क्रिकेट भारत में महज एक खेल नहीं है, यह करोड़ों लोगों की सांसों में बसता है. फैंस अपने खिलाड़ियों को सिर आंखों पर बिठाते हैं. अभी कुछ ही महीने पहले की बात है जब भारतीय टीम ने टी20 वर्ल्ड कप जीतकर पूरे देश को जश्न मनाने का मौका दिया था. हम लगातार दो बार खिताब जीतने और उसे डिफेंड करने वाली दुनिया की इकलौती टीम बने थे. लगा था कि भारतीय क्रिकेट अब अपने सबसे सुनहरे युग में जी रहा है.
लेकिन अचानक, जीत के ऊंचे शिखर से हमें एक ऐसी गहरी खाई में धकेल दिया गया है, जहां सिर्फ हार और सन्नाटा है. पहले आयरलैंड जैसी कमजोर टीम के सामने घुटने टेकना और अब इंग्लैंड के सामने बिना लड़े 5 मैच की सीरीज़ में 0-3 से सीरीज से पिछड़ जाना. ये सीरीज़ गंवाना सिर्फ हार नहीं, ये दिल तोड़ने वाला काम है जिसके बाद हर भारतीय क्रिकेट फैन का दिल रो रहा है.
ऐसी उथल-पुथल की क्या थी ज़रूरत?
हमारे बड़े बुजुर्ग अक्सर कहते रहे हैं कि जल्दबाज़ी का काम शैतान का होता है. भारतीय क्रिकेट की आज की स्थिति को देखकर यही बात सिलेक्टर्स और बीसीसीआई से करोड़ों फैंस भी पूछना चाहते होंगे. साल 2026 का टी20 वर्ल्ड कप जीतने के ठीक बाद अचानक इस सेटल टीम में इतने सारे बदलाव करने की क्या ज़रूरत आन पड़ी थी? क्या कोच और मैनेजमेंट उस सूर्यकुमार यादव पर थोड़ा और भरोसा नहीं कर सकते थे जिसने हमें वर्ल्ड चैंपियन का ताज पहनाया था?
अगर भविष्य के नाम पर कप्तानी छीननी ही थी, तो क्या श्रेयस अय्यर से पहले हार्दिक पांड्या इस जिम्मेदारी के असली हकदार नहीं थे? आखिर हार्दिक वर्ल्ड कप में उपकप्तान थे और टीम के लिए जान लड़ा चुके थे. इन अनसुलझे और चुभते सवालों ने करोड़ों भारतीय फैंस के दिलों में एक गहरी टीस पैदा कर दी है. एक जीती हुई बाजी को खुद अपने हाथों से कैसे हारना है, ये कोई मौजूदा मैनेजमेंट से सीख सकता है.
प्रयोग के नाम पर मैच विनर्स का 'अपमान'!
बीसीसीआई के सिलेक्टर्स और कोच गौतम गंभीर भले ही इसे भविष्य की टीम तैयार करने की मजबूरी बताएं. लेकिन ऐसा लग रहा है मानो भविष्य के नाम पर हमारी टीम के साथ भद्दा खिलवाड़ किया जा रहा है. पहले वर्ल्ड चैंपियन कप्तान सूर्यकुमार यादव से न सिर्फ कप्तानी छीनी गई, बल्कि उन्हें टीम से ही बेदखल कर दिया गया. संजू सैमसन ने वर्ल्ड कप में अपना सब कुछ झोंक दिया था, वो प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे थे. लेकिन इनाम में उन्हें क्या मिला?
सिर्फ तीन मैचों के बाद उन्हें इंग्लैंड में प्लेइंग-11 से और बाद में आगामी ज़िम्बाब्वे दौरे के स्क्वॉड से भी बाहर कर दिया गया. क्या वर्ल्ड चैंपियन खिलाड़ियों के साथ ऐसा सलूक होता है? ये खेल की भलाई नहीं, बल्कि मैच विनर्स का सीधा अपमान है. इंग्लैंड दौरे पर टी20 सीरीज़ में आक्रामकता के नाम पर ऐसी 'हाई रिस्क रणनीति' अपना ली गई है, जिसने सेटल टीम की लय बिगाड़ दी है.
