…जब संजय गांधी ने 1976 में चलवाया था तुर्कमान गेट के पास बुलडोजर, जानिए- किसने बनवाया था ये गेट, कैसे पड़ा इसका नाम

बुधवार सुबह कड़कड़ाती ठंड और कर्फ्यू के बीच 30 बुलडोजरों ने फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास अवैध निर्माणों को जमींदोज कर दिया. स्थानीय लोगों ने इसका जमकर विरोध किया.

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साल 1976 में तुर्कमान गेट वाले इलाके में बुलडोजर चलाकर हजारों झुग्गियां तोड़ी गई थीं.

पुरानी दिल्ली के ऐतिहासिक तुर्कमान गेट की फिजाओं में बुधवार सुबह फिर वही कड़वाहट और धूल का गुबार था, जो 1976 के दौर में देखा गया था. बुधवार सुबह कड़कड़ाती ठंड और कर्फ्यू जैसे सन्नाटे के बीच जब 30 बुलडोजरों ने फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास अवैध निर्माणों को जमींदोज करना शुरू किया, तो इलाके के स्थानीय लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया. यह वही जगह है जहां कभी संजय गांधी के एक आदेश पर हजारों घर उजाड़ दिए गए थे. आज की कार्रवाई के पीछे दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश है. लेकिन इलाके में तनाव 1976 जैसा ही है. दिल्ली नगर-निगम ने कोर्ट के आदेश पर फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास बने दवाखाने और बारातघर को गिरा दिया. पुलिस पर स्थानीय लोगों ने पथराव किया, वहीं उन्हें भगाने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए.

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अब जानिए, कहानी 1976 में तुर्कमान गेट पर चले बुलडोजर की. इस दौरान संजय गांधी के आदेश पर हजारों की संख्या में घरों को गिरा दिया गया था.

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19 अप्रैल 1976 का वो दिन…

साल 1976 में देश में इमरजेंसी लागू थी. इस दौरान संजय गांधी के नेतृत्व में दिल्ली के सौंदर्यीकरण और जबरन नसबंदी का अभियान चल रहा था. प्रशासन ने तुर्कमान गेट के पास की झुग्गी-बस्तियों को गिराने का फैसला किया, जिसका स्थानीय लोगों ने कड़ा विरोध किया था. पुलिस ने भीड़ पर लाठीचार्ज और फिर गोलीबारी भी थी. प्रशासन की योजना थी कि यहां से झुग्गियों को हटाकर यमुना पार के क्षेत्रों में उन लोगों को बसा दिया जाए. इसके तहत ही 19 अप्रैल 1976 को वहां बुलडोजर चलाया गया था.

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तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद देखना चाहते थे संजय गांधी?

दिल्ली के सौंदर्यीकरण की योजना संजय गांधी की थी. बताया जाता है कि संजय गांधी ही चाहते थे कि तुर्कमान गेट के पास बसी हजारों झुग्गियों को हटाया जाए. इसके बारे में उन्होंने अपनी मां इंदिरा गांधी के सामने भी अपनी इच्छा रखी थी. लेखक कैथरीन फ़्रैंक ने इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं, ‘1976 की शुरुआत में संजय गांधी और उस वक्त डीडीए के उपाध्यक्ष जगमोहन एक दिन तुर्कमान गेट के दौरे पर गए थे. उस वक्त संजय गांधी उनसे कहा था कि तुर्कमान गेट से जामा मस्जिद दिखती ही नहीं. इसके बीच बहुत सारी झुग्गी-झोपड़ियां हैं.’

जगमोहन इस बातचीत को संजय गांधी का मौखिक आदेश मान लेते हैं. इस वाकये के छह दिन बाद ही डीडीए ने तुर्कमान गेट के पास के इलाके में बुलडोजर चला दिया. बताया जाता है कि उस वक्त हजारों की संख्या में झुग्गियां गिराई गई थीं. इन झुग्गियों में रहने वाले लोगों को यमुना पार बसाया गया था. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, उस वक्त इस कार्रवाई का बहुत विरोध हुआ था. पुलिस ने बेघर हुए प्रदर्शनकारियों के एक ग्रुप पर गोली भी चलाई थी, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई थी.

