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भारत में आज के समय में कई दर्जन साबुन के ब्रांड हैं. जिसमें कई नहाने के हैं और कई कपड़े धोने के साबुन भी शामिल हैं. लेकिन एक साबुन ऐसा है जिसका इतिहास काफी पुराना और रोचक है. ये है नौलखा साबुन (Naulakha Sabun History), जो आज भी कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. नौलखा साबुन की शुरुआत आजादी से कई दशक पहले हुई थी. इस साबुन ने बंटवारा भी झेला है. आज हम इसके बारे में जानेंगे कि इसकी शुरुआत आखिर किसने की थी.
131 साल पहले हुई थी शुरुआत

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भारतीय स्वतंत्रता के समय घरेलू बाजार में बहुत कम FMCG प्रोडक्ट बिकते थे और जो उपलब्ध भी थे, उनमें से बहुत कम की क्वालिटी अच्छी मानी जाती थी. लेकिन नौलखा साबुन शुरूआत से ही अपने ग्राहकों के बीच बहुत ही ज्यादा लोकप्रिय और चर्चा में रहा है और इसकी शुरुआत 1895 में की गई थी.
इसके पीछे था 14 साल के लड़के का दिमाग

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बता दें कि ये कहानी तब शुरू हुई थी जब लाधा मल जैन (Ladha Mal Jain) महज 14 साल के थे, लेकिन अपना खुद का बिजनेश शुरू करने के आइडिया को लेकर बहुत ही उत्साहित थे. लाधा अक्सर अपने दोस्तों के साथ बैठकर बिजनेस के बारे में बातें करते रहते थे. तभी उन्हें किसी ने सुझाव दिया कि कपड़े धोने का साबुन बनाना एक बेहतरीन आइडिया है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज है जो खराब नहीं होती और हर घर में खूब इस्तेमाल होती है. इसी आइडिया ने उस युवा लड़के को प्रेरणा दी.
एक कड़ाही से की शुरुआत

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लाधा मल ने एक बड़ी कड़ाही (बर्तन) खरीदी, कुछ जरूरी सामान लिया और प्रयोग करना शुरू कर दिया. कई बार प्रयास और गलतियों के बाद, आखिरकार वह साबुन का एक ठोस टुकड़ा बनाने में कामयाब हो गए. उनका साबुन न सिर्फ कपड़े साफ करने में असरदार था, बल्कि हाथों के लिए भी कोमल था. लेकिन शुरूआत में यह कोई ब्रांडेड प्रोडक्ट नहीं था. फिर भी ईंट के आकार का वह हल्के पीले रंग का साबुन लाहौर और उसके आस-पास के इलाकों में तेजी से फेमस हुआ. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तब व्यापारियों और स्टॉकिस्टों ने इसे पूरे उत्तर भारत में बेचना शुरू कर दिया.
बंटवारे के बाद भारत आ गए

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लाधा मल को तेजी से सफलता मिली. इसके बाद उन्होंने जल्द ही एक छोटा-सा कारखाना शुरू कर दिया. लेकिन 1947 में देश के बंटवारे के बाद उनके परिवार को रातों-रात अपना घर और उत्पादन यूनिट्स छोड़कर भागना पड़ा था. खाली हाथ और बिना किसी जमा-पूंजी के यह परिवार अंबाला में कुछ समय बिताने के बाद पुरानी दिल्ली आ गए.
दिल्ली में जमाया अपना कारोबार

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भाररत आकर लाधा मल का परिवार बर्बादी के कगार पर था, क्योंकि पैसा नहीं था, फिर हुआ एक चमत्कार. दिल्ली के एक साबुन व्यापारी ने, जिसने लाधा मल से साबुन की एक बड़ी खेप खरीदी थी, उनसे संपर्क किया और उनका बकाया पैसा चुका दिया. लाधा मल ने तुरंत दिल्ली में सदर थाना रोड पर दो मंजिला मकान किराए पर लिया. परिवार ऊपर रहता और नीचे साबुन बनाना शुरू कर दिया गया. पूरे परिवार ने फिर से कारोबार शुरू किया और सफलता हासिल की.
कैसे मिला साबुन को नाम?

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लाधा मल ने साबुन की बट्टी को हल्के गुलाबी रंग के बटर पेपर में लपेटने का फैसला किया और उसका नाम नौलखा साबुन रखा. ये कंपनी आज भी चल रही है जिसमें कम से कम 200 कर्मचारी काम करते हैं. कंपनी मैन्युफैक्चरिंग के अलावा एक्सपोर्ट और सप्लायर के तौर पर भी काम करती है.