वो रिकॉर्ड जो गलती से बना था, 56 साल बाद आर्टेमिस-2 ने तोड़ा, पढ़ें अपोलो-13 की कहानी, ऑक्सीजन टैंक फटने से मच गया था हड़कंप

अमेरिका की स्पेस एजेंसी नासा का मून मिशन आर्टेमिस-2 आज धरती पर लौट आया। इस मिशन पर 4 अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा का चक्कर लगाने के लिए गए थे और इस दौरान उन्होंने अपोलो-13 मून मिशन का एक रिकॉर्ड तोड़ दिया, जो गलती से बन गया था। आइए अपोलो-13 मून मिशन, इसके फेल होने और गलती से बने रिकॉर्ड के बारे में जानते हैं...

apollo-13 moon mission
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56 साल पहले आज ही के दिन 11 अप्रैल 1970 को नासा ने अपोलो-13 मिशन लॉन्च किया था। 3 एस्ट्रोनॉट जेम्स लवेल, थॉमस मैटिंगली और फ्रेड हाइस चांद पर उतरने के लिए गए थे, लेकिन ऑक्सीजन टैंक फटने के कारण चांद पर उतरे का मिशन रद्द करना पड़ा। वहीं तीनों एस्ट्रोनॉट की जान बचाने के लिए ग्राउंड कंट्रोल टीम को रेस्क्यू ऑपरेशन चलाना पड़ा।

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अपोलो-13 ने गलती से क्या रिकॉर्ड बनाया?

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बता दें कि चांद पर उतरने का मिशन रद्द होने के बाद अपोलो-13 एक तरफ से चक्कर लगाते हुए चांद के पीछे गया और दूसरी तरफ से वापस धरती की ओर गया। क्योंकि मिशन का चांद के पीछे जाकर वापस आना मजबूरी था, इसलिए इस मिशन ने गलती से चांद की सतह से 254 किलोमीटर और धरती की सतह से 400171 किलोमीटर दूर जाने का रिकॉर्ड बना दिया था।

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आर्टेमिस-2 ने अपोलो-13 का रिकॉर्ड तोड़ा

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बता दें कि 1 अप्रैल 2026 को लॉन्च हुए आर्टेमिस-2 मिशन के 4 अंतरिक्ष यात्रियों ने 56 साल बाद अपोलो-13 के रिकॉर्ड को तोड़ा है। वे 6 अप्रैल 2026 की रात 11 बजकर 26 मिनट पर चांद के पीछे धरती की सतह से 406771 किमी दूर तक गए थे, यानी अपोलो-13 से ज्यादा दूरी इस मिशन ने तय की। वहीं इस मिशन का मकसद सिर्फ चांद का चक्कर लगाकर लौटना था।

अपोलो-13 स्पेसक्राफ्ट 3 मॉड्यूल्स से बना था

अपोलो-13 स्पेसक्राफ्ट 3 मॉड्यूल्स से बना था4 / 9

बता दें कि अपोलो-13 का स्पेसक्राफ्ट 3 मॉडयूल्स से बना था। एक कमांड मॉड्यूल, जिसमें तीनों अंतरिक्ष यात्री थे और इसी मॉड्यूल के जरिए वे धरती पर वापस लौटे थे। दूसरा सर्विस मॉड्यूल, जिसमें ईंधन, ऑक्सीजन टैंक और बिजली सप्लाई के उपकरण लगे थे। तीसरा, लूनर मॉड्यूल था, जिसके जरिए अंतरिक्ष यात्री चांद पर उतरते, लेकिन अंतरिक्ष यात्री इसे 'लाइफबोट' बनकर जान बचा पाए।

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अपोलो-13 का ऑक्सीजन टैंक कैसे फटा था?

अपोलो-13 का ऑक्सीजन टैंक कैसे फटा था?5 / 9

मिशन लॉन्च होने के 56 घंटे बाद स्पेसक्राफ्ट कमांडर जेम्स ए. लवेल जूनियर, लूनर मॉड्यूल पायलट फ्रेड डब्ल्यू और कमांड मॉड्यूल पायलट जॉन एल. स्विगर्ट को लेकर धरती से 3.20 लाख किलोमीटर दूर था। क्रू मेंबर्स स्पेसक्राफ्ट लैंडिंग मॉड्यूल 'एक्वेरियस' की टेस्टिंग कर रहे थे और आगे उन्हें चांद की कक्षा में एंट्री करनी थी, लेकिन इससे पहले ही सर्विस मॉड्यूल का ऑक्सीजन टैंक फट गया।

अपोलो-13 के कमांड मॉड्यूल से ऑक्सीजन लीक

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धमाके के साथ ऑक्सीजन टैंक फटने से स्पेसक्राफ्ट के कमांड मॉड्यूल से ऑक्सीजन लीक होने थी। ऑक्सीजन, बिजली और पानी की सप्लाई भी बंद हो गई थी। क्रू ने कंट्रोल रूम को रिपोर्ट किया, जिसने समस्या जानने के बाद क्रू मेंबर्स के चांद पर उतरने का मिशन रद्द कर दिया। क्रू मेंबर्स को लूनर मॉड्यूल में जाने का निर्देश दिया, जिसमें ऑक्सीजन कम थी, क्योंकि इस मॉड्यूल को अंतरिक्ष यात्रियों को कमांड मॉड्यूल से चांद की सतह तक ले जाने और वापस कमांड मॉड्यूल लाने के लिए बनाया गया था, लेकिन लूनर मॉड्यूल में सिर्फ 2 लोगों के लिए और 45 घंटे के लिए पॉवर सप्लाई थी। जबकि इसे लाइफबोट बनाकर तीनों अंतरिक्ष यात्रियों को जिंदा धरती पर लौटना था।

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अपोलो-13 का लूनर मॉड्यूल लाइफबोट कैसे बना?

