मुगल काल की इमारतें, शहर, भाषा, खानपान और संस्कृति आज भी भारत की पहचान का हिस्सा हैं. जानिए क्यों मुगल विरासत को पूरी तरह मिटाना आसान नहीं है.
आज भी जिंदा है मुगल विरासत

2 / 5
भारत में मुगल शासन खत्म हुए करीब 300 साल बीत चुके हैं, लेकिन उनकी बनाई इमारतें, शहरों की संरचना, खानपान, भाषा और कला आज भी लोगों की जिंदगी का हिस्सा हैं. दिल्ली, आगरा, लाहौर और लखनऊ जैसे शहरों में मुगल दौर की छाप साफ दिखाई देती है. यही वजह है कि इतिहास और राजनीति की बहस में मुगल विरासत हमेशा चर्चा में रहती है.
ताजमहल और लाल किला बने भारतीय पहचान के प्रतीक

3 / 5
मुगल काल में बनी कई ऐतिहासिक इमारतें आज भारत की वैश्विक पहचान बन चुकी हैं. ताजमहल दुनिया के सात अजूबों में शामिल है, जबकि लाल किला हर साल स्वतंत्रता दिवस समारोह का केंद्र बनता है. ये स्मारक सिर्फ टूरिस्ट प्लेस नहीं बल्कि भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं.
दिल्ली की सड़कों और बाजारों में दिखती है मुगल छाप

4 / 5
पुरानी दिल्ली की गलियां, चांदनी चौक, जामा मस्जिद और कई ऐतिहासिक बाजारों में मुगल काल की छाप साफ नजर आती है. मुगलों ने शहरों को व्यवस्थित तरीके से बसाया और बाजार, बाग-बगीचे, किलों का निर्माण कराया. आज भी इन इलाकों में लाखों लोग रहते और कारोबार करते हैं. भारत के फेमस फूड्स जैसे बिरयानी, कबाब, निहारी और शाही पनीर मुगल रसोई से जुड़े माने जाते हैं. इसके अलावा उर्दू भाषा के विकास में भी मुगल दौर की अहम भूमिका रही. हिंदी फिल्मों, साहित्य और संगीत में आज भी इसकी छाप नजर आती है.
हिंदुत्व राजनीति में क्यों अहम है मुगल मुद्दा?

5 / 5
पिछले कुछ सालों में मुगल इतिहास को लेकर राजनीतिक विवाद बढ़े हैं. कुछ राज्यों में पाठ्यपुस्तकों से मुगल अध्याय हटाने या नाम बदलने जैसी पहल भी हुई हैं. वहीं इतिहासकारों का कहना है कि भारत के इतिहास को किसी एक दौर या शासक से अलग करके नहीं देखा जा सकता. हिंदुत्व राजनीति में मुगल शासन को विदेशी आक्रमण और धार्मिक संघर्ष के संदर्भ में पेश किया जाता है. कई राजनीतिक दल और संगठन इसे सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं. इसी कारण इतिहास, स्मारकों और नामों को लेकर बहस चुनावी राजनीति का भी हिस्सा बन जाती है.
(All Photos Credit: Social Media)