भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी मानी जा रही है कि तमाम विरोधाभासों और हितों के टकराव के बावजूद सर्वसम्मति से 'New Delhi Declaration' पारित हुआ, जिसकी शुरुआत "We, the Leaders of BRICS Countries" से होती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ब्रिक्स की एकता और सहमति को ठोस नतीजों में बदलने का समय आ गया है. उन्होंने यह भी कहा कि बदलती हुई दुनिया का संचालन पुरानी संस्थाओं के ज़रिए नहीं किया जा सकता. इस बात का ज़िक्र भी हुआ कि दुनिया में तनाव तेज़ी से बढ़ रहा है और इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है.
ऐसे में अब सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली में ब्रिक्स मंथन से क्या निकला? भारत को इससे कितना फायदा हुआ? ब्रिक्स में नफा-नुकसान के तराजू पर भारत कहां खड़ा है? ब्रिक्स की छतरी तले चीन अपना किस तरह का फायदा देख रहा है? पिछले चार साल से यूक्रेन के साथ जंग लड़ रहे रूस को ब्रिक्स में अपने लिए संजीवनी क्यों दिख रही है? अमेरिका के साथ सीधी टक्कर ले रहे ईरान को ब्रिक्स में अपने लिए किस तरह की संभावनाएं नज़र आ रही हैं? क्या अब विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं की ब्रिक्स देशों को ज़रूरत नहीं है? क्या अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में ब्रिक्स के सदस्य डॉलर का विकल्प खड़ा कर पाएंगे? क्या ब्रिक्स देशों के बीच का आपसी अविश्वास और तनातनी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी? क्या दिल्ली ब्रिक्स समिट के दौरान दिखी भारत, चीन, रूस और ईरान की केमिस्ट्री को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हज़म कर पाएंगे? आज कुछ ऐसे ही गंभीर सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे, अपने खास कार्यक्रम में: ब्रिक्स का ‘दिल्ली मंथन’ कितने पास, कितने दूर?
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कूटनीति की बिसात और स्थायी हितों की जंग
अक्सर कहा जाता है कि कूटनीति में न कोई स्थायी दोस्त होता है और न कोई स्थायी दुश्मन… सिर्फ हित यानी 'Interest' स्थायी होता है. दिल्ली में ब्रिक्स समिट के दौरान भले ही साझा हितों और सहयोग की बात हुई हो, लेकिन सबके ज़हन में यही बात घूम रही होगी कि कैसे अपने मुल्क का अधिक से अधिक फायदा कराया जाए. सबके दिमाग में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी घूम रहे होंगे, जो लगातार अपने फैसलों से पूरी दुनिया में हलचल मचाए हुए हैं. भले ही ब्रिक्स से अमेरिका का सीधा लेना-देना न हो, लेकिन ब्रिक्स की इस मज़बूत गोलबंदी के बीच राष्ट्रपति ट्रंप हिसाब लगा रहे होंगे कि अब उन्हें किस-किस से और किस तरह से निपटना होगा.
कूटनीति में भले ही बहुध्रुवीय दुनिया की बात हो रही हो, लेकिन एक कड़वा सच यह है कि अमेरिका पश्चिम को अपनी जागीर की तरह देखता है, चीन पूरब को, तो मिडिल ईस्ट को ईरान अपना प्रभाव-क्षेत्र समझता है. यह ठीक उसी तरह है, जैसे 20वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शक्तियां किसी भी मुल्क को आपस में बांट लेती थीं. आज की तारीख में बाज़ार से लेकर शक्ति संतुलन साधने तक के मामले में महाशक्तियां दुनिया को अपने हिसाब से अघोषित रूप से बांटने की कोशिश करती दिखती हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि दिल्ली में ब्रिक्स मंथन से भारत को क्या मिला? भारत को किस तरह से फायदा होगा? क्या ब्रिक्स के सदस्य देश आपसी मतभेदों को भुलाकर वाकई एक-दूसरे का सहयोग करेंगे?
