Saudi Arabia Big Decision: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल के जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के बाद सऊदी अरब ने बड़ा प्लान बनाया है. रियाद अपने लाल सागर (Red Sea) तट तक जाने वाली 'ईस्ट-वेस्ट क्रूड पाइपलाइन' की क्षमता को 20 लाख बैरल प्रति दिन (2 Million bpd) तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है.
सऊदी अरब के इस कदम का मकसद होर्मुज जैसे संवेदनशील और जोखिम भरे समुद्री रास्ते पर निर्भरता घटाना है. अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है, तो फारस की खाड़ी के देश अपने कच्चे तेल को बिना होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजारे सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंचा सकेंगे. इसे रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है.
पड़ोसी खाड़ी देशों से चल रही बातचीत
1980 के दशक में बनी मौजूदा ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूर्वी तेल क्षेत्रों से लाल सागर के यानबू पोर्ट तक रोजाना 70 लाख बैरल तेल पहुंचा सकती है. सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको (Aramco) के मुताबिक, इसमें से करीब 50 लाख बैरल तेल सीधे एक्सपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अब सऊदी अरब इस नेटवर्क का विस्तार करने के लिए कुवैत, बहरीन और कतर जैसे पड़ोसी देशों के साथ शुरुआती बातचीत कर रहा है. दरअसल, इन देशों के पास होर्मुज को बायपास करने का कोई सीधा विकल्प मौजूद नहीं है. कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने भी पुष्टि की है कि वे सऊदी के पाइपलाइन सिस्टम का इस्तेमाल करने को लेकर चर्चा में शामिल हैं.
अरबों डॉलर का खर्च और लंबा समय
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मेगा प्रोजेक्ट को पूरा करने में कई साल का वक्त लगेगा और इस पर अरबों डॉलर का खर्च आएगा. साथ ही इसके लिए तेल की कीमतें तय करने के मौजूदा तरीकों में भी कुछ बदलाव की जरूरत पड़ सकती है.
हालिया तनाव और होर्मुज में आई रुकावटों की वजह से खाड़ी देशों को अपना उत्पादन घटाना पड़ा था, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतें अचानक बढ़ गई थीं. ऐसे में सऊदी अरब की यह योजना भविष्य में तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है.
Saudi Arabia Big Decision: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल के जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने के बाद सऊदी अरब ने बड़ा प्लान बनाया है. रियाद अपने लाल सागर (Red Sea) तट तक जाने वाली ‘ईस्ट-वेस्ट क्रूड पाइपलाइन’ की क्षमता को 20 लाख बैरल प्रति दिन (2 Million bpd) तक बढ़ाने पर विचार कर रहा है.
सऊदी अरब के इस कदम का मकसद होर्मुज जैसे संवेदनशील और जोखिम भरे समुद्री रास्ते पर निर्भरता घटाना है. अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है, तो फारस की खाड़ी के देश अपने कच्चे तेल को बिना होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजारे सीधे वैश्विक बाजारों तक पहुंचा सकेंगे. इसे रणनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है.
पड़ोसी खाड़ी देशों से चल रही बातचीत
1980 के दशक में बनी मौजूदा ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पूर्वी तेल क्षेत्रों से लाल सागर के यानबू पोर्ट तक रोजाना 70 लाख बैरल तेल पहुंचा सकती है. सऊदी की सरकारी तेल कंपनी अरामको (Aramco) के मुताबिक, इसमें से करीब 50 लाख बैरल तेल सीधे एक्सपोर्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है. अब सऊदी अरब इस नेटवर्क का विस्तार करने के लिए कुवैत, बहरीन और कतर जैसे पड़ोसी देशों के साथ शुरुआती बातचीत कर रहा है. दरअसल, इन देशों के पास होर्मुज को बायपास करने का कोई सीधा विकल्प मौजूद नहीं है. कुवैत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन ने भी पुष्टि की है कि वे सऊदी के पाइपलाइन सिस्टम का इस्तेमाल करने को लेकर चर्चा में शामिल हैं.
अरबों डॉलर का खर्च और लंबा समय
विशेषज्ञों का मानना है कि इस मेगा प्रोजेक्ट को पूरा करने में कई साल का वक्त लगेगा और इस पर अरबों डॉलर का खर्च आएगा. साथ ही इसके लिए तेल की कीमतें तय करने के मौजूदा तरीकों में भी कुछ बदलाव की जरूरत पड़ सकती है.
हालिया तनाव और होर्मुज में आई रुकावटों की वजह से खाड़ी देशों को अपना उत्पादन घटाना पड़ा था, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में ईंधन की कीमतें अचानक बढ़ गई थीं. ऐसे में सऊदी अरब की यह योजना भविष्य में तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है.