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दुनिया में ज्यादातर लोगों को किताबें पढ़ने का काफी शौक होता है. किताबों की दुनिया में कुछ ऐसी अनमोल धरोहरें भी मौजूद हैं, जिनकी कीमत सिर्फ पैसों से नहीं आंकी जा सकती है. आज हम एक ऐसी ही किताब के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसे दुनिया की सबसे कीमती और दुर्लभ किताबों में से एक कहा जाता है.
गूटेनबर्ग बाइबिल

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बता दें कि इस किताब का नाम है गूटेनबर्ग बाइबिल. ये सिर्फ एक धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि मानव सभ्यता और ज्ञान के इतिहास में एक क्रांतिकारी बदलाव का भी प्रतीक मानी जाती है. यही कारण है कि इसकी कीमत आज करोड़ों रुपये नहीं बल्कि अरबों रुपये तक है.
कहां और कब बनी थी ये किताब?

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मिली जानकारी के अनुसार, गूटेनबर्ग बाइबिल को लगभग वर्ष 1455 में जर्मनी के मेनज शहर में बनाया गया था. इसे योहानेस गूटेनबर्ग ने छापा था, जिन्हें आधुनिक प्रिंटिंग प्रेस का जनक कहा जाता है. ये पहली ऐसी बड़ी पुस्तक थी जिसे मूवेबल टाइप प्रिंटिंग तकनीक के जरिए तैयार किया गया था. उस दौर में किताबें हाथ से लिखी जाती थीं, जिनमें काफी समय और मेहनत लगती थी, लेकिन गूटेनबर्ग की इस नई तकनीक ने किताबों को छापना आसान बना दिया और ज्ञान के प्रसार को एक नई गति भी दी.
क्यों खास है ये किताब?

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ये बाइबिल लैटिन भाषा के वल्गेट संस्करण पर आधारित थी. माना जाता है कि उस समय इसकी लगभग 180 प्रतियां छापी गई थीं. हालांकि समय के साथ इनमें से ज्यादातर नष्ट हो गई. आज केवल 49 प्रतियां ही पूरी या आंशिक रूप से बची हैं. यही दुर्लभता इसे दुनिया की सबसे खास किताबों में शामिल करती है.
किताब में देखने को मिलेगी बेहतरीन कलाकारी

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इस किताब की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ इसकी उम्र नहीं, बल्कि इसकी अद्भुत कलात्मकता भी है. हर पृष्ठ बेहद सुंदर ढंग से तैयार किया गया था. इसमें हाथों से बनाए गए रंगीन अक्षर, इसकी शानदार सजावट और बारीक कलाकारी देखने को मिलती है. उस दौर के कलाकारों ने इसमें इल्लुमिनेशन तकनीक का प्रयोग किया था, जिसके तहत पन्नों को रंगीन डिजाइनों और सुनहरे अक्षरों से सजाया गया था. इसके अलावा हाई क्वालिटी वाले कागज और इंक का भी इस्तेमाल इसे खास बनाता है.
कितनी है इसकी कीमत?

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आज के समय में इसकी कीमत का अनुमान 25 मिलियन डॉलर से लेकर 150 मिलियन डॉलर तक है. वहीं, भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग 200 करोड़ से लेकर 1250 करोड़ रुपये तक पहुंचती है. हालांकि इसकी वास्तविक कीमत तय करना लगभग असंभव माना जाता है, क्योंकि यह सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि इतिहास का एक अमूल्य हिस्सा भी है.
खुले बाजार में नहीं होगी बिक्री

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दिलचस्प बात यह है कि इतनी महंगी होने के बावजूद यह किताब शायद कभी खुले बाजार में बिक्री के लिए न आए. इसकी अधिकांश प्रतियां दुनिया की प्रतिष्ठित लाइब्रेरी, संग्रहालयों और विश्वविद्यालयों में सुरक्षित रखी गई हैं. कई देशों ने इसे अपनी सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा माना है. इसलिए निजी खरीद-फरोख्त की संभावना बेहद कम है.
आखिरी बार कब बिकी थी ये किताब?

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इतिहास में आखिरी बार एक पूरी गूटेनबर्ग बाइबिल 1978 में बेची गई थी. उस समय इसकी कीमत लगभग 2.4 मिलियन डॉलर थी, जो उस दौर में बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी. लेकिन आज विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इसकी कोई संपूर्ण प्रति नीलामी में आए, तो उसकी कीमत 100 मिलियन डॉलर से भी अधिक हो सकती है.