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विरोधाभासों के बीच भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत
दुनियाभर के तेज-तर्रार कूटनीतिज्ञों की नज़रें दिल्ली में ब्रिक्स समिट पर टिकी थीं. माना जा रहा था कि सदस्य देशों के आपसी हितों में जिस तरह का टकराव है, वैसी स्थिति में सर्वसम्मति से घोषणापत्र जारी होना बेहद मुश्किल होगा. लेकिन पूरी दुनिया ने देखा कि भारत किस तरह विरोधाभासों के बीच भी आम सहमति बनाने का हुनर रखता है. बिना किसी विरोध के 'BRICS New Delhi Declaration' जारी हुआ, जिसकी शुरुआत "We, the Leaders of BRICS Countries" से होती है. प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट कहा कि ब्रिक्स की एकता और सहमति को अब ठोस नतीजों में बदलने का समय है.
45 पन्नों के इस घोषणापत्र में 140 बिंदु शामिल हैं. घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले की कड़ी निंदा की गई है. साथ ही आतंकवाद की फंडिंग, सीमा पार आतंकवाद और आतंकवादियों को सुरक्षित पनाहगाह दिए जाने के खिलाफ मिलकर कार्रवाई करने की बात कही गई है.
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विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ एकतरफा टैरिफ, गैर-टैरिफ उपायों और संरक्षणवाद पर भी गहरी चिंता जताई गई है. दरअसल, ब्रिक्स के सदस्य देश अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों से परेशान हैं. प्रधानमंत्री मोदी भली-भांति जानते हैं कि आज की तारीख में किस तरह टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स को हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है. पीएम मोदी ने दो टूक कहा कि टेक्नोलॉजी और ज़रूरी खनिजों को हथियार की तरह इस्तेमाल करना गलत है, इससे दुनिया की तरक्की प्रभावित होती है. महामारी, जलवायु आपदाओं और सप्लाई चेन में आई रुकावटों ने यह साबित कर दिया है कि दुनिया परस्पर जुड़ी हुई है; एक जगह आया संकट दूसरे मुल्कों को भी अपनी चपेट में ले सकता है.
ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और व्यापार घाटे की कड़वी सच्चाई
भारत ने ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाने और एक मज़बूत व लचीली सप्लाई चेन तैयार करने पर ज़ोर दिया. अब सवाल उठता है कि दो दिनों तक दिल्ली में चले इस महामंथन से भारत के हाथ क्या आया? कूटनीतिज्ञों का मानना है कि ब्रिक्स के दिल्ली मंथन में भारत को एक बड़ी कूटनीतिक जीत हासिल हुई है. सदस्य देशों ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की स्थायी सदस्यता की मांग का पुरज़ोर समर्थन किया है. साथ ही यह आम सहमति बनी कि बदलती हुई दुनिया का संचालन पुरानी संस्थाओं से नहीं किया जा सकता, यानी UNSC समेत तमाम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व रणनीतिक संस्थाओं में सुधार अब अनिवार्य हो चुका है.
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ब्रिक्स के दिल्ली मंथन से भारत की पहचान 'ग्लोबल साउथ' के एक निर्विवाद नेता के रूप में और अधिक मज़बूत हुई है. दुनिया में जारी विभिन्न युद्धों के बीच भारत ने एक संतुलित नीति अपनाई है और वह रूस, चीन तथा ईरान जैसे देशों के शीर्ष नेताओं को एक मेज़ पर लाने में पूरी तरह कामयाब रहा, लेकिन विदेश नीति की सफलता से इतर जब आर्थिक मोर्चे की बात आती है, तो तस्वीर का दूसरा पहलू भी सामने आता है. वित्त वर्ष 2025–26 में ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा करीब 226 अरब डॉलर दर्ज किया गया. एक अध्ययन के मुताबिक पिछले 5 वर्षों में यह घाटा तीन गुना से भी अधिक बढ़ चुका है. ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि ब्रिक्स के विस्तार के साथ भारत का व्यापार घाटा और बढ़ेगा या इसमें कोई कमी आएगी?
मोदी-शी-पुतिन की केमिस्ट्री: फोटो-ऑप या सचमुच बदलाव?
समिट के दौरान एक तस्वीर की सबसे ज़्यादा चर्चा रही, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक ओर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग खड़े थे और दूसरी ओर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन. इससे ठीक एक दिन पहले की उस तस्वीर की भी खूब चर्चा हुई, जिसमें एक ही फ्रेम में मोदी, पुतिन और जिनपिंग मुस्कुराते हुए नज़र आ रहे थे. माना जा रहा है कि दिल्ली में दिखी यह केमिस्ट्री अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को कतई रास नहीं आ रही होगी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह तालमेल सिर्फ फोटो-ऑप (फोटो फ्रेम) तक ही सीमित है या चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग का सचमुच कोई हृदय परिवर्तन हुआ है?
