में, रेगिस्तान या पानी में वजन उठाकर चलने के कारण जवानों पर पड़ने वाले शारीरिक दबाव और थकान को कम करना है. इस एग्जोसूट का ट्रायल हो चुका है और हरियाणा के सोनीपत जिले की लैब में टेस्टिंग चल रही है, जिसके सफल होने के बाद इसे सेना को सौंपा जाएगा.
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गौरव राय एग्जोसूट के 3 वर्जन बना चुके
इंजीनियर गौरव राय के ह्यूमन एग्जोसूट को ‘हनुमंता एक्सो’ कवच कहा जाता है. प्रोजेक्ट के तहत गौरव ने सबसे पहले ‘हनुमंता एक्सो-1’ बनाया, जिसका वजन करीब 15 किलोग्राम था और यह 80 किलोग्राम भार उठाने में सक्षम था. लेकिन इसका खुद का वजन ज्यादा बताया गया तो गौरव ने एडवांस वर्जन ‘हनुमंता एक्सो-1.1’ कवच बनाया, जिसका वजन 4 किलो कम होकर 11.1 किलो हो गया और यह 80 किलोग्राम वजन उठाने सकता है. सेना के सुझाव पर गौरव ने मोस्ट एडवांस वर्जन ‘हनुमंता एक्सो 1.2’ बनाया, जिसका वजन 7.5 किलोग्राम है और इसकी भार वहन क्षमता 60 किलोग्राम है. यह वर्जन AI से लैस है, जिसे डेढ़ महीने में ही बनाया गया है और इसके पेटेंट की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.
ह्यूमन एग्जोसूट से होने वाले दूसरे फायदे
डेल्टा स्प्रिंग सिस्टम पर बेस्ड ‘हनुमंता एक्सो’ कवच शारीरिक भार को जूतों के जरिए जमीन की ओर ट्रांसफर करता है. ‘हनुमंता एक्सो’ कवच पहनकर सेना के जवान 200 किलो तक वजन जैसे हथियार, गोला-बारूद और अन्य जरूरी सामान उठाकर चल सकेंगे और दौड़ भी सकेंगे. मॉडर्न टेक्नोलॉजी के चलते उनकी ताकत भी बढ़ेगी. खासतौर पर कठिन और चुनौतीपूर्ण इलाकों में, जहां भारी सैन्य सामान के साथ लंबी दूरी तय करना शारीरिक रूप से थकाने वाला होता है, वहां यह कवच ज्यादा फायदेमंद साबित होगा. सेना के जवान रेगिस्तान, बर्फीली पहाड़ियों और दुर्गम जंगलों में भारी हथियार और सामान लेकर घंटों गश्त करते हैं, जिस वजह से वे अकसर घुटनों और पीठ दर्द की समस्याओं से जूझते हैं. लेकिन कवच पहनने के बाद ऐसा नहीं होगा.
अटल इन्क्यूबेशन सेंटर में टेस्टिंग चल रही
भारतीय रक्षा विश्वविद्यालय के अधिकारियों के जरिए भारतीय सेना और DRDO के सामने कवच का प्रेजेंटेशन दे चुके हैं. इसकी सबसे बड़ी खासियत कम वजन, भारी और ज्यादा सामान उठाकर चलने की क्षमता है, ताकि सैन्य सामग्री उठाकर चलने पर जवानों को कम थकान महसूस हो. कवच का निर्माण कोटा में किया गया और सोनीपत के अटल इन्क्यूबेशन सेंटर में इसकी टेस्टिंग चल रही है. सेना की जरूरतों के हिसाब से इसमें जरूरी बदलाव भी किए जाएंगे. दरअसल, भारत सरकार देश की रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए नई टेक्नोलॉजी और इंजीनियरिंग सॉल्यूशन तलाश रही है. इसके तहत सबसे पहले जवानों पर पड़ने वाले शारीरिक दबाव को कम किया जाना है और भार के साथ उनकी शारीरिक क्षमता को बढ़ाना है.
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गौरव को पिता से मिला कवच का आइडिया
भारतीय सेना और DRDO के सामने कवच का प्रेजेंटेशन देते समय गौरव ने बताया कि उनके पिता सतेंद्र राय कारगिल योद्धा हैं और उनके भाई भी अग्निवीर हैं. सेना में देशसेवा करते हुए जब पिता सतेंद्र गश्त करते थे तो लंबे समय तक भारी बैग उनकी पीठ पर रहता था. इस वजह से उन्हें घुटनों और पीठ दर्द की शिकायत हुई, जो आज तक चल रही है. उन्होंने कहा कि सेना के हर जवान को यह समस्या होती है तो उन्होंने इसका समाधान सोचा और साल 2023 में AIC-IIT दिल्ली के सोनीपत कैंपस में कवच बनाना शुरू किया. कवच जवानों की पीठ पर लदे भार को जूतों के जरिए जमीन की ओर भेजता है, ठीक वैसे ही जैसे बिजली में अर्थिंग होती है. शरीर के मसल्स सिस्टम की तरह काम करते हुए पैरों की मूवमेंट के साथ एडजस्ट होता है और वजन कम करने में मदद करता है.