कप्तान श्रेयस की 'बदकिस्मती' और जले पर नमक
जब टीम हारती है, तो फैंस अपने लीडर से जवाबदेही की उम्मीद करते हैं. लेकिन कप्तान श्रेयस अय्यर का मामला तो बदकिस्मती और बेबसी का एक अजीब मिश्रण बन गया है. श्रेयस को टी20 टीम की कप्तानी मिलना ही लाखों फैंस के लिए एक बहुत बड़ा झटका था. उनकी बदकिस्मती ऐसी है कि कमान संभालते ही जीत की गारंटी वाली टीम ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी. हार के बाद जब वो बात करते हैं, तो उनकी बातों में दर्द कम और बहाने ज्यादा नजर आते हैं.
वो बड़ी आसानी से कह देते हैं कि 'टीम बदलाव के दौर में है, हम गलतियां करेंगे और इससे सीखेंगे.' लेकिन ये कैसा बदलाव का दौर है जब टीम के 60-70 प्रतिशत खिलाड़ी तो वही हैं जो टी20 विश्व कप में भी खेल रहे थे? कप्तान का ये रटा-रटाया बयान हार से आहत फैंस के जले पर सीधा नमक छिड़कने का काम करता है. क्या हमारी बेंच स्ट्रैंथ इतनी कमज़ोर है कि आधी अधूरी आयरलैंड से भी हार जाए, इंग्लैंड के खिलाफ एक भी मैच में टक्कर ना दे पाए?
कोच गौतम गंभीर और अजीबोगरीब 'कुतर्क'
दूसरी तरफ हमारे हेड कोच गौतम गंभीर हैं, जिनका रवैया देखकर लगता ही नहीं कि उन्हें इस शर्मनाक हार का कोई मलाल है. वो कहते हैं कि, 'लगातार कुछ मैच गंवाने से आप बुरी टीम नहीं बन जाओगे.' वर्ल्ड चैंपियन टीम का कोच अगर हार को इतनी सहजता से स्वीकार करने लगे, तो फिर टीम के अंदर जीतने की वो आग कौन पैदा करेगा?
तीन दिन पहले जब तीसरे टी20 में भारत को इंग्लैंड के हाथों 125 रनों की करारी शिकस्त मिली थी, तो गंभीर का गुस्सा सातवें आसमान पर था. एक पत्रकार ने सिर्फ इतना कहा था कि टीम लगातार 5 मैच हार चुकी है. इस पर गंभीर भड़क गए और भरी प्रेस कॉन्फ्रैंस में उन्होंने कहा था कि 5 नहीं, हम सिर्फ 4 मैच हारे हैं और एक में तो बारिश आई थी. साथ ही ताना मारा, 'You should watch the game better.' ये जवाब यूं भी हार के बाद किसी कोच की मनोस्थिति की साफ-साफ बानगी देता है.
ब्रिस्टल का काला दिन और कोच गायब!
लेकिन बद्किस्मती का खेल देखिए, कोच साहब के उस बयान के ठीक दो दिन बाद ब्रिस्टल के मैदान पर टीम इंडिया फिर हार गई. इस बार कोई बारिश नहीं आई और सच में भारतीय टीम लगातार 5 टी20 मैच हार चुकी थी. जब हार का ये पांचवां कलंक माथे पर लगा, तो मैच के बाद गौतम गंभीर किसी भी पत्रकार के सामने नहीं आए. शायद उनके पास अब कोई बहाना नहीं बचा था. ये भारतीय क्रिकेट का वो अजीब दौर है जहां कहने के लिए टीम लगातार दो बार की टी20 वर्ल्ड चैंपियन है, लेकिन असलियत में हम एक ऐसी टीम बन चुके हैं जिसे कोई भी आकर पीट देता है. मैदान पर लड़ना तो दूर, टीम मैनेजमेंट ने अपनी गलतियों का बचाव करना ज्यादा जरूरी समझ लिया है. ये स्थिति न सिर्फ निराशाजनक है, बल्कि भारतीय क्रिकेट के भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा भी है.