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थोड़ा अतीत के पन्नों को पलटते हैं'ऑपरेशन सिंदूर'. भारतीय सेना के डिप्टी चीफ लेफ्टिनेंट जनरल राहुल आर. सिंह ने करीब एक साल पहले खुलासा किया था कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान चीन ने भारत की सैन्य तैनाती पर नज़र रखने के लिए अपने सैटेलाइट का इस्तेमाल किया था और पाकिस्तान को इसकी रियल-टाइम जानकारी साझा की थी. ऑपरेशन सिंदूर के जवाब में पाकिस्तान ने किस हद तक चीनी हथियारों का इस्तेमाल किया, यह भी किसी से छिपा नहीं है.
अब उसी दिल्ली की ज़मीन से राष्ट्रपति जिनपिंग कहते हैं कि "हम यानी भारत और चीन एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं और एक-दूसरे का समर्थन कर सकते हैं." लेकिन सवाल उठता है कि क्या लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) अपनी आक्रामक हरकतें बंद कर देगी? क्या आतंकवादियों को पनाह देने और भारत के खिलाफ साज़िशें रचने वाले पाकिस्तान को चीन हथियार और फंडिंग देना बंद करेगा? क्या वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में रोड़े अटकाना बंद करेगा?
बीजिंग की रणनीति: द्विपक्षीय बातचीत और शी जिनपिंग के 4 सुझाव
बीजिंग की दीर्घकालिक कूटनीति और रणनीतिक रुख में किसी बड़े बुनियादी बदलाव की संभावना कम ही दिखती है. संभवतः राष्ट्रपति जिनपिंग ब्रिक्स को एक ऐसे मंच के रूप में देख रहे हैं जहां 'मेड इन चाइना' उत्पादों को खपाने के लिए सुरक्षित बाज़ार मिल सके और दूसरा, अमेरिकी वैश्विक वर्चस्व को सीधी चुनौती दी जा सके.
प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग के बीच करीब 50 मिनट तक द्विपक्षीय वार्ता चली, जिसमें जिनपिंग ने रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए 4 मुख्य सुझाव दिए:
- भारत और चीन को वस्तुनिष्ठ और संतुलित रणनीतिक समझ के साथ आगे बढ़ना चाहिए.
- दोनों देशों को सहयोग और साझेदारी के ज़रिए साझा सफलता हासिल करनी चाहिए.
- आपसी सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर पुरानी बाधाओं को दूर करना चाहिए.
- बहुपक्षीय सहयोग को बढ़ावा देने और वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए मिलकर काम करना चाहिए.
शी जिनपिंग भारत में करीब 24 घंटे रहे. दिल्ली में उनकी हर मुलाकात और एक-एक भाव-भंगिमा के कूटनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं. सवाल यह भी उठा कि आखिर राष्ट्रपति जिनपिंग पीएम मोदी द्वारा आयोजित गाला डिनर में शामिल क्यों नहीं हुए?
चीन का दोहरा रवैया: विशाल बाज़ार की तलाश और FDI में संकोच
चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक सप्लाई चेन में उसका दबदबा सर्वविदित है. वह दुनिया की नंबर-एक आर्थिक महाशक्ति बनने की होड़ में अमेरिका को हर मोर्चे पर पछाड़ना चाहता है. ऐसे में अपनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार बनाए रखने के लिए राष्ट्रपति जिनपिंग ने हमेशा ब्रिक्स देशों के विशाल बाज़ार में संभावनाएं तलाशी हैं. ब्रिक्स का हर सदस्य देश आज चीन का एक अहम व्यापारिक साझेदार बन चुका है, जहां चीनी फैक्ट्रियों से निकला सस्ता माल धड़ल्ले से बिकता है.
वित्त वर्ष 2025–26 में अकेले भारत और चीन के बीच का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया. पिछले कुछ वर्षों से चीन के साथ भारत का व्यापार असंतुलन लगातार गहराता जा रहा है. इसकी प्रमुख वजह यह है कि चीन पर भारत की निर्भरता केवल तैयार उपभोक्ता वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर कच्चा माल, इंटरमीडिएट गुड्स और कैपिटल गुड्स भी चीन से ही आयात होते हैं.
