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वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसान और जानवरों की नस्लें खत्म होने की कगार पर हैं। एक समय ऐसा आएगा, जब न इंसान बच्चे पैदा कर पाएंगे और न ही जानवरों की प्रजनन क्षमता बचेगी। क्योंकि पेस्टिसाइड्स, प्लास्टिक, PFAS जैसे केमिकल, ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज मिलकर इंसानों और जानवरों की प्रजनन क्षमता को नष्ट कर रहे हैं। वन्यजीवों की आबादी तेजी से घट रही है और इंसानों में बांझपन बढ़ रहा है।
मानव निर्मित सिंथेटिक केमिकल

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वैज्ञानिकों का कहना है कि पूरी दुनिया में आज हजारों प्रकार के सिंथेटिक केमिकल यानी मानव निर्मित केमिकल हैं, जो प्रजनन क्षमता, जैव विविधता और स्वास्थ्य को खतरे में डाल रहे हैं। इंसानों और जानवरों के शरीर में हार्मोन को ग्रोथ करने से रोकते हैं। इस वजह से पिछले 50 साल में धरती पर वन्यजीवों की आबादी में दो-तिहाई से ज्यादा की गिरावट आई। पुरुषों और महिलाओं दोनों में बांझपन की समस्या भी बढ़ी है।
जीव-जतुओं पर केमिकल का असर

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वैज्ञानिकों के अनुसार, अलग-अलग जीवों पर अलग-अलग केमिकल का असर पड़ता है। केमिकल का असर लंबे समय तक बना रहता है, जिससे कम मात्रा में भी बड़ा नुकसान हो सकता है। जैसे Tributyltin, Phthalates, Microplastics आदि केमिकल से कीड़े-मकोड़ों को जेंडर चेंज होता है और उनकी प्रजनन क्षमता घटती है। Pyrethroids, Microplastics नामक केमिकल के कारण मछलियां अंडे कम देती हैं, जिससे जनसंख्या घटती है।
इंसानों में स्पर्म की संख्या घट सकती

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वैज्ञानिकों के अनुसार, PFAS, Organoclorines नामक केमिकल से पक्षी के अंडे से बच्चा निकलने में समस्या आती है। धातुओं और तापमान के असर से सरीसृप समुदाय का लिंग अनुपात बिगड़ता है। Phthalates नामक केमिकल से मेंढकों की प्रजनन सफलता घटती है। समुद्री स्तनधारी जीवों में गर्भपात या समय से पहले जन्म की समस्या आती है। PFAS, Microplastics से इंसानों स्पर्म की संख्या और स्पीड कम होती हैं। पुरुषों के जननांगों में समस्या आती है।
ग्लोबल वार्मिंग कैसे बन रही खतरा?

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वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लोबल वार्मिंग से तापमान बढ़ने से जानवर तनाव में आते हैं। गर्मी, ऑक्सीजन की कमी और केमिकल मिलकर प्रजनन के लिए तनाव को और बढ़ा देते हैं। इंसानों की फर्टिलिटी वन्यजीवों के जैसी ही है। दोनों ही हानिकारक केमिकल की चपेट में आ रहे हैं। पूरी दुनिया में 140000 से ज्यादा सिंथेटिक केमिकल हैं, लेकिन सिर्फ 1% सुरक्षित हैं। DDT, PFAS जैसे कई केमिकल पहले इस्तेमाल किए जाते रहे और अब इनके रिजल्ट सामने आ रहे हैं।
महिलाओं में बढ़ेगी बांझपन की समस्या

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वैज्ञानिकों के अनुसार, DDT केमिकल के कारण पक्षियों के अंडे पतले हो गए। समुद्री जानवरों की प्रजनन क्षमता कम हो गई। PFAS केमिकल के कारण महिलाओं में फर्टिलिटी पॉवर 40% कम हो सकती है। जनन अंगों में माइक्रोप्लास्टिक जमा हो रहे हैं, जिनका असर अभी तक देखने को नहीं मिला है। वैज्ञानिक सुसान ब्रैंडर की स्टडी के अनुसार, पारिस्थितिकी तंत्र और मानव स्वास्थ्य एक-दूसरे से जुड़े हैं। अगर वन्यजीवों की प्रजनन क्षमता खत्म हुई तो पूरी चेन पर असर पड़ेगा, जिसमें इंसान भी आते हैं।
समस्या का समाधान क्या है?

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वैज्ञानिकों के अनुसार, नस्लों को खत्म होने से बचाने के लिए ग्लोबल प्लास्टिक के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते करने होंगे। केमिकल की सिक्योरिटी की जांच करनी होगी। प्लास्टिक पॉल्यूशन बढ़ने से रोकना होगा। क्लाइमेट चेंज होने से रोकना होगा। अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाली पीढ़ियां गंभीर स्वास्थ्य और जैव विविधता संकट का सामना करेंगी। केमिकल और क्लाइमेंट मिलकर भावी पीढ़ियों की प्रजनन क्षमता को खत्म कर सकते हैं, जिससे जनसंख्या घटेगी और नस्लें खत्म होंगी।