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लूनर मॉड्यूल में 3 लोगों को करीब 90 घंटे बिताने थे। 3 लाख किमी से ज्यादा का रास्ता पार करके धरती पर लौटना था। इसलिए क्रू ने पानी पीना कम किया। केबिन का तापमान जमाने वाली ठंड से कुछ डिग्री ऊपर रखा। मॉड्यूल से कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को बाहर निकालने की समस्या थी। क्योंकि कमांड मॉड्यूल के चौकोर लिथियम हाइड्रोक्साइड कैनिस्टर लूनर मॉड्यूल के सिस्टम के गोल छेद में फिट नहीं हो पा रहे थे। इसलिए धरती पर बैठे मिशन कंट्रोल ने स्पेसक्राफ्ट में मौजूद उपकरणों से एक जुगाड़ अडैप्टर बनया। अपोलो-13 के क्रू मेंबर्स ने उस अडैप्टर के मॉडल को कॉपी करके अडैप्टर बनाया और धरती तक जिंदा लौटने के लिए लूनर में जुगाड़ फिट किया।

अपोलो-13 ने 15 अप्रैल को बनाया था रिकॉर्ड

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बता दें कि 14 अप्रैल को अपोलो-13 वापस आने के लिए चांद के पीछे की तरफ गया। इस दौरान चंद्रमा की तस्वीरें ली गईं। फिर मिशन कमांडर ने 5 मिनट के इंजन बर्न के लिए मिशन कंट्रोल रूमें बात की। 5 मिनट के इंजन बर्न से LM को रफ्तार मिलती और वे लूनर मॉड्यूल के डेड होने से पहले धरती पर लौट आते। इसके लिए क्रू ने चांद के पिछले हिस्से का चक्कर लगाने के 2 घंटे बाद डिसेंट इंजन को स्टार्ट किया। 15 अप्रैल 1970 को वे धरती की सतह से 400171 किमी दूर से धरती की ओर बढ़े।

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अपोलो-13 के तीनों अंतरिक्ष यात्रियों की जान ऐसे बची

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17 अप्रैल को धरती के वायुमंडल में एंट्री से पहले लूनर मॉड्यूल से कमांड मॉड्यूल को अलग कर दिया गया। दोपहर के करीब 1 बजे पृथ्वी के वायुमंडल में एंट्री हुई। इस दौरान हीट शील्ड के खराब होने का डर था, जिस वजह से लूनर मॉड्यूल फट सकता था। इसलिए क्रू का संपर्क मिशन कंट्रोल से 4 मिनट के लिए टूट गया। फिर अपोलो-13 के पैराशूट दिखे और तीनों अंतरिक्ष यात्री प्रशांत महासागर में उतर गए। इस तरह गलती से वर्ल्ड रिकॉर्ड भी बना और तीनों अंतरिक्ष यात्री जान हथेली पर रखकर पृथ्वी पर लौट आए।

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लेखक के बारे में

Khushbu Goyal

Khushbu Goyal

खुशबू गोयल News24 हिंदी डिजिटल में चीफ सब एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. वेब जर्नलिज्म में 13 साल का अनुभव रखने वाली खुशबू गोयल राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और राज्यस्तरीय न्यूज और चुनावी कवरेज करती हैं. खुशबू गोयल ने अक्टूबर 2013 में अमर उजाला डिजिटल से अपने करियर की शुरुआत की थी, जहां 7 साल सेवाएं देने के बाद साल नवंबर 2020 में दैनिक भास्कर डिजिटल जॉइन किया और सितंबर 2023 से News24 के डिजिटल में सेवाएं दे रही हैं. 13 साल के करियर में खुशबू गोयल ने नेशनल, इंटरनेशनल, पॉलिटिकल, क्राइम टॉपिक कवर करने में विशेषज्ञता हासिल की. खुशबू गोयल का पत्रकारिता में अनुभव: 13 साल योग्यता: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के IMC&MT इंस्टीट्यूट से मास्टर ऑफ कम्युनिकेशन एंड जर्नलिज्म (MJ) के बाद जर्नलिज्म में MPhil की डिग्री ली. खुशबू गोयल ने 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्टिंग की है, जिसमें उन्हें ग्राउंड कवरेज करने का भी अनुभव है. इसके अलावा पिछले 13 साल में विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को भी उन्होंने फील्ड रिपोर्टिंग के साथ कवर किया.
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