ऐसे में राष्ट्रपति जिनपिंग को भारत के साथ स्थिर रिश्तों में अपना आर्थिक और व्यापारिक हित तो साफ दिखता है, लेकिन जब भारत में प्रत्यक्ष निवेश की बात आती है, तो चीन हमेशा हाथ खींच लेता है. अप्रैल 2000 से मार्च 2026 के बीच भारत में चीन से कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मात्र 2.51 अरब डॉलर ही आया. साफ है कि चीन ब्रिक्स के मंच का पूरा दोहन अपने आर्थिक लाभ के लिए करता रहा है, लेकिन वास्तविक मदद और पारस्परिकता के मामले में उसका रवैया हमेशा दोयम दर्जे का रहा है. चाहे सीमा का विवाद हो, पाकिस्तान का मामला हो, या अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकियों पर प्रतिबंध लगाने की बात, चीन की कथनी और करनी का अंतर जगज़ाहिर रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स के मंच से स्पष्ट संदेश दिया कि "हम किसी के खिलाफ नहीं हैं, हमारी सोच सबको साथ लेकर चलने की है." लेकिन कूटनीति का बुनियादी सवाल यह है कि भले ही हम किसी के खिलाफ न हों, इसका यह मतलब कतई नहीं कि बाकी मुल्क भी हमारे हितों के खिलाफ काम नहीं कर रहे. भारत सबको साथ लेकर चलना चाहता है, पर क्या दूसरे देश भी भारत के साथ पूरी ईमानदारी से कदमताल करने को तैयार हैं?
आज की तारीख में अमेरिका की जीडीपी 32 ट्रिलियन डॉलर से अधिक है. दूसरे नंबर पर चीन आता है, जिसकी अर्थव्यवस्था लगभग 21 ट्रिलियन डॉलर की है. इसके बाद यदि दुनिया की अगली तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ भी दिया जाए, तब भी चीन का पलड़ा भारी दिखता है. इसका सीधा अर्थ यह है कि वैश्विक मंच पर वर्चस्व की असली रस्साकशी अमेरिका और चीन के बीच है. चीन अपने उत्पादों को खपाने और 'वर्ल्ड इकोनॉमिक ऑर्डर' में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए ब्रिक्स को सबसे मुफीद ज़रिया मान रहा है.
पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरे रूस के लिए ब्रिक्स बना संजीवनी
अब बात करते हैं रूस की. राष्ट्रपति पुतिन पिछले चार वर्षों से यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझे हैं. इस लंबे युद्ध और पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूसी अर्थव्यवस्था लगातार दबाव में रही है. अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के बीच राष्ट्रपति पुतिन को कच्चे तेल के लिए भारत और चीन के रूप में दो सबसे बड़े और भरोसेमंद खरीदार मिले. आज की तारीख में भारत अपनी कुल तेल ज़रूरतों का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अकेले रूस से आयात कर रहा है.
यह भी एक ज़मीनी हकीकत है कि रूस और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार का बड़ा हिस्सा डॉलर की बजाय स्थानीय मुद्राओं (रुपया और रूबल) में हो रहा है; वहीं चीन और रूस के बीच लेन-देन युआन और रूबल में सिमट चुका है. ऐसे में पश्चिमी प्रतिबंधों से घिरे रूस के लिए ब्रिक्स की छतरी एक बहुत बड़ा बाज़ार और रणनीतिक सुरक्षा कवच साबित हो रही है.
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भली-भांति समझते हैं कि यूक्रेन युद्ध के कारण पश्चिमी बाज़ारों से कटने के बाद उनके मुल्क को कितना आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है. ऐसे दौर में ब्रिक्स का मंच रूस के लिए किसी राजनीतिक और आर्थिक टॉनिक से कम नहीं है. भारत और चीन रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े स्तंभ बने हुए हैं. अगस्त महीने में भारत के कुल कच्चा तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी करीब 45 फीसदी यानी लगभग 20.8 लाख बैरल प्रतिदिन दर्ज की गई. गौरतलब है कि यूक्रेन संकट से पहले भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का मात्र 2 से 3 प्रतिशत तेल ही रूस से खरीदता था. आज रूस भारत और चीन को भारी मात्रा में कच्चा तेल बेचकर अपने युद्ध-प्रभावित बजट को संभाल रहा है.
