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प्रशांत महासागर लगातार हो रहा है गर्म! दुनिया पर गहराया एल नीनो का खतरा, भारत पर क्या होगा असर

प्रशांत महासागर का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे एल नीनो के मजबूत होने की आशंका बढ़ गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर भारत के मानसून, खेती और मौसम पर पड़ सकता है. सरकार और मौसम वैज्ञानिक हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं.

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पिछले साल के इसी टाइम की तुलना में ट्रॉपिकल प्रशांत महासागर का तापमान काफी बढ़ गया है. इससे इस बात के नए सबूत मिलते हैं कि अल नीनो के असर के बीच दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण जलवायु क्षेत्रों में से एक में गर्मी बढ़ रही है. अमेरिकी नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के समुद्र की सतह के तापमान के रोज़ाना के आंकड़ों से पता चलता है कि 2026 में ‘नीनो 3.4’ इलाके का तापमान बढ़ गया. ये मध्य प्रशांत महासागर का एक खास हिस्सा है जिसका इस्तेमाल वैज्ञानिक ग्लोबल अल नीनो और ला नीना जलवायु पैटर्न पर नज़र रखने के लिए करते हैं.

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बढ़ रहा है तापमान

2026 में 1 जून से 4 जुलाई के बीच हर दिन ये इलाका 2025 की इसी अवधि की तुलना में ज़्यादा गर्म रहा. 4 जुलाई तक ये अंतर बढ़कर 1.64°C हो गया. इसके अलावा, 2025 और 2026 के बीच तापमान का अंतर 1 जून को 1.06°C था, जो 4 जुलाई तक बढ़कर 1.64°C हो गया. ये लगभग 55% की बढ़ोतरी है और इससे पता चलता है कि समुद्र कितनी तेज़ी से गर्म हो रहे हैं. ये तुलना ऐसे समय में की जा रही है जब भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जुलाई में सामान्य से कम बारिश का अनुमान लगाया है। विभाग का कहना है कि इक्वेटोरियल पैसिफिक में अल नीनो का असर बढ़ रहा है, जबकि भारत में पिछले सौ से ज़्यादा सालों में जून का महीना सबसे सूखा रहा है।

गर्म हो रहे हैं महासागर

NOAA के डाटा से पता चला है कि इस साल 1 जून को नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान 28.9°C था, जो 4 जुलाई को बढ़कर 29.23°C हो गया. वहीं, 2025 में इसी दौरान तापमान 27.84°C से घटकर 27.59°C हो गया था. इस साल सबसे ज़्यादा तापमान 19 जून को 29.41°C दर्ज किया गया, जबकि सबसे कम तापमान 1 जून को 28.90°C था. 2025 में, सबसे ज़्यादा तापमान 1-2 जून को 27.84°C और सबसे कम तापमान 28-29 जून को 27.52°C दर्ज किया गया. 29°C से ज़्यादा तापमान का लगातार बने रहना खास तौर पर ध्यान देने वाली बात है, क्योंकि समुद्र की गर्म सतहें वातावरण में ज़्यादा गर्मी और नमी छोड़ती हैं, जिससे प्रशांत महासागर से बहुत दूर तक बारिश के पैटर्न और वायुमंडलीय संचार पर असर पड़ता है.

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भारत पर क्या असर पड़ेगा?

भारत के लिए इसके नतीजे बहुत अहम हैं. दक्षिण-पश्चिम मॉनसून से देश में सालाना बारिश का लगभग 70% हिस्सा मिलता है और यह खेती, जलाशयों और पीने के पानी की सप्लाई में मदद करता है. ज़्यादा ज़ोरदार अल-नीनो (El Nino) के कारण अक्सर मॉनसून में सामान्य से कम बारिश, लू (heatwaves) और बारिश के असमान वितरण का खतरा बढ़ जाता है, हालांकि इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) और कम समय वाले मौसम सिस्टम जैसे बाकी जलवायु कारक भी अंतिम नतीजों पर असर डालते हैं. IMD ने पहले ही अनुमान लगाया है कि जुलाई में देश के ज़्यादातर हिस्सों में बारिश सामान्य से कम होगी, भले ही जुलाई की शुरुआत में बड़े पैमाने पर बारिश होने की उम्मीद है. ये अनुमान तब आया है जब भारत ने 1901 के बाद से जून का महीना पांचवां सबसे सूखा महीना देखा है. कई इलाकों में मॉनसून में देरी हुई, जिससे बारिश की कमी हुई और गर्मी के हालात सामान्य से ज़्यादा समय तक बने रहे. इस स्थिति को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंत्रालयों को बारिश की कमी से निपटने के लिए आकस्मिक योजनाएं (contingency plans) तैयार करने का निर्देश दिया है.

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First published on: Jul 07, 2026 04:36 PM

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