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‘एक पाकिस्तान तोड़कर दूसरा नहीं बनने देंगे’

बताया जाता है कि करीब 16 दिनों तक वहां बुलडोजर चला था. इस बीच स्थानीय लोग जगमोहन से मिलने पहुंचे थे. बीबीसी की रिपोर्ट में अजय बोस और जॉन दयाल की किताब, ‘फॉर रीजन्स ऑफ स्टेट डेल्ही अंडर इमरजेंसी’ के हवाले से लिखा है, कि जगमोहन से मिलने पहुंचे प्रतिनिधि मंडल ने उनसे मांग की थी कि हमें अलग-अलग बसाने की बजाय एक ही जगह शिफ्ट कर दिया जाए और ज्यादा दूर ना भेजा जाए. इसके जवाब में जगमोहन ने जवाब दिया था. ‘क्या हम पागल हैं कि एक पाकिस्तान तोड़ कर दूसरा पाकिस्तान बनने देंगे. हम आपको त्रिलोकपुरी और खिचड़ीपुर में प्लॉट देंगे. आपको वहां जाना पड़ेगा. अगर आप वहां नहीं जाते हैं और इसका विरोध जारी रखते हैं तो इसके नतीजे गंभीर होंगे.’

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कब बना था ये गेट

मुगल बादशाह शाहजहां ने 16वीं शताब्दी में दिल्ली को अपनी राजधानी बनाने का फैसला किया था. इससे पहले मुगलों की राजधानी आगरा हुआ करती थी. साल 1639 में जब शाहजहां ने पुरानी दिल्ली को बसाया तो उस वक्त इसका नाम शाहजहांनाबाद था. जब दिल्ली को बसाया जा रहा था तो शहर के चारों तरफ 14 गेट बनाए गए थे. शहर के दक्षिणी हिस्से में तुर्कमान गेट बनाया गया था. लाल बलुआ पत्थरों से बने तुर्कमान गेट में आपको मुगल शैली देखने को मिलेगी.

कैसे पड़ा इसका नाम

गेट का नाम 13वीं सदी के प्रसिद्ध सूफी संत हजरत शाह तुर्कमान बयाबानी के नाम पर रखा गया. वह कुतुब-उद-दीन बख्तियार काकी और इल्तुतमिश के समकालीन बताए जाते हैं. तुर्कमान गेट के पास ही उनकी दरगाह भी है, दादा पीर वाली दरगाह के नाम से भी जाना जाता है. यह संत एकांत जगह पर रहकर प्रार्थना करते थे. इसलिए ही इनके नाम के पीछे बयाबानी लगाये जाने लगा. बयाबानी का अर्थ होता है, जंगल.

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लेखक के बारे में

Arif Khan

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आरिफ खान मंसूरी न्यूज 24 में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर कार्यरत हैं. आरिफ को डिजिटल पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा अनुभव हैं. उन्होंने 2014, 2019 और 2024 के लगातार तीन लोकसभा चुनाव के अलावा पिछले 15 सालों में देशभर में हुए विधानसभा चुनावों की भी व्यापक कवरेज की है. न्यूज 24 से पहले उन्होंने देश के कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के साथ काम किया है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की थी, यहां देश, दुनिया और पॉलिटिक्स की खबरों पर काम किया. आरिफ ने इसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप की हिंदी वेबसाइट जनसत्ता के साथ अपनी पारी शुरू की. इसके बाद उन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स की हिंदी न्यूज वेबसाइट लाइवहिंदुस्तान ज्वाइन कर लिया. लाइवहिंदुस्तान.कॉम के बाद वह एनडीटीवी ग्रुप के साथ जुड़ गए. एनडीटीवी में करीब छह साल तक काम करने के बाद न्यूज24 के साथ जुड़ गए. न्यूज24 में भी होमपेज की जिम्मेदारी संभालते हैं. शैक्षणिक योग्यता की बात करें तो उन्होंने कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से कला संकाय में स्नातक और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री हासिल की है. आरिफ देश, विदेश और राजनीति से जुड़ी खबरों के अलावा एक्सप्लेनर लिखने में भी माहिर हैं.
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