शर्मनाक आंकड़े, जो इतिहास में दर्ज हो गए
हम भले ही खुद को दुनिया की सबसे मजबूत टीम मान लें, लेकिन इंग्लैंड दौरे से निकले आंकड़े इतने भयानक हैं कि कोई भी फैन अपना सिर पीट लेगा. भारतीय क्रिकेट इतिहास में पहली बार हम इंग्लैंड के खिलाफ किसी टी20 सीरीज़ में हारे हैं. साल 2019 के बाद ये पहला मौका है जब भारतीय टीम लगातार दो टी20 सीरीज़ हारी हो. श्रेयस अय्यर की कप्तानी के आंकड़े तो और भी खौफनाक हैं. उनकी कप्तानी में भारत लगातार 5 इंटरनेशनल मुकाबले गंवा चुका है. ब्रिस्टल में भारत का कभी न हारने का एक अजेय रिकॉर्ड था, वो भी अब खाक में मिल चुका है. 160 रनों का टारगेट चेज़ करते हुए इंग्लैंड ने सिर्फ 13 ओवर में 9 विकेट से हमें रौंद दिया. बची हुई गेंदों के लिहाज़ से ये टी20 इतिहास में भारत की सबसे बड़ी हार है, जिसे भुला पाना शायद ही कभी मुमकिन हो.
क्या फिर से लौट आया है ग्रेग चैपल का वो डरावना दौर?
आज जो हालात हैं, वो बरबस ही हमें 2007 के उस खौफनाक दौर की याद दिलाते हैं जब ग्रेग चैपल भारतीय टीम के कोच थे. साल 2001 से 2003 के बीच सौरव गांगुली ने सचिन, द्रविड़, सहवाग, लक्ष्मण और जहीर जैसे दिग्गजों के साथ एक ऐसी निडर टीम बनाई थी जो ऑस्ट्रेलिया की आंखों में आंखें डालकर बात करती थी. लेकिन 2003 के बाद बीसीसीआई ने ग्रेग चैपल को कोच बनाकर आगे बढ़ रही टीम इंडिया को खुद ज़जीर से बांध दिया था.
तब चैपल को भी खुली छूट मिली थी और एक्सपेरिमेंट्स के नाम पर खिलाड़ियों में असुरक्षा भर दी गई. खिलाड़ियों के बीच आपसी फूट तक पैदा हुई. नतीजा ये हुआ कि 2007 वर्ल्ड कप के पहले ही राउंड से टीम बाहर हो गई. आज गंभीर के दौर में ठीक वही सब दोहराया जा रहा है. ऐसा लग रहा है जैसे बीसीसीआई ने इतिहास से कोई सबक नहीं सीखा है और एक बार फिर हमारी सेटल टीम को प्रयोगों की आग में झोंक दिया गया है. रोहित से लेकर विराट तक मोहम्मद शमी से लेकर हार्दिक पांड्या तक के फैंस आज जो गुस्सा महसूस कर रहे हैं, वो पूरी तरह से जायज है.
एक-एक करके टूटते विजय रथ की हकीकत
ऐसा नहीं है कि गौतम गंभीर खराब कोच हैं या उनके रहते भारतीय टीम ने कुछ हासिल नहीं किया. गंभीर के ही कोचिंग कार्यकाल में टीम इंडिया ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी और टी20 वर्ल्ड कप 2026 के खिताब जीते. लेकिन इन उपलब्धियों के ठीक बाद आज भारतीय टीम में बिल्कुल वैसा ही अंधाधुंध एक्सपेरिमेंट्स का दौर चल रहा है जो ग्रेग चैपल के दौर से मिलता जुलता दिखता है. एक वक्त था जब टेस्ट और टी20 फॉर्मेट में हमने कामयाबी की ऐसी इबारतें लिखी थीं जिसे दुनिया सलाम करती थी. लेकिन आज टीम इंडिया शर्मिंदगी का नया इतिहास लिख रही है.
न्यूज़ीलैंड और साउथ अफ्रीका से घर पर टेस्ट सीरीज़ गंवाने के बाद ऑस्ट्रेलियाई सरज़मीं पर भी भारतीय टेस्ट टीम का विजय रथ बुरी तरह टूट चुका है. और अब टी20 वर्ल्ड कप जीतने के बाद लगातार 2 सीरीज़ हारना खतरे की एक बहुत बड़ी घंटी है. कोई माने या ना माने, लेकिन ये सिर्फ सोचने का नहीं बल्कि गहरी नींद से जागकर कुछ ठोस कदम उठाने का वक्त है. अगर अब भी हमारी आंखें नहीं खुलीं, तो भारतीय क्रिकेट को अर्श से फर्श तक गिरने में ज्यादा वक्त नहीं लगेगा और हम सिर्फ पुरानी यादों के सहारे जीने को मजबूर हो जाएंगे.