डॉलर के वर्चस्व को चुनौती: स्थानीय मुद्राओं में बढ़ता कारोबार
बीते कुछ वर्षों में अमेरिकी डॉलर के वैश्विक आधिपत्य को चुनौती देने और एक समानांतर वित्तीय व्यवस्था तैयार करने की कोशिशों ने ज़ोर पकड़ा है. भारत-रूस के बीच रुपया-रूबल और चीन-रूस के बीच युआन-रूबल व्यापार इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं. किसी एकल साझा मुद्रा के बजाय ब्रिक्स के सदस्य देश आपसी मुद्राओं में व्यापारिक लेन-देन को तेज़ी से बढ़ावा दे रहे हैं.
भारत और रूस ने वर्ष 2030 तक अपने द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है. हालांकि, दोनों देशों के बीच फिलहाल लगभग 50 अरब डॉलर का भारी व्यापार घाटा भारत के पक्ष में प्रतिकूल है. इस असंतुलन को पाटने के लिए भारत ने रूस को फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो पार्ट्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, केमिकल्स, टेक्सटाइल, कृषि और समुद्री उत्पादों का निर्यात बढ़ाने की आक्रामक रणनीति पर काम शुरू किया है.
पिछले कुछ वर्षों से अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए नई व्यवस्था बनाने की कोशिशें तेज हुई . इस कड़ी में भारत- रूस के बीच कच्चे तेल का कारोबार रुपया और रूबल में हो रहा है,तो चीन-रूस के बीच कारोबार यूआन और रुबल में हो रहा है. ऐसे डॉलर का विकल्प बनने की जगह ब्रिक्स के मंच से आपसी करंसी में लेन-देन का सिस्टम तेजी से आगे बढ़ रहा है. राष्ट्रपति पुतिन अच्छी तरह समझ रहे है कि आज की तारीख उनके मुल्क को भारत और चीन की कितनी जरूरत है .
रूस, सऊदी अरब, ईरान और यूएई जैसे तेल-समृद्ध देशों के शामिल होने के बाद ब्रिक्स समूह अब दुनिया के कुल कच्चे तेल उत्पादन का लगभग 41% से 47% हिस्सा नियंत्रित करता है. इसके बावजूद यह समूह अभी तेल कार्टेल (ओपेक जैसा) बनने से काफी दूर है. राष्ट्रपति पुतिन को ब्रिक्स में दोहरा लाभ दिखता है—एक तरफ विशाल बाज़ार की गारंटी और दूसरी तरफ पश्चिमी दबाव के खिलाफ एक सशक्त भू-राजनीतिक सुरक्षा कवच.
वैश्विक अलगाव से निकलने के लिए ईरान का रणनीतिक दांव
उधर, ईरान पिछले 6 महीनों से अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ एक गंभीर सैन्य व कूटनीतिक तनाव में उलझा हुआ है. इस टकराव का अंतिम परिणाम क्या होगा, इसका सटीक अंदाज़ा शायद खुद अमेरिकी नेतृत्व को भी नहीं है. ऐसे नाज़ुक मोड़ पर ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने देश को वैश्विक अलगाव से बाहर निकालने और नए कूटनीतिक रास्ते खोलने की है. इस लिहाज़ से ईरान के लिए ब्रिक्स से बेहतर कोई दूसरा वैश्विक मंच नहीं हो सकता.
ब्रिक्स सदस्यता के ज़रिए ईरान को अपने तेल और पेट्रोकेमिकल उत्पादों के लिए एक सुरक्षित बाज़ार मिल सकता है, साथ ही चीन और रूस जैसी महाशक्तियों के साथ अपने संबंधों को एक औपचारिक व संस्थागत आधार देने का अवसर भी. इसके अलावा, ईरान को भारत के रूप में एक ऐसा मित्र देश मिलता है, जिसकी स्वीकार्यता पूरब और पश्चिम दोनों खेमों में है और जिसके संबंध पूरे इस्लामिक जगत के साथ बेहद प्रगाढ़ और संतुलित हैं.
