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भारत जैसा एक बड़ा देश जहां लोकतंत्र है और सत्ता का केंद्र जनता के हाथ में होना हमें सामान्य लगता है, लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि यह विचार पहली बार दुनिया में कहां पर पनपा था? लोकतंत्र का इतिहास कोई एक दिन का नहीं है बल्कि सदियों पुराने संघर्षों और किए गए प्रयोगों का ही परिणाम है. दुनिया में शाशन की सबसे ताकतवर व्यवस्था की शुरुआत कैसे और कब हुई और प्राचीन दौर में आम नागरिक कैसे अपने भविष्य का फैसला खुद करते थे आज इस खबर में हम इसी पर चर्चा करेंगे.
कहां है लोकतंत्र का उद्गम स्थल?

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जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो लोकतंत्र की सबसे पहली झलक प्राचीन यूनान, खासकर एथेंस शहर में मिलती है. 5वीं सदी ईसा पूर्व के आस-पास एथेंस के नागरिकों ने शासन की एक ऐसी व्यवस्था बनाई थी, जिसने पूरी दुनिया की सोच को बदल कर रख दिया. उस दौर के राजा-महाराजाओं के शासन के विपरित एक क्रांतिकारी कदम था. उस समय लोकतंत्र को शासन का सबसे न्यायपूर्ण तरीका माना गया, जहां किसी एक व्यक्ति की सनक के बजाय सामूहिक सहमति को प्राथमिकता दी गई थी.
कौन लेता था फैसले?

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प्राचीन एथेंस के लोकतंत्र और आज के लोकतंत्र में सबसे बड़ा अंतर सीधे तौर पर भागीदारी का था. उस दौर में लोकतंत्र का मतलब था कि आम नागरिक खुद सभाओं में शामिल होकर राज्य के कानून और नीतियों पर सीधे वोट करते थे. इसे सीधा लोकतंत्र कहा जाता है. बता दें कि उस समय वहां पर कोई भी प्रतिनिधि नहीं चुना जाता था, नागरिक खुद ही विधायिका की भूमिका निभाते थे और अहम फैसले पर अपनी राय देते थे.
बदलाव के साथ बढ़ी आधुनिक व्यवस्था

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वक्त के साथ लोकतंत्र का स्वरूप तेजी से बदला. अब एथेंस के सीधे लोकतंत्र की जगह अब प्रतिनिधि लोकतंत्र ने ले ली. आज हम खुद अपने फैसले नहीं लेते हैं, बल्कि अपने प्रतिनिधि को चुनकर विधानसभा या ससंद में भेजते हैं, जो हमारे लिए कानून बनाते हैं. भारत में आधुनिक लोकतंत्र की शुरूआत आजादी के बाद हुई थी, जब 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ और देश एक पूर्ण लोकतांत्रिक गणराज्य बना. आज यह व्यवस्था दुनिया के लगभग हर देश में अपनी जड़े जमा चुकी है.
सीमित था लोकतंत्र का दायरा

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हालांकि एथेंस का लोकतंत्र क्रांतिकारी था, लेकिन यह अपने दायरे में सीमित भी था. आज के लोकतंत्र में जैसे सभी वयस्क नागरिकों को वोट देने का अधिकार मिला हुआ है, वैसा वहां नहीं होता था. उस दौर की व्यवस्था में सिर्फ योग्य पुरुष नागरिक ही सभाओं में हिस्सा लेने के हकदार होते थे. बता दें कि महिलाएं, दास, गुलाम और बाहर से आकर वहां बसने वाले लोगों को इस निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखा गया था. इसलिए यह लोकतंत्र आज की व्यापक अवधारणा की तुलना में काफी संकुचित हुआ करता था.
लोकतंत्र की ताकत

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लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी इसमें निहित जनता की शक्ति है. यह व्यवस्था इसलिए भी खास है क्योंकि यह आम आदमी को देश की सत्ता का असली मालिक बनाती है और लोगों को उनका हक देती है. मान लीजिए कि अगर जनता द्वारा चुना गया कोई नेता या फिर सरकार उनकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतरती है तो जनता को उन्हें अगले चुनाव में हटाने का पूरा अधिकार होता है.