Hindu Shikha Tradition: सिर पर क्यों रखते थे चुटिया, क्यों खत्म हुआ प्राचीन रिवाज, जानिए पीछे की सच्चाई

Hindu Shikha Tradition: हिंदू शिखा यानी चुटिया प्राचीन काल में धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान मानी जाती थी। कहते हैं, यह परंपरा शरीर विज्ञान और आस्था से जुड़ी थी। आइए जानते हैं, क्यों महत्वपूर्ण थी यह परंपरा, अब क्यों नहीं है ये रिवाज?

Hindu-Shikha-Tradition
1 / 8

विज्ञापन

क्यों लुप्त हुई हिन्दू शिखा परंपरा?

क्यों लुप्त हुई हिन्दू शिखा परंपरा?2 / 8

Hindu Shikha Tradition: भारतीय संस्कृति में 'शिखा' यानी चुटिया रखना महज एक धार्मिक पहचान नहीं थी, बल्कि यह शरीर विज्ञान और आध्यात्मिकता का एक अद्भुत संगम था। प्राचीन समय में ऋषियों से लेकर राजाओं तक, हर पुरुष के सिर के पीछे बालों का एक छोटा हिस्सा विशेष रूप से छोड़ा जाता था। आज के दौर में जहां हेयर स्टाइल के नाम पर हजारों प्रयोग हो रहे हैं, वहीं हमारी यह गौरवशाली परंपरा आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं गुम हो गई है। आइए जानते हैं, इसके पीछे का वह गहरा रहस्य जिसे आज की पीढ़ी भूल चुकी है।

विज्ञापन

सहस्रार चक्र की सुरक्षा का कवच

सहस्रार चक्र की सुरक्षा का कवच3 / 8

मस्तिष्क का वह हिस्सा जहां शिखा रखी जाती है, उसे योग शास्त्र में 'सहस्रार चक्र' का स्थान माना जाता है। यह शरीर का सबसे संवेदनशील केंद्र है, जो सीधे हमारी बुद्धि और विवेक से जुड़ा होता है। शिखा रखने से इस केंद्र की सुरक्षा होती है और बाहरी नकारात्मक ऊर्जाएं मस्तिष्क को प्रभावित नहीं कर पातीं। यह एक तरह से मानसिक ऊर्जा को संतुलित रखने का प्राकृतिक उपाय था।

आध्यात्मिक एंटीना है आपकी शिखा

आध्यात्मिक एंटीना है आपकी शिखा4 / 8

पुरानी मान्यताओं में शिखा को 'ज्ञान की चोटी' और एक 'आध्यात्मिक एंटीना' माना गया है। जैसे टीवी या रेडियो एंटीना सिग्नल पकड़ते हैं, वैसे ही शिखा ब्रह्मांडीय ऊर्जा को ग्रहण कर मस्तिष्क तक पहुंचाती है। ध्यान और साधना के समय यह ऊर्जा को शरीर के निचले चक्रों से ऊपर की ओर ले जाने में मदद करती है। माना जाता है कि मृत्यु के समय उन्नत आत्माएं इसी स्थान से शरीर का त्याग करती हैं।

विज्ञापन

एकाग्रता और निर्णय लेने की शक्ति

एकाग्रता और निर्णय लेने की शक्ति5 / 8

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो शिखा वाले स्थान पर शरीर की सभी महत्वपूर्ण नसें मिलती हैं। यहां बालों का गुच्छा बांधकर रखने से रक्त का संचार सुचारू रहता है और एकाग्रता बढ़ती है। प्राचीन गुरुकुलों में छात्रों के लिए शिखा अनिवार्य थी ताकि वे कठिन विषयों को आसानी से समझ सकें और शांत मन से विद्या ग्रहण कर सकें। यह विवेक शक्ति को बढ़ाकर सही निर्णय लेने में भी सहायक होती है।

पहचान और गौरव का प्रतीक

पहचान और गौरव का प्रतीक6 / 8

शिखा केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि सनातनी विरासत की पहचान थी। मुंडन और यज्ञोपवीत संस्कार के बाद इसे धारण करना एक नई जिम्मेदारी और ज्ञान के प्रति समर्पण का संकेत होता था। हालांकि आज यह परंपरा केवल विशेष पूजा-पाठ या कर्मकांडों तक सीमित रह गई है, लेकिन इसकी वैज्ञानिक जड़ें आज भी उतनी ही मजबूत हैं।

विज्ञापन

प्राणशक्ति का संरक्षण

प्राणशक्ति का संरक्षण7 / 8

हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार, शिखा बांधने से व्यक्ति की शारीरिक और प्राणशक्ति का क्षय नहीं होता। यह व्यक्ति के भीतर सहनशक्ति और आत्मविश्वास पैदा करती है। पुराने समय में चुटिया में गांठ लगाना इस बात का संकल्प होता था कि जब तक कार्य पूर्ण नहीं होगा, मन विचलित नहीं होगा। यह अनुशासन और संकल्प शक्ति को दर्शाने का एक बहुत ही सरल और प्रभावी तरीका था।

क्यों खत्म हुआ रिवाज?

क्यों खत्म हुआ रिवाज?8 / 8

आज के समय में चुटिया रखने का चलन बहुत कम हो गया है। इसका सबसे बड़ा कारण पश्चिमी संस्कृति का अंधानुकरण और आधुनिक लाइफस्टाइल है। भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग बालों के रखरखाव को झंझट समझने लगे हैं। इसके अलावा, सामाजिक संकोच के कारण भी युवा इसे अपनाने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि यह 'पुराना' या 'अजीब' फैशन है, जबकि वे इसके पीछे के ठोस फायदों से अनजान हैं।

विज्ञापन

न्यूज 24 पर पढ़ें देश,राष्ट्रीय समाचार (National News),खेल,मनोरंजन,धर्म,लाइफ़स्टाइल,हेल्थ,शिक्षा से जुड़ी हर खबर। ब्रेकिंग न्यूज और लेटेस्ट अपडेट के लिए News 24 App डाउनलोड कर अपना अनुभव शानदार बनाएं।

First published on:

और पढ़ें: हमारे संपादकीय दिशानिर्देश और मानक यहाँ देखें।

लेखक के बारे में

Shyamnandan

Shyamnandan

श्यामनंदन कुमार News24.com में चीफ सब-एडिटर के पद पर कार्यरत हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले श्यामनंदन ज्योतिष, अंक शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, पर्व-त्योहार सहित भारतीय धर्म-संस्कृति के जानकार पत्रकार हैं. उन्होंने पत्रकारिता में एम.ए. की पढ़ाई काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से की है और ज्योतिष का अध्ययन भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से किया है. अपने पेशे में डिजिटल करियर की शुरुआत उन्होंने एनडीटीवी कन्वर्जेंन्स के साथ की. श्यामनंदन हिंदुस्तान टाइम्स, बंसल न्यूज (भोपाल) जैसे न्यूज प्लेटफॉर्म्स के साथ भी जुड़े रहे हैं. उन्होंने देश के प्रसिद्ध संतों के सत्संग और समागम की रिपोर्टिंग की है.
... और पढ़ें
विज्ञापन