महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा उलटफेर हो चुका है. शिवसेना (UBT) के छह बागी सांसद अब औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने के लिए पूरी तरह तैयार हैं. इन सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपना आधिकारिक पत्र भी सौंप दिया है, जिसके बाद अब पालाबदल महज एक औपचारिकता रह गया है. माना जा रहा है कि अगले हफ्ते तक यह प्रक्रिया पूरी हो जाएगी. महाराष्ट्र के इस ताजा सियासी घटनाक्रम के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं. इस पालाबदल के बाद लोकसभा में शिंदे गुट की ताकत बढ़कर अब सीधे 13 सांसदों की हो जाएगी.
लोकसभा में नंबर गेम बदला
इस नए समीकरण के बाद एकनाथ शिंदे की शिवसेना दिल्ली में महाराष्ट्र कांग्रेस के बराबर (13 सीटें) आ खड़ी हुई है. सबसे चौंकाने वाला बदलाव यह है कि राज्य में खुद को ‘बड़े भाई’ की भूमिका में रखने वाली भाजपा अब 9 लोकसभा सीटों के साथ तीसरे स्थान पर खिसक जाएगी.
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हालांकि, लोकसभा चुनाव के झटकों के बाद भाजपा ने विधानसभा चुनावों में 132 सीटें जीतकर अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. इतना ही नहीं, देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा ने शानदार कामयाबी हासिल की थी. कुल 6,859 वार्ड सीटों में से भाजपा ने अकेले 3,091 सीटें जीती थीं. नगर परिषद और नगर पंचायत अध्यक्षों के 288 पदों में से भाजपा के पास 117, शिंदे गुट के पास 53 और अजीत पवार की राकांपा (NCP) के पास 37 पद आए थे. इसके अलावा, बीएमसी (BMC) सहित ज्यादातर नगर निगमों के मेयर पदों पर भाजपा का कब्जा है, जबकि शिंदे ने ठाणे और कल्याण-डोंबिवली में अपना दबदबा कायम रखा है.
BJP ने क्यों दी ‘ऑपरेशन टाइगर’ को हरी झंडी?
एनडीटीवी ने अपनी रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से लिखा है, उद्धव गुट के इन 6 सांसदों के विद्रोह के पीछे भाजपा का ही हाथ है. दरअसल, मानसून सत्र के दौरान केंद्र सरकार महिला आरक्षण पैकेज के हिस्से के रूप में परिसीमन पर एक बेहद अहम संवैधानिक संशोधन विधेयक लाने जा रही है. इसे पास कराने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की सख्त जरूरत है. इसी नंबर गेम को साधने के लिए भाजपा ने शिंदे को इस ‘ऑपरेशन टाइगर’ के लिए ग्रीन सिग्नल दिया.
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इस रणनीति की तस्दीक गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान से भी होती है, जो उन्होंने शिवसेना के स्थापना दिवस के ठीक अगले दिन महाराष्ट्र दौरे पर दिया था. उन्होंने मुस्कुराते हुए साफ कहा था, ‘पहले एकनाथ शिंदे के नाम के आगे ‘शिंदे गुट’ लगाना पड़ता था, लेकिन अब कोई दूसरा गुट नहीं है; केवल एक ही ‘शिवसेना’ अस्तित्व में है.’
बता दें, इसी तरह का एक ऑपरेशन मानसून सत्र से ठीक पहले पश्चिम बंगाल में भी देखने को मिला, जहां ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 में से 20 सांसद टूटकर एनसीपीआई (NCPI) में शामिल हो गए, जिस पर अभी स्पीकर का फैसला आना बाकी है.
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दिल्ली में बढ़ेगा कद
महाराष्ट्र में भले ही देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के बीच मतभेदों की खबरें आती रहती हों और शिंदे समर्थक 2024 में मुख्यमंत्री पद न मिलने से निराश हों, लेकिन इस नए घटनाक्रम से शिंदे की सौदेबाजी की ताकत काफी बढ़ गई है. भाजपा पहले भी चुनाव में टिकट बंटवारे के वक्त शिंदे के अड़ियल रुख का सामना कर चुकी है.
