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क्या आपने कभी सोचा है, जो स्नेक आप बड़े शौक से खाते हैं, मोमोज उसका जन्म कैसे हुआ था?
हर गली में छाया मोमोज का क्रेज

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शाम होते ही शहरों की गलियों और बाजारों में मोमोज की दुकानों पर भीड़ लग जाती है. खासकर दिल्ली और आसपास के इलाकों में इसकी दीवानगी साफ दिखाई देती है, जहां हर जगह अलग-अलग वैरायटी के मोमोज आसानी से मिल जाते हैं.
क्या सच में नया फास्ट फूड है मोमोज?

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कई लोग मोमोज को मॉडर्न फास्ट फूड समझते हैं, लेकिन इसकी असली कहानी बेहद पुरानी और दिलचस्प है. यह सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि कभी लोगों की भूख मिटाने और जिंदा रहने का एक जरिया हुआ करता था.
कहां हुआ था मोमोज का जन्म

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मोमोज की शुरुआत करीब 600 साल पहले तिब्बत के ठंडे इलाकों में हुई थी. वहां की कठोर जलवायु और सीमित संसाधनों के कारण लोगों को ऐसा खाना चाहिए था जो आसानी से बन सके और शरीर को ऊर्जा दे सके.
कठिन हालात में बना खास भोजन

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तिब्बत में कड़ाके की ठंड और खेती की कमी के चलते खाने के विकल्प बहुत कम थे. ऐसे में लोगों ने आटे की पतली परत में मांस भरकर भाप में पकाने का तरीका अपनाया, जिससे पेट भी भरे और शरीर को गर्मी भी मिले.
'मोग-मोग' से बना आज का मोमोज

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शुरुआत में इस डिश को 'मोग-मोग' कहा जाता था. लेकिन धीरे-धीरे यह तिब्बती संस्कृति का हिस्सा बन गया और मशहूर होता रहा. कम संसाधनों में ज्यादा लोगों को खिलाने के लिए यह सबसे आसान और असरदार भोजन माना जाता था.
नेपाल के व्यापारियों ने फैलाया स्वाद

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बाद में काठमांडू के व्यापारियों ने इस डिश को नेपाल तक पहुंचाया और वहां इसे 'ममो' नाम मिला और स्थानीय मसालों के साथ इसका स्वाद और भी बेहतर हो गया, जिससे इसकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी.
भारत में कैसे बना फेवरेट स्नैक

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भारत में मोमोज का चलन तब बढ़ा जब तिब्बती समुदाय यहां आकर बस गया. धीरे-धीरे यह दिल्ली, दार्जिलिंग और हिमालयी इलाकों से निकलकर पूरे देश में फैल गया और लोगों का पसंदीदा स्ट्रीट फूड बन गया.
मजबूरी से बना ट्रेंडी फूड

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आज मोमोज में कई नए फ्लेवर आ चुके हैं, जैसे तंदूरी, फ्राइड और पनीर मोमोज, लेकिन जो डिश कभी मजबूरी में बनाई गई थी, वही आज युवाओं का पसंदीदा और ट्रेंडिंग स्नैक बन चुकी है. (Image: Pexels)