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Naga Sadhu: नागा साधुओं के रहस्य, जानें ये कब और क्यों पहनते हैं लकड़ी का लंगोट!

Naga Sadhu: नागा साधुओं को हिन्दू धर्म का रिजर्व फोर्स कहा जाता है। इनके रहस्य बहुत चौंकाने वाले होते हैं। ये अक्सर निर्वस्त्र रहते हैं, लेकिन कभी-कभी कुछ नागा साधू लंगोट भी पहनते है, जो लकड़ी के भी होते हैं। आइए जानते हैं, ये कब और क्यों पहनते हैं लकड़ी का लंगोट?

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Naga Sadhu: हिन्दू धर्म में संभवतः निर्वस्त्र यानी नग्न रहने के कारण साधुओं की एक विशेष जमात को नागा कहा जाता है, क्योंकि नग्न रहना नागा साधुओं की एक सबसे बड़ी पहचान है। साधुओं के इस खास वर्ग को उनकी कठिन तपस्या और युद्ध कला में पारंगत होने कारण भी जाना है। दरअसल, नागा साधुओं की दुनिया बहुत रहस्यमय है। वे कुंभ जैसे मेलों को छोड़कर सामान्य दिनों में बहुत कम दिखाई देते हैं और समाज से अलग रहकर तपस्या में लीन रहते हैं।

हिंदू संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं नागा साधु

ये भले समाज से अलग-थलग दिखते हैं, लेकिन सदियों से नागा साधु हिंदू संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे विभिन्न अखाड़ों से जुड़े होते हैं जिनकी परंपरा आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी, जिसका उद्देश्य हिन्दू धर्म की परंपराओं को बचाए रखना है। लेकिन नागा साधुओं का जीवन बहुत कठिन होता है। इस जीवन को अपनाने वाले को अपना निजी जीवन, रिश्ते-नाते, पसंद-नापसंद सब छोड़ना पड़ता है।

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नागा साधुओं के वस्त्र

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नागा साधू आमतौर पर निर्वस्त्र रहते हैं और भस्म को ही अपना वस्त्र मानते हैं, लेकिन कुछ साधू लंगोट भी धारण करते हैं। यह देखा गया है कि जो नागा साधू लंगोट पहनते हैं, वे भांति-भांति के होते हैं। ये लंगोट वस्त्र के अलावा विभिन्न धातुओं जैसे पीतल, तांबा, चांदी और लोहे के होते हैं। यहां तक कि ये पत्थर लकड़ी के भी होते हैं।

कब पहनते हैं लकड़ी का लंगोट!

नागा साधु महान हठयोगी होते हैं। हठयोग के माध्यम से वे अपने शरीर पर नियंत्रण पाते हैं और कठोर परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता विकसित करते हैं। हठयोग के कारण वे लकड़ी का लंगोट भी धारण कर लेते हैं। हालांकि यह कुछ विशिष्ट स्थितियों में, विशेषकर धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान, वे लंगोट पहनते हैं। लेकिन यह कोई नियम नहीं है। इसका एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि भक्तों को उनके पास आने में झिझक न हो, इसलिए भी वे लंगोट धारण कर लेते हैं। सच तो यह है कि इनका लंगोट को पहनना भी एक तप की तरह ही होता है।

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डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक  शास्त्र की मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है।

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First published on: Dec 15, 2024 11:21 AM

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About the Author

Shyamnandan

साल 2006 में 'सिविल सर्विसेज क्रॉनिकल' मैगजीन से बतौर सब-एडीटर जर्नलिज्म की दुनिया में एंट्री करने वाले श्यामनंदन को लगभग 20 वर्षों का कार्यानुभव है। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) के स्टूडेंट रहे ये हमेशा से एक्सपेरिमेंटल रहे हैं। डिजिटल दुनिया में इनकी पैठ साल 2009 में मोबाइल वैस (Mobile VAS) कंटेंट से हुई। हिंदुस्तान टाइम्स (HT Media), इंडिकस एनालिटिक्स की लाइव मोबाइल (LiveMobile), इंस्टामेज जैसी कंपनियों में मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए काम करते-समझते और जल्द ही कई पायदान लांघते हुए प्रोडक्ट मैनेजर बने। मोबाइल प्लेटफॉर्म की समझ ने इनके एनडीटीवी (NDTV) में जाने का रास्ता आसान बनाया। इनके खाते में एनडीटीवी (NDTV) की 'आस्था' और 'जॉब अलर्ट्स' पेज लॉन्च करने का श्रेय दर्ज है। यहीं से इनकी वास्तविक ऑनलाइन जर्नलिज्म शुरू हुई। इंटरनेशनल रिलेशंस, जियो-पॉलिटिक्स, एनवायरनमेंट, साइंस टेक, एजुकेशन, हेल्थ, लाइफस्टाइल, फैशन और व्यंजन-रेसपी पर काफी लिखने के बाद ये 'धर्म और ज्योतिष' कंटेंट में रम गए। इस विषय को और गहराई से समझने और प्रस्तुत करने लिए इन्होंने भारतीय विद्या भवन (BVB), नई दिल्ली से एस्ट्रोलॉजी का कोर्स कंप्लीट किया। वर्तमान में News24 में धर्म और ज्योतिष सेक्शन के लिए अपनी सेवाएं दे रहे श्यामनंदन, बंसल न्यूज (भोपाल) के 'वेबसाईट हेड' भी रह चुके हैं। इनकी एक बड़ी खासियत है, रणनीति और योजना के साथ आगे बढ़ना। इनको YouTube और Facebook के लिए कंटेंट क्रिएशन और कंटेंट प्रमोशन के साथ-साथ SEO, SMO और SMM की अच्छी समझ है। जहां तक हॉबी की बात है, इनको पटकथा (Screenplay) और गजल लिखने, फिल्म देखने, खाना बनाने और पेंटिंग में विशेष रूचि है। संपर्क करें: 📧 Email: shyam.nandan@bagconvergence.in 🔗 LinkedIn: https://www.linkedin.com/in/shyamnandan-kumar/ 🐦 Twitter/X: @Shyamnandan_K

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