महाराष्ट्र में अहिल्यानगर जिले के नेवासा तालुका में स्थित सौंडाला गांव ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करते हुए ने खुद को जाति-मुक्त घोषित कर दिया है. गांव का नारा है - 'माझी जात मानव' यानी 'मेरी जाति - मानवता'. प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया है कि गांव में जाति, धर्म, पंथ या नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा. सभी निवासी समान होंगे और मानवता ही उनका एकमात्र धर्म होगा. यह गांव अहिल्यानगर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है और यहां की आबादी करीब 2,500 है. पिछले एक दशक में यहां कोई बड़ी जातिगत घटना या अत्याचार का मामला दर्ज नहीं हुआ है.
नहीं चाहते, हमारे दरवाजे तक पहुंचे नफरत: सरपंच
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, गांव सौंडाला में 65% आबादी जनरल कास्ट में मराठा की है, 20% अनुसूचित जाति (एससी) के लोग हैं, 15-20 ईसाई और कुछ मुस्लिम परिवार हैं. गांव में पहले से ही सद्भाव बना हुआ है, लेकिन ग्रामीणों ने समाज में बढ़ती नफरत और विभाजन को देखते हुए यह कदम उठाया है. सरपंच शरद अर्गड़े ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाते रहे कहा कि कहा, बीड़ जिले में लोग किराने की दुकान पर सामान खरीदने से पहले दुकानदार की जाति पूछते हैं. हम नहीं चाहते कि ऐसी नफरत हमारे दरवाजे तक पहुंचे." प्रस्ताव में कहा गया है कि गांव के सभी सार्वजनिक स्थान, सरकारी सेवाएं, पानी के स्रोत, मंदिर, श्मशान, स्कूल और सामाजिक आयोजन सभी के लिए खुले रहेंगे. सोशल मीडिया पर जातिगत तनाव फैलाने वाली पोस्ट पर गांव की ओर से कार्रवाई की जाएगी.
ईसाई, मुस्लिम, मराठा - सबके अधिकार समान
गांव के बच्चों में पहले से ही कोई भेदभाव नहीं दिखता. पांचवीं कक्षा की छात्रा गौरी भंड ने बताया कि हिंदू धार्मिक पाठ के दौरान उनकी मुस्लिम सहेली महिरा सय्यद भी उनके साथ भोजन करती है. "ईसाई, मुस्लिम, मराठा - सबके अधिकार समान हैं," उसने कहा. स्कूल के शिक्षक अशोक पंडित ने कहा, "ये बच्चे आपस में कोई भेदभाव नहीं करते, लेकिन वे हमेशा यहां नहीं रहेंगे. स्कूल सिर्फ पांचवीं तक है, आगे वे बाहर पढ़ने जाएंगे, कॉलेज जाएंगे. बाहर की दुनिया में उनके दिमाग में नफरत भर सकती है. अगर हम स्कूल स्तर पर ही भेदभाव खत्म कर दें, तो बाद में वे प्रभावित नहीं होंगे." गांव ने पहले भी प्रगतिशील फैसले लिए हैं. सितंबर 2024 में विधवा पुनर्विवाह के लिए 11,000 रुपये देने का प्रस्ताव पारित हुआ था, और नवंबर 2024 में महिलाओं को अपमानित करने वाली गालियों पर रोक लगाई गई थी.
महाराष्ट्र में अहिल्यानगर जिले के नेवासा तालुका में स्थित सौंडाला गांव ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करते हुए ने खुद को जाति-मुक्त घोषित कर दिया है. गांव का नारा है – ‘माझी जात मानव’ यानी ‘मेरी जाति – मानवता’. प्रस्ताव में स्पष्ट कहा गया है कि गांव में जाति, धर्म, पंथ या नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा. सभी निवासी समान होंगे और मानवता ही उनका एकमात्र धर्म होगा. यह गांव अहिल्यानगर से लगभग 60 किलोमीटर दूर है और यहां की आबादी करीब 2,500 है. पिछले एक दशक में यहां कोई बड़ी जातिगत घटना या अत्याचार का मामला दर्ज नहीं हुआ है.
नहीं चाहते, हमारे दरवाजे तक पहुंचे नफरत: सरपंच
बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, गांव सौंडाला में 65% आबादी जनरल कास्ट में मराठा की है, 20% अनुसूचित जाति (एससी) के लोग हैं, 15-20 ईसाई और कुछ मुस्लिम परिवार हैं. गांव में पहले से ही सद्भाव बना हुआ है, लेकिन ग्रामीणों ने समाज में बढ़ती नफरत और विभाजन को देखते हुए यह कदम उठाया है. सरपंच शरद अर्गड़े ने प्रस्ताव को आगे बढ़ाते रहे कहा कि कहा, बीड़ जिले में लोग किराने की दुकान पर सामान खरीदने से पहले दुकानदार की जाति पूछते हैं. हम नहीं चाहते कि ऐसी नफरत हमारे दरवाजे तक पहुंचे.” प्रस्ताव में कहा गया है कि गांव के सभी सार्वजनिक स्थान, सरकारी सेवाएं, पानी के स्रोत, मंदिर, श्मशान, स्कूल और सामाजिक आयोजन सभी के लिए खुले रहेंगे. सोशल मीडिया पर जातिगत तनाव फैलाने वाली पोस्ट पर गांव की ओर से कार्रवाई की जाएगी.
ईसाई, मुस्लिम, मराठा – सबके अधिकार समान
गांव के बच्चों में पहले से ही कोई भेदभाव नहीं दिखता. पांचवीं कक्षा की छात्रा गौरी भंड ने बताया कि हिंदू धार्मिक पाठ के दौरान उनकी मुस्लिम सहेली महिरा सय्यद भी उनके साथ भोजन करती है. “ईसाई, मुस्लिम, मराठा – सबके अधिकार समान हैं,” उसने कहा. स्कूल के शिक्षक अशोक पंडित ने कहा, “ये बच्चे आपस में कोई भेदभाव नहीं करते, लेकिन वे हमेशा यहां नहीं रहेंगे. स्कूल सिर्फ पांचवीं तक है, आगे वे बाहर पढ़ने जाएंगे, कॉलेज जाएंगे. बाहर की दुनिया में उनके दिमाग में नफरत भर सकती है. अगर हम स्कूल स्तर पर ही भेदभाव खत्म कर दें, तो बाद में वे प्रभावित नहीं होंगे.” गांव ने पहले भी प्रगतिशील फैसले लिए हैं. सितंबर 2024 में विधवा पुनर्विवाह के लिए 11,000 रुपये देने का प्रस्ताव पारित हुआ था, और नवंबर 2024 में महिलाओं को अपमानित करने वाली गालियों पर रोक लगाई गई थी.