12 महीने का मंथन, RSS की रजामंदी... बीजेपी की रणनीति का परिणाम जातीय जनगणना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और RRS के प्रमुख मोहन भागवत की मुलाकात के ठीक अगले ही दिन केंद्रीय कैबिनेट ने जातीय जनगणना को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। जानें क्या है पूरा मामला…

BJP strategy on caste census
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत की मंगलवार रात हुई मुलाकात के ठीक अगले ही दिन केंद्रीय कैबिनेट ने जातीय जनगणना को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी। इसके बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है कि क्या केंद्र सरकार ने यह फैसला संघ की रजामंदी के बाद लिया है?

प्रधानमंत्री आवास पर हुई इस बैठक में माना जा रहा है कि जातीय जनगणना पर चर्चा हुई थी। गौरतलब है कि आरएसएस ने पिछले साल सितंबर में केरल के पलक्कड़ में आयोजित अखिल भारतीय समन्वय बैठक में जातीय जनगणना का समर्थन किया था। उस समय संघ के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने इसे ‘राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी’ करार दिया था।

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संघ का रुख बदला?

पलक्कड़ बैठक के बाद आंबेकर ने कहा था कि देश और समाज के विकास के लिए सरकार को सही आंकड़ों की आवश्यकता है। कुछ जातियों के लिए विशेष योजनाएं जरूरी होती हैं। ऐसे में जनगणना उपयोगी हो सकती है, बशर्ते इसका इस्तेमाल जनहित और लोककल्याण के लिए हो, न कि राजनीतिक फायदे के लिए।

हालांकि इससे पहले, दिसंबर 2023 में संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी श्रीधर गाडगे ने नागपुर में जातीय जनगणना को निरर्थक और सामाजिक असमानता को बढ़ाने वाला बताया था। उनके इस बयान के बाद कांग्रेस ने संघ पर दलित और पिछड़ा विरोधी होने का आरोप लगाया था। इसके जवाब में सुनील आंबेकर ने बाद में स्पष्ट किया था कि जनगणना का मकसद समूचे समाज का उत्थान होना चाहिए और इससे सामाजिक एकता को नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

चुनावी समीकरण और राजनीतिक गणित

लोकसभा चुनाव 2024 में बीजेपी के प्रदर्शन पर भी इस फैसले का असर माना जा रहा है। पार्टी 400 पार के लक्ष्य से काफी दूर रह गई थी और उसे एनडीए के सहयोगियों के साथ सरकार बनानी पड़ी। खासतौर पर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन ने उसे गहरी चोट दी। वहीं बिहार जैसे राज्यों में भी जातीय राजनीति का प्रभाव दिखा।

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इस पृष्ठभूमि में माना जा रहा है कि बीजेपी और आरएसएस को यह स्पष्ट हो गया है कि देश के बड़े तबके की मांग जातीय जनगणना की है। यही वजह है कि आरएसएस के भीतर व्यापक विमर्श के बाद सरकार ने यह फैसला लिया। इसे विपक्ष की उस रणनीति को काटने के रूप में भी देखा जा रहा है, जिसके जरिए वह हिंदू मतों में विभाजन की कोशिश कर रहा था।

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विपक्ष से छीना बड़ा मुद्दा

जातीय जनगणना लंबे समय से कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का बड़ा राजनीतिक मुद्दा रहा है। अब जब केंद्र सरकार ने इस पर सहमति जताई है, तो माना जा रहा है कि उसने विपक्ष से यह मुद्दा छीन लिया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह फैसला न सिर्फ सामाजिक न्याय के मोर्चे पर महत्वपूर्ण है, बल्कि रणनीतिक रूप से भी बीजेपी को चुनावी लाभ दिला सकता है।

जातीय जनगणना को लेकर मोदी सरकार के फैसले ने राजनीतिक परिदृश्य में नई हलचल पैदा कर दी है। संघ की हालिया सहमति और शीर्ष नेतृत्व के बीच हुई बातचीत इस ओर संकेत करती है कि यह निर्णय व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सामाजिक संतुलन के साथ-साथ राजनीतिक बढ़त भी हासिल करना है।

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