बकरीद के मौके पर पाकिस्तान में एक खास समुदाय को धार्मिक पाबंदियों का सामना करना पड़ता है. कुर्बानी करने पर जेल, जुर्माना और पुलिस कार्रवाई तक का खतरा बना रहता है. आइए जानते हैं आखिर ऐसा नियम क्यों है और किसपर है.
पाकिस्तान में इस मुस्लिम समुदाय पर बैन

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दुनियाभर में मुस्लिम समुदाय बकरीद की तैयारियों में जुटा है, लेकिन पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय के लोगों के लिए यह त्योहार आसान नहीं