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Phulera Dooj Vrat Katha 2026: आज फुलेरा दूज पर पढ़ें ये कथा, सिंगल्स को जीवनसाथी और मैरिड को सुखी दांपत्य जीवन का मिलेगा आशीर्वाद

Phulera Dooj Vrat Katha 2026: राधा रानी और कृष्ण जी को समर्पित फुलेरा दूज के पर्व को प्रेम, खुशी, सफलता और उत्साह का प्रतीक माना जाता है. इस दिन न सिर्फ राधा-कृष्ण जी की पूजा की जाती है, बल्कि उनके मिलन की कथा सुनना व पढ़ना भी शुभ होता है. चलिए अब जानते हैं फुलेरा दूज की तिथि, पूजा के शुभ मुहूर्त और कथा आदि के बारे में.

Author Written By: Nidhi Jain Updated: Feb 19, 2026 07:13
Phulera Dooj Vrat Katha 2026
Credit- AI Gemini

Phulera Dooj Vrat Katha 2026: आज 19 फरवरी 2026, वार गुरुवार को फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर देशभर में फुलेरा दूज का पर्व मनाया जा रहा है, जो कि कृष्ण जी और उनकी परम सखी राधा रानी को समर्पित है. मान्यता है कि फुलेरा दूज के पावन दिन राधा रानी और कृष्ण जी की पूजा करने, व्रत रखने और उनके मिलन की कथा सुनने व पढ़ने से रिश्तों में प्यार की मिठास घुलती है. साथ ही सिंगल्स को जीवनसाथी और मैरिड को सुखी दांपत्य जीवन का आशीर्वाद मिलता है. इसके अलावा घर-परिवार में भी खुशी का माहौल रहता है. यहां पर आप फुलेरा दूज की कथा पढ़ सकते हैं.

फुलेरा दूज की कथा (phulera dooj ki pauranik katha)

पौराणिक कथाओं के अनुसार, द्वापर युग में एक समय ऐसा भी आया था, जब कृष्ण जी का उनकी परम सखी राधा रानी से मिलन (मुलाकात) नहीं हो पा रहा था. राधा-कृष्ण के इस विरह (separation) का प्रभाव केवल उनके हृदय पर ही नहीं पड़ रहा था, बल्कि संपूर्ण वृंदावन पर छाना शुरू हो गया था. वृंदावन के पेड़ सूखने लगे, फूल मुरझाने लगे और पक्षियों व पशुओं का चहचहाना बंद हो गया. साथ ही वातावरण में गहरी उदासी छा गई, जिसकी वजह से प्रत्येक व्यक्ति उदास रहने लगा.

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इसी बीच एक दिन राधा रानी ने निश्चय किया कि जब तक कृष्ण जी नहीं आएंगे, तब तक वो न तो अन्न ग्रहण करेंगी और न ही जल पिएंगी. द्वारका में मौजूद कृष्ण जी को जब राधा रानी और वृंदावन की स्थिति के बारे में पता चला तो वो तुरंत श्रीजी से मिलने आएं.

कृष्ण जी को देख राधा रानी को बेहद प्रसन्नता हुई, जिससे उनके मुख पर खुशी का भाव वापस आ गया. साथ ही वृंदावन की धरती हर्ष से खिल उठी. जहां वृक्ष हरे-भरे हो गए और फूल फिर से खिल गए, वहीं पशु-पक्षियों का मधुर स्वर फिर से शुरू हो गया.

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काफी समय बाद राधा रानी से मिलने की खुशी में श्रीकृष्ण ने फूल को तोड़कर उनके ऊपर बरसाए, जिन्हें श्रीजी ने प्रेमपूर्वक अर्पित किया. धीरे-धीरे गोप-गोपियां भी एक-दूसरे पर फूल बरसाने लगे, जिसके कुछ ही समय बाद पूरे वृंदावन में फूलों की होली खेली गई. बता दें कि जिस दिन वृंदावन इस अलौकिक घटना का साझी बन रहा था, उस दिन फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि थी. इसके बाद से हर साल फाल्गुन महीने की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर फूलों से होली खेलने की परंपरा शुरू हो गई, जिसे फुलेरा दूज के नाम से जाना जाने लगा.

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फुलेरा दूज की पूजा का शुभ मुहूर्त (phulera dooj ke puja ka shubh muhurt kab hai)

  • प्रातः सन्ध्या- सुबह में 05:40 से 06:56
  • अभिजीत मुहूर्त- दोपहर में 12:13 से 12:58
  • सायाह्न सन्ध्या- शाम में 06:14 से 07:30

डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है. News24 इसकी पुष्टि नहीं करता है.

First published on: Feb 19, 2026 07:10 AM

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