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Supreme Court News: केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए किसी विधेयक पर फैसला लेने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा समयसीमा निर्धारित किए जाने का विरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में केंद्र सरकार ने कहा है कि संविधान के मुताबिक कोई ‘सुप्रीम’ नहीं’ है। सुप्रीम कोर्ट, राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा नहीं तय कर सकता। बता दें कि गत 22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करके केंद्र सरकार को मामले में अपना जवाब पेश करने के लिए कहा था।
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बता दें कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए किसी बिल को मंजूरी देने के लिए समयसीमा निर्धारित की गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रेसिडेंशियल रेफरेन्स भेजा और 14 विषयों पर सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी। इन्हीं विषयों पर विचार करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चीफ जस्टिस बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5 जजों की संविधान पीठ का गठन किया था। पिछली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब दाखिल करने को कहा था। मंगलवार को प्रेसिडेंशियल रेफरेन्स पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है।
सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा निर्धारित करने का फैसला 8 अप्रैल 2025 को सुनाया था। संविधान के अनुच्छेद 200 और अनुच्छेद 111 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपालों को मिली शक्तियों पर तमिलनाडु, पंजाब और अन्य राज्यों ने सवाल उठाए जा रहे थे। तमिलनाडु की सरकार ने साल 2023 में एक याचिका सुप्रीम कोर्ट दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि तमिलनाड़ु में साल 2020 से 2023 तक 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन राज्यपाल RN रवि ने विधेयकों पर फैसला लंबित रख लिया था। कुछ विधेयकों को राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास भेज दिया था।
याचिका में कहा गया कि राष्ट्रपति और राज्यपाल द्वारा विधेयक मंजूर नहीं किए गए तो क्या विधेयक को मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है या निर्धारित नहीं की जा सकती। यह सवाल उठाते हुए याचिका दायर की गई थी, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए 3 महीने की समयसीमा निर्धारित कर दी थी। इसी फैसले पर राष्ट्रपति ने रेफरेन्स मांगा है।
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