Kumar Gaurav
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राज्यसभा में गुरुवार को बीजेडी सांसद मानस रंजन मंगराज ने राजधानी दिल्ली की खराब होती वायु गुणवत्ता को ‘मानव-जनित आपदा’ बताते हुए सरकार से आग्रह किया कि जब तक हालात सुधर न जाएं, संसद के शीतकालीन और बजट सत्र दिल्ली से बाहर आयोजित किए जाएं. शून्यकाल में मुद्दा उठाते हुए ओडिशा से आने वाले मंगराज ने अपने राज्य की प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की दक्षता का उदाहरण देते हुए कहा कि दिल्ली की प्रदूषण समस्या भी उतनी ही तात्कालिकता से संभालने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, ‘मैं ओडिशा से आता हूं एक ऐसा राज्य जो चक्रवात, बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं से अनुशासन के साथ लड़ता है. मुझे पता है असली संकट क्या होता है. लेकिन जो मुझे परेशान करता है… वो है दिल्ली.’
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सांसद ने बताया कि सांसदों, संसदीय अधिकारियों, ड्राइवरों, सफाईकर्मियों और सुरक्षा कर्मियों सहित हर वह व्यक्ति जो संसद को संचालित रखता है, रोज़ाना जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर है. ‘हम उनके दर्द को नजरअंदाज नहीं कर सकते. यह सामान्य नहीं है.’ उन्होंने कहा, उनके मुताबिक, साल के सबसे प्रदूषित महीनों में संसद सत्र आयोजित करना लोगों की सेहत को अनावश्यक खतरे में डालता है.
मंगराज ने भुवनेश्वर, हैदराबाद, गांधीनगर, बेंगलुरु, गोवा और देहरादून जैसे स्वच्छ हवा और पर्याप्त ढांचे वाले शहरों को वैकल्पिक विकल्प के रूप में सुझाव दिया. उन्होंने कहा, ‘अगर ओडिशा चक्रवात के समय कुछ घंटों में लाखों लोगों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचा सकता है, तो भारत सरकार भी अपने सांसदों और कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए संसद के दो सत्र कहीं और आयोजित कर सकती है.’
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सांसद ने स्पष्ट किया कि उनका प्रस्ताव किसी राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित नहीं है. यह राजनीति नहीं, जीवन और गरिमा का सवाल है. संसद को नेतृत्व दिखाना होगा, सांस लेने का अधिकार किसी भी निंदा से पहले आता है. उन्होंने सरकार से बिना देरी किए इस प्रस्ताव पर संरचित सलाह-मशविरा शुरू करने की मांग की, ताकि सर्दियों के महीनों में वायु गुणवत्ता बेहतर वाले शहरों में संसद सत्र घुमाकर आयोजित करने की संभावनाओं पर विचार हो सके.
गौरतलब है कि हर साल अक्टूबर से जनवरी के बीच दिल्ली की हवा बेहद ख़राब हो जाती है. पराली जलाने, वाहनों के धुएं, निर्माण धूल और मौसम संबंधी स्थितियों के कारण प्रदूषक हवा में फँस जाते हैं. इसी अवधि में संसद का शीतकालीन और बजट सत्र भी आयोजित होता है, जब प्रदूषण अपने चरम पर होता है.
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