महाराष्ट्र के भिवंडी में बारिश के बीच चार मंजिला इमारत का एक हिस्सा गिरने से अब तक 6 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है. मुंबई और उसके आसपास के इलाकों में हर साल मानसून की शुरुआत के साथ ही जर्जर इमारतों के गिरने का सिलसिला शुरू हो जाता है. हर हादसे के बाद एक ही सवाल उठता है कि जब प्रशासन इमारत को खतरनाक घोषित कर चुका होता है, तो लोग उसे खाली क्यों नहीं करते?

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30 जुलाई, 2026 की रात जिस नारपोली, भिवंडी तालुका में कोहिनूर बिल्डिंग में हादसा हुआ, उसे भिवंडी-निजामपुर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन ने पहले ही खतरनाक घोषित कर दिया था. हालांकि, हादसा तब हुआ जब इसकी मरम्मत का काम अभी भी चल रहा था. इस बिल्डिंग में कुल 48 कमरे थे, जैसे ही रात 8.00 से 9.00 बजे के बीच बिल्डिंग से "कर…कर…कट…कट" की आवाज़ आई, कुछ परिवारों को तुरंत लोकल लोगों की मदद से सुरक्षित जगह पर पहुंचाया गया. हालांकि, जब कुछ लोग ज़िंदा थे और बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे, तभी बिल्डिंग का 'B विंग' वाला हिस्सा अचानक गिर गया.

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महाराष्ट्र के भिवंडी में बड़ा हादसा, चार मंजिला इमारत गिरी; अब तक 6 लोगों की मौत

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बीएमसी की C-1 सूची और जमीनी हकीकत

बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) हर साल बारिश से पहले मुंबई की पुरानी और जर्जर इमारतों का सर्वे करता है. सबसे ज्यादा खतरनाक और रहने के लिए अयोग्य इमारतों को C-1 कैटेगरी में रखा जाता है. साल 2026 के मानसून के लिए बीएमसी ने मुंबई में 337 इमारतों को C-1 श्रेणी में चिह्नित किया है. इन्हें तुरंत खाली कराने का नियम है, लेकिन नोटिस मिलने के बाद भी लोग मकान छोड़ने को तैयार नहीं होते.

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आखिर जोखिमभरे मकानों में क्यों रहते हैं लोग?

  • महंगा किराया: मुंबई में नया मकान किराए पर लेना बेहद महंगा है. पुरानी इमारतों में कम किराए या 'पगड़ी सिस्टम' पर रह रहे परिवारों के लिए अचानक नया घर तलाशना आर्थिक रूप से नामुमकिन जैसा होता है.
  • रीडेवलपमेंट में देरी: बिल्डरों और निवासियों के बीच विवाद, अदालती मामले और कागजी कार्रवाई के कारण पुनर्विकास परियोजनाएं सालों तक लटकी रहती हैं. लोगों को डर रहता है कि एक बार घर छोड़ दिया तो नया मकान कब मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
  • हक खोने का डर: दशकों से रह रहे परिवारों को लगता है कि अगर वे इमारत खाली कर देंगे, तो उन्हें पुनर्विकास के बाद अपना हक या नया फ्लैट मिलने में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है.
  • रोजी-रोटी और बच्चों की पढ़ाई: पुरानी इमारतें शहर के प्रमुख इलाकों में स्थित हैं, जहां से स्कूल, अस्पताल और काम की जगह पास होती है. कहीं दूर शिफ्ट होने से उनका पूरा दैनिक जीवन प्रभावित हो जाता है.

संसद और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की चिंता

देशभर में जर्जर इमारतों के गिरने की घटनाओं पर संसद में भी चर्चा हो चुकी है. केंद्र सरकार के मुताबिक, इमारतों की सुरक्षा और एनओसी का जिम्मा राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों का होता है. साल 2025 में विरार में हुए दर्दनाक इमारत हादसे में 17 लोगों की जान चली गई थी, जिसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने भी मामले का संज्ञान लिया था.
सच्चाई तो यह है कि केवल खाली करने का नोटिस थमा देने से समस्या हल नहीं होगी. जब तक बेघर होने वाले परिवारों को सुरक्षित अस्थायी आवास, पारदर्शी पुनर्वास नीति और तेजी से रीडेवलपमेंट का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक लोग मजबूरी में इन्हीं खतरनाक मकानों में रहने को मजबूर रहेंगे.

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