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(Ashwani Kumar): मालिक का टीजर और ट्रेलर देखकर हर किसी के दिमाग में एक ही सवाल था कि उत्तर प्रदेश में 80 के दशक में सेट ये कहानी राजकुमार राव के इमेज ट्रांसफॉर्मेशन के लिए बड़ा माइल-स्टोन साबित होगी? ब्वॉय नेक्स्ट डोर की इमेज से बंधे राजकुमार राव पर शादी के चक्करों में फंसने का टैग कुछ ऐसे चिपक गया था कि डायरेक्टर्स उन्हें बार-बार ऐसे ही किरदार के पास ला रहे थे लेकिन राजकुमार को इससे पहले सुभाष चंद्र बोस बनाने का बिल्कुल अलग फैसला लेकर कामयाब हुए राइटर-डायरेक्टर पुलकित ने उन्हें फिर से एक टर्निंग प्वाइंट दे दिया है, मालिक के साथ।
मालिक का कोर एक यूपी के बाहुबली प्लस रिवेंज ड्रामा का है। दिलीप एक छोटी जाति का लड़का है, जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ता है। शादी पहले ही हो चुकी है और उसके पिता ऊंची जाति वालों के खेत में फसल उगाते हैं। इलाके के बाहुबली शंकर सिंह से इंस्पायर होकर दिलीप एक मजबूर बाप का मजबूत बेटा बनने चाहता है और उसके तेवर उसी के पापा को शंकर सिंह के गुंडों के ट्रैक्टर से घायल करवा देते हैं। बाप को जख्मी करने वालों से बदला लेने के लिए दिलीप, गुंडों को बीच चौराहे पर मारता है और मालिक बन जाता है। दबदबा और शोहरत बढ़ती है, तो मालिक के दुश्मन बढ़ते हैं और मालिक के विधायक बनने की चाह का रास्ता रोकने के लिए शंकर सिंह के साथ पुलिस की फौज भी मालिक को खत्म करने के लिए जुट जाती है।
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ढाई घंटे लंबी मालिक की कहानी का माहौल शुरुआत से सेट हो जाता है, जब पुलिस एनकाउंटर के बीच मालिक मौत बनकर खड़ा होता है। फिर कहानी बैकग्राउंड के साथ शुरू होती है। पुलकित और ज्योत्सना ने एक रिवेंज ड्रामा में इतने शॉकिंग मोमेंट डाले हैं कि आपको कहानी के बीच जोर से झटका लगता है और कहानी उस मोड़ पर जाकर खत्म होती है, जहां आपने उम्मीद भी नहीं की होती। जाहिर है मेकर्स ने मालिक के सेकंड चैप्टर की तैयारी पूरी कर ली है। शालिनी के साथ मालिक के रोमांटिक ट्रैक को कहानी में ऐसे पिरोया गया है कि वो स्टैंड आउट करता है। ये फिल्म 80 के दौर में सेट है और गैंग्स्टर ड्रामा नहीं, बल्कि यूपी के इलाहाबाद में वर्चस्व की लड़ाई है, जिसमें सब कुछ दांव पर है। इसलिए इसे केजीएफ के चश्मे से देखने की कोशिश ना कीजिए।
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80 के दशक के इलाहाबाद को दिखाने में सिनेमैटोग्राफर ने लोकेशन और कैमरे का इस्तेमाल अच्छा किया है। बैकग्राउंड स्कोर से लेकर मालिक का टाइटल ट्रैक और नामुमकिन गाना आपके साथ थियेटर से बाहर तक आता है। पुलकित का डायरेक्शन फिल्म को बांधे रखता है। मालिक पूरी तरह से राजकुमार राव की फिल्म है। दिलीप से मालिक बनने तक राजकुमार राव की बॉडी लैंग्वेज से लेकर उनकी आंखें तक गहरा असर करती हैं। एक्शन से लेकर बाहुबली वाले स्वैग तक राजकुमार राव ने जो ट्रांसफॉर्मेशन दिया है, उसके लिए तालियां बजनी चाहिए। दूसरी ओर शालिनी के किरदार में मानुषी छिल्लर ने भी अपनी परफॉरमेंस से चौंकाया है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और पूर्वांचल की बोली दोनों देखकर लगता है कि मानुषी अब सही ट्रैक पर आ गई हैं। एसपी प्रभुदास बने बंगाली सुपरस्टार प्रोसेनजीत ने बेहतरीन परफॉरमेंस दी है। उनका ग्रे शेड्स कैरेक्टर आपको चौंकाता है। विधायक बल्हार सिंह बने स्वानंद किरकिरे और सौरभ शुक्ला- शंकर सिंह के किरदार में इस फिल्म का असर बढ़ा देते हैं। सौरभ सचदेवा का काम भी बेहतरीन है।
मालिक बाहुबली ड्रामा है, गैंगवार और अंडरवर्ल्ड डोमेन की फिल्मों के शौकीनों के लिए ये एक मस्ट वॉच फिल्म है। A सर्टिफाइड है, तो बच्चों का थियेटर जाना मना है, लेकिन एडल्ट के लिए राजकुमार राव जैसे परफॉर्मर के लिए ये सीटी बजाने का मौका है।
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