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टीम इंडिया के 'सुपरस्टार कल्चर' से नफरत क्यों?
आपको भी याद होगा कि बीसीसीआई द्वारा टीम इंडिया का कोच बनाए जाने से पहले, गौतम गंभीर का एक इंटरव्यू बहुत वायरल हुआ था. इस इंटरव्यू में उन्होंने साफ-साफ कहा था कि क्रिकेट एक टीम गेम है. साथ ही इशारों-इशारों में ये भी जता दिया था कि जब इसी टीम में कुछ गिने-चुने खिलाड़ियों को 'सुपरस्टार' जैसा स्टेटस मिल जाता है तो वो इसे कतई पसंद नहीं करते. आज ऐसा लग रहा है जैसे उस सोच की भारी कीमत हमारे वही सुपरस्टार्स चुका रहे हैं.
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रोहित शर्मा और विराट कोहली का टेस्ट और टी20 से अचानक गायब होना, आर अश्विन का ऑल फॉर्मेट से संन्यास फैंस के लिए किसी झटके से कम नहीं था. अगर ये सुपरस्टार कल्चर को खत्म करना नहीं है, तो ये उन खिलाड़ियों को किनारे लगाना है जिन्होंने सालों तक अपने खून-पसीने से भारतीय क्रिकेट को सींचा और दुनिया भर में देश का मान बढ़ाया.
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क्या मजबूर है अजीत अगरकर की सिलेक्शन कमेटी?
इस पूरी कहानी में सबसे ज्यादा लाचार अगर कोई नजर आता है, तो वो है अजीत अगरकर की सिलेक्शन कमेटी. जीत का श्रेय देने के साथ-साथ इस सिलेक्शन कमेटी पर कप्तान से लेकर कोच और फैंस सभी हार का ठीकरा फोड़ सकते हैं. लेकिन ऐसा लगता है मानो ये कमेटी सिर्फ एक रबर स्टैंप है जहां कोच गंभीर की मर्जी के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता. घरेलू क्रिकेट में लगातार शानदार प्रदर्शन करने वाले देवदत्त पडिक्कल, रसिक सलाम, भुवनेश्वर कुमार और रजत पाटीदार जैसे टॉप परफॉर्मर्स को बार-बार नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.
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दूसरी तरफ रवींद्र जडेजा, मोहम्मद शमी, हार्दिक पांड्या और अब संजू सैमसन जैसे मैच विनर्स को दरकिनार करना हर किसी की समझ से परे है. ज़ाहिर तौर पर सवाल सिलेक्शन कमेटी और गौतम गंभीर की पक्षपातपूर्ण रणनीति पर उठ रहे हैं. मीडिया की अंदरूनी रिपोर्ट्स भी यही इशारा करती हैं कि गंभीर को अनसुना करके टीम चुनना इस सिलेक्शन कमेटी के बूते की बात नहीं रह गई है.
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जिम्बाब्वे दौरे का झूठा मरहम और टूटती उम्मीदें!
मौजूदा स्थिति में इस सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना ये है कि चाहे कोई कितना भी खराब प्रदर्शन कर ले, फिलहाल तो अगर वो कोच की गुड बुक्स में है तो उसे मौके मिलते रहेंगे. एक-दो सीरीज़ के लिए ड्रॉप होने के बाद घूम-फिरकर फिर उन्हीं चहेते खिलाड़ियों की टीम में वापसी हो जाएगी. बीच में जिम्बाब्वे या किसी और कमजोर टीम के खिलाफ बड़ी जीत भी आएगी. जिसे ढाल बनाकर इन गहरे घावों पर जीत का झूठा मरहम लगाने की कोशिश की जाएगी.
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फैंस को फिर से वही पुरानी कहानी सुनाई जाएगी कि हमारी टीम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम है. लेकिन सच तो ये है कि हमें एक बार फिर आत्ममंथन की ज़रूरत है. खिलाड़ियों की उम्र के आंकड़ों को भुलाकर टीम के प्लेइंग-11 में मैच विनर्स की ज़रूरत है. जल्द से जल्द उस गहरी नींद से जागने की ज़रूरत है जहां I, me और myself की आवाज़ें सुनाई देती हैं. जिसके लिए पहला और सबसे बड़ा कदम बीसीसीआई को उठाना होगा.
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