ईरान पिछले छह महीनों से पश्चिम एशिया में अमेरिका के सीधे निशाने पर है और पूरा इलाका युद्ध के मुहाने पर खड़ा है. ईरान उन ठिकानों और रणनीतिक क्षेत्रों को भी चुनौती दे चुका है जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं. वह लंबे समय से इस्लामिक दुनिया में एक प्रमुख शक्ति बनने की आकांक्षा रखता आया है. लेकिन अमेरिका और इज़रायल के साथ बढ़ते टकराव ने तेहरान को गहरे आर्थिक और सुरक्षा संकट में धकेल दिया है. इस भंवर से बाहर निकलने का रास्ता राष्ट्रपति पेज़ेशकियान को ब्रिक्स के विस्तार में ही नज़र आ रहा है. संभवतः यही कारण रहा कि यूएई और सऊदी अरब के साथ जारी तनावों के बावजूद ईरानी नेतृत्व दिल्ली में एक ही मेज़ पर बैठने के लिए तैयार हुआ.
ईरान के रिश्ते चीन और भारत दोनों के साथ ऐतिहासिक रूप से मधुर रहे हैं, वहीं मॉस्को और तेहरान के बीच भी रणनीतिक तालमेल मज़बूत हुआ है. वर्ष 2024 में ब्रिक्स का पूर्ण सदस्य बनने के बाद अब संकटों से घिरे ईरान को प्रतिबंधों का असर कम करने, व्यापार के नए गलियारे खोजने और वैश्विक कूटनीति में अपनी स्थिति मज़बूत करने की नई उम्मीद दिखी है.
अमेरिका की निगरानी और भारत के सामने भविष्य की चुनौतियां
दूसरी ओर, वाशिंगटन में बैठे अमेरिकी नीति-निर्माता भी हिसाब लगा रहे होंगे कि ब्रिक्स के इस नए शक्ति-प्रदर्शन का अमेरिका पर क्या प्रभाव पड़ेगा. एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव को थामने और मिडिल ईस्ट में अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए अब अमेरिका को नए सिरे से अपनी रणनीति बनानी होगी.
विश्व व्यवस्था में शक्ति का संतुलन तेज़ी से बदल रहा है और ब्रिक्स का निरंतर विस्तार इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है. समूह के सभी सदस्य देश अपने-अपने नफा-नुकसान और रणनीतिक प्राथमिकताओं के आधार पर इन रिश्तों को नए सांचे में ढाल रहे हैं. चीन को यहां अपने उत्पादों के लिए असीमित बाज़ार दिख रहा है, तो रूस को कच्चे तेल की निर्बाध बिक्री का भरोसा. प्रतिबंधों से जूझ रहे ईरान को कूटनीतिक ढाल और आर्थिक रास्ते मिल रहे हैं, लेकिन दिल्ली समिट की इस चकाचौंध के बाद भारत को अपने हितों का बेहद वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना होगा. यदि व्यापार की बात करें, तो ब्रिक्स देशों के साथ भारत का व्यापार घाटा चिंताजनक रूप से बढ़ रहा है, हम इन देशों से खरीद ज़्यादा रहे हैं और बेच कम पा रहे हैं.
सुरक्षा के मोर्चे पर भारत की सीमाएं दोहरी चुनौती का सामना कर रही हैं, एक तरफ चीन है और दूसरी तरफ पाकिस्तान. 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की गतिविधियां और पाकिस्तान को चीन से मिलने वाली सामरिक व आर्थिक मदद किसी से छिपी नहीं है. ऐसे में यह मान लेना कि दिल्ली में हाथ मिलाने भर से बीजिंग का चरित्र और नीतियां रातों-रात बदल जाएंगी, कूटनीतिक रूप से एक भूल होगी.
उधर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी यह तय करेंगे कि चीन की घेराबंदी और ईरान के रुख से कैसे निपटा जाए. यानी कूटनीति की बिसात पर मोहरों की चालें अब और तेज़ होने वाली हैं. ऐसे में भारत को बेहद संतुलित, सतर्क और व्यावहारिक कदम उठाने होंगे, ताकि अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बहुपक्षीय सहयोग की शोभा भी बनी रहे और किसी भी समझौते की मेज़ पर देश के सामरिक व आर्थिक हितों के साथ रत्ती भर भी समझौता न हो.