अब 13 सांसदों के दम पर शिंदे की नजर मोदी मंत्रिपरिषद के संभावित फेरबदल पर टिकी हैं. फिलहाल, शिंदे गुट के पास केवल एक स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री पद है. लेकिन अब 13 सांसदों के साथ वे केंद्रीय कैबिनेट में बड़ी हिस्सेदारी मांगेंगे. संसद का गणित देखें तो 16 सांसदों वाली टीडीपी और 12 सांसदों वाली जदयू के पास एक कैबिनेट और एक राज्य मंत्री का पद है. इस लिहाज से 13 सांसदों के साथ शिवसेना का भी कैबिनेट बर्थ पर वैध दावा बनता है. चर्चा यह भी है कि बंगाल के बागी टीएमसी सांसदों को भी इसी फॉर्मूले के तहत कैबिनेट में जगह मिल सकती है.
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लक्ष्य 2029 – आदित्य ठाकरे बनाम श्रीकांत शिंदे?
एकनाथ शिंदे सिर्फ केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्य के ग्रामीण इलाकों और जमीनी स्तर पर भी पार्टी का विस्तार करने में जुटे हैं. उनके बेटे और सांसद श्रीकांत शिंदे इस समय राज्य के 160 विधानसभा क्षेत्रों के मैराथन दौरे पर हैं. पार्टी बीएमसी के पार्षदों को भी अपने पाले में लाने की तैयारी में है.
दिलचस्प बात यह है कि स्थापना दिवस पर जब श्रीकांत शिंदे को संगठन में बड़ा पद देने की मांग उठी, तो एकनाथ शिंदे ने इसे खारिज करते हुए कहा कि तरक्की केवल प्रदर्शन के आधार पर मिलेगी. राजनीति के जानकार इसे उद्धव ठाकरे के लिए एक सीधे संदेश के रूप में देख रहे हैं, क्योंकि कहा जा रहा है कि ये 6 बागी सांसद भी उद्धव द्वारा आदित्य ठाकरे को लगातार आगे बढ़ाने के फैसले से असंतुष्ट होकर ही अलग हुए हैं.
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2029 का सबसे बड़ा संकट
शिंदे की यह रणनीति सीधे तौर पर 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है. महाराष्ट्र में नंबर वन की पोजीशन को लेकर भाजपा और अविभाजित शिवसेना के बीच 1989 से ही खींचतान रही है. 1989 में भाजपा 22 और शिवसेना केवल 6 लोकसभा सीटों पर लड़ती थी. लेकिन 2019 तक आते-आते भाजपा 25 और शिवसेना 23 सीटों पर आ गई, जिसके लिए भाजपा को कल्याण और दक्षिण मुंबई जैसे अपने गढ़ भी छोड़ने पड़े थे.
2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 28 और शिंदे ने 15 सीटों पर चुनाव लड़ा था. भाजपा का स्ट्राइक रेट केवल 32% (28 में से 9 जीत) रहा, जबकि शिंदे की शिवसेना का स्ट्राइक रेट 46.66% (15 में से 7 जीत) था. अजित पवार गुट को 4 में से केवल 1 सीट मिली थी.
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अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि शिंदे के साथ आ रहे 6 सांसदों में से 3 (नागेश पाटिल-अष्टीकर, संजय देशमुख और भाऊसाहेब) ने पिछले चुनाव में शिंदे गुट के ही उम्मीदवारों को मात दी थी. वहीं, धाराशिव से ओमप्रकाश राजेनिंबालकर ने अजित पवार गुट को बड़े अंतर से हराया था, संजय जाधव ने महायुति समर्थित महादेव जानकर को शिकस्त दी थी और संजय दीना पाटिल ने मुंबई उत्तर पूर्व में भाजपा के मिहिर कोटेचा को हराया था.
शिवसेना के एक वरिष्ठ नेता का दावा है कि ये सभी 6 सांसद इसी शर्त पर आ रहे हैं कि 2029 में उन्हें इसी सीट से दोबारा टिकट दिया जाएगा, और भाजपा भी इस पर सहमत हो गई है. अगर ऐसा होता है, तो शिंदे 2029 के लोकसभा चुनाव में सीधे 25 सीटों पर अपना दावा ठोकेंगे. हालांकि, कुछ नेताओं का मानना है कि तब तक परिसीमन के कारण राज्य में कुल सीटें बढ़ जाएंगी, जिससे सबको एडजस्ट करना आसान होगा.
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