दुनिया भर से आ रही खबरों के बीच स्विट्जरलैंड से जो खबर आ रही है उस पर सभी को ध्यान देने की जरूरत है. यूरोप और अमेरिका में अब कई वहां के गोरे लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है और ये गुस्सा इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि उनके यहां बाहर से लोग आ कर बसने लगे हैं. इन्हें ये भी लगने लगा है कि जो लोग बाहर से आकर उनके यहां बस रहे हैं वो उनकी संस्कृति को खत्म कर रहे हैं और उनका अपना ही देश अब अपना नहीं लग रहा है.
स्विट्जरलैंड में हो रही अमेरिका जैसी पॉलिटिक्स?

2 / 6
अमेरिका में तो इस तरह की पॉलिटिक्स देखने को कई बार मिल चुकी है. अब ये यूरोप के भी कई देशों में शुरू हो गई है. पहले के समय में तो कम ही नेता इस तरह की पॉलिटिक्स का सहारा लेकर वोट पाने के जुगाड़ में रहते थे लेकिन अब इनकी संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और अब कई देशों में इस एजेंडे को लेकर कई पार्टियां खड़ी हो गई हैं. वो राजनीति कर रहे हैं कि बाहर वालों को बाहर करो. जो भी गोरा नहीं है वो उनके लिए बाहर वाला है. ऐसे नेताओं को ज्यादा दिक्कत होती है अफ्रीका से आए लोगों से, सीरिया से आए लोगों से, इराक से आए लोगों से, म्यांमार के लोगों से, बांग्लादेश से आए लोगों से, पाकिस्तान से आए लोगों से और इस पॉलिटिक्स की चपेट में भारतीय भी आ ही जाते हैं.
भारतीय भी हैं निशाने पर?

3 / 6
कई भारतीय भी यूरोप की कई कंपनियों में नौकरी करते हैं. हालांकि भारतीयों को तो वहां की IT कंपनियां ही बुलाती हैं. कई डॉक्टर्स और नर्स भी होती हैं जिन्हें वहां काम करने के लिए बुलाया जाता है, क्योंकि वहां नर्सों की कमी है. आज कर टीचर्स भी जा रहे हैं. यानी कई वो काम हैं जिन्हें करने के लिए वहां लोग नहीं हैं या उन लोगों में वो काबिलियत नहीं है, या वो लोग वो काम करना नहीं चाहते. तो बाहर से लोग जा कर वो काम करते हैं.
स्विट्जरलैंड के लोग खुद कानून पर कर सकते हैं वोट

4 / 6
स्विट्जरलैंड में नेता खुलकर नस्लवाद की बात तो नहीं करते हैं, लेकिन वो ये तर्क देते हैं कि ये वहां की संस्कृति बिगाड़ रहे हैं. तो स्विट्जरलैंड में भी कई ऐसे नेता खडे़ हो चुके हैं. बता दें कि स्विट्जरलैंड में चुनावों के अलावा रेफरेंडम भी होता है. वहां डायरेक्ट डेमोक्रेसी है. मतलब वहां लोग किसी भी कानून पर खुद वोट कर सकते हैं.
क्या है जनमत संग्रह का नियम?

5 / 6
जनमत संग्रह एक तरह का नियम होता है जिसमें अगर किसी मुद्दे पर अगर 18 महीने के अंदर यानी डेढ़ साल के अंदर एक लाख लोग दस्तखत कर देते हैं तो फिर उस मुद्दे पर पूरे देश में वोटिंग होती है. फिर इस मामले में संसद फैसला नहीं लेती है बल्कि पूरा देश फैसला लेता है.
स्विट्ज़रलैंड में बढ़ रही बुजुर्गों की संख्या?

6 / 6
स्विट्जरलैंड के गोरे लोगों में जवानों की संख्या कम होती जा रही है और बुज़ुर्गों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. तो काम धंधा चलाने के लिए तो वहां बाहर से आए हुए लोग चाहिए नहीं तो उनकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी धीमी पड़ सकती है. लेकिन संसाधन बचाने के नाम पर वहां के नेता इस तरह की पॉलिटिक्स कर रहे हैं.