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Ganga Avataran: गंगा का धरती पर अवतरण एक असाधारण घटना थी, लेकिन भगवान राम के पूर्वज राजा भागीरथ के अटूट संकल्प ने इस असंभव को संभव बनाया। जानें गंगा अवतरण की वह रोचक कथा, जिसमें तपस्या, त्याग और मानव कल्याण की अद्भुत गाथा छिपी है।
गंगा अवतरण कथा

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Ganga Avataran: भारत की संस्कृति और आस्था की जीवनधारा कही जाने वाली माँ गंगा का धरती पर आना कोई साधारण घटना नहीं थी। यह एक राजा के अटूट संकल्प, देवताओं के त्याग और मानव कल्याण की अद्भुत गाथा है। पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, स्वर्ग में बहने वाली देवनदी गंगा को मृत्युलोक में लाना असंभव माना जाता था। लेकिन राजा भगीरथ की तपस्या ने ब्रह्मांड के नियमों को बदल दिया और मानवता को पापों से मुक्ति दिलाने वाली पावन धारा प्राप्त हुई।
राजा सगर के 60,000 पुत्रों का उद्धार

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गंगा के अवतरण की कहानी अयोध्या के राजा सगर से शुरू होती है। एक समय राजा सगर ने अश्वमेध यज्ञ किया, जिसका घोड़ा इंद्र ने चुराकर कपिल मुनि के आश्रम में बांध दिया। घोड़े की तलाश में आए सगर के 60,000 पुत्रों ने मुनि का अपमान किया। क्रोधित होकर कपिल मुनि ने उन सभी को भस्म कर दिया। उन भटकती हुई आत्माओं को मोक्ष दिलाने का एकमात्र रास्ता स्वर्ग से गंगा को लाकर उनकी राख को स्पर्श कराना था।
भगीरथ ने की घोर तपस्या

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सगर के वंशज राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की शांति के लिए राजपाट त्याग दिया और हिमालय में तपस्या शुरू की। उनकी हजारों वर्षों की कठोर साधना से ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए। ब्रह्मा जी ने अपने कमंडल से गंगा को छोड़ने की बात तो मान ली, लेकिन एक बड़ी समस्या सामने आई। गंगा का वेग इतना प्रचंड था कि यदि वे सीधे स्वर्ग से धरती पर गिरतीं, तो पूरी पृथ्वी पाताल में समा जाती।
शिव जी ने थामा गंगा का वेग

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पृथ्वी को विनाश से बचाने के लिए भगीरथ ने भगवान शिव की शरण ली। जब गंगा अहंकार के साथ स्वर्ग से उतरीं, तो महादेव ने उन्हें अपनी जटाओं में कैद कर लिया। गंगा कई वर्षों तक शिव की जटाओं में ही भटकती रहीं। भगीरथ के फिर से प्रार्थना करने पर शिव जी ने अपनी एक जटा खोली, जिससे गंगा शांत होकर सात धाराओं में प्रवाहित हुईं। यही कारण है कि शिव को 'गंगाधर' भी कहा जाता है।
जानें जाह्नवी और भागीरथी के नाम का रहस्य

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धरती पर आने के बाद गंगा भगीरथ के पीछे-पीछे चलने लगीं। रास्ते में जब वे जाह्नू ऋषि के आश्रम से गुजरीं, तो उनके वेग से ऋषि का सामान बह गया। क्रोधित होकर ऋषि ने पूरी गंगा को पी लिया। भगीरथ के अनुनय-विनय पर ऋषि ने गंगा को अपने कान से बाहर निकाला, जिससे उनका नाम 'जाह्नवी' पड़ा। चूंकि इसे लाने का श्रेय भगीरथ को जाता है, इसलिए इन्हें 'भागीरथी' भी कहा जाता है।
कब मनाते हैं गंगा दशहरा?

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माना जाता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को ही गंगा का धरती पर स्पर्श हुआ था। इस दिन को आज भी हम 'गंगा दशहरा' के रूप में बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। हरिद्वार, काशी और ऋषिकेश में इस दिन लाखों श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं। मान्यता है कि इस दिन गंगा स्नान करने से मनुष्य के दस तरह के पाप धुल जाते हैं और उसे अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
इसलिए गंगा में करते हैं अस्थि विसर्जन

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भगीरथ गंगा की धारा को उस स्थान तक ले गए जहां उनके पूर्वजों की राख पड़ी थी। जैसे ही गंगा के जल ने सगर के पुत्रों के अवशेषों को छुआ, उनकी आत्माओं को तत्काल मोक्ष मिल गया। आज भी हिंदू धर्म में अस्थि विसर्जन के लिए गंगा को सबसे पवित्र माना जाता है। गंगा का जल न केवल प्यास बुझाता है, बल्कि यह करोड़ों लोगों की आध्यात्मिक चेतना को भी शुद्ध करता है।