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Justice Yashwant Verma Resignation: जस्टिस यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद एक अहम सवाल खड़ा हो गया है कि क्या भ्रष्टाचार के आरोप किसी जज की पेंशन को रोक सकते हैं? किन परिस्थितियों में रोकी जाती है पेंशन, इस्तीफे और रिटायरमेंट में क्या है अंतर?
जस्टिस वर्मा ने राष्ट्रपति को सौंपा इस्तीफा

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जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद से अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंप दिया है. दिल्ली हाईकोर्ट से जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट में ट्रांसफर किया गया था. दिल्ली में उनके आवास पर कथित तौर पर जले हुए नोट मिलने के बाद उनपर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे, जिसका उन्होंने खंडन किया था.
इलाहाबाद हाईकोर्ट में छोटा रहा कार्यकाल

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जस्टिस वर्मा ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज पद पर पिछले साल अप्रैल में ही शपथ ली थी, इस तरह उनका कार्यकाल यहां एक साल का ही रहा. इस्तीफे के कारणों का खुलासा नहीं हो पाया है. इस्तीफे में उन्होंने परिस्थितियों पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की. पद पर सेवा करने को सम्मान बताया.
क्या इस्तीफे के बाद मिलती है पेंशन?

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हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज के इस्तीफे को भारतीय कानून के मुताबिक, रिटायरमेंट के बराबर मानते हैं, इसलिए जस्टिस यशवंत वर्मा को भी इस्तीफे के पास पेंशन के सभी लाभ मिलेंगे, जब तक उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप साबित नहीं हो जाते.
क्या कहता है कानून, कब रोकी जाती है पेंशन

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कानून के मुताबिक, किसी जज को दोषी साबित करने से पहले तक उनके सभी पेंशन लाभ जारी रहते हैं. जांच चलने के दौरान भी ये जारी रहेंगे. अगर जज किसी गंभीर या आपराधिक मामले में दोषी साबित हो जाते हैं तो नियम के अनुसार सरकार उनकी ग्रेच्यूटी और पेंशन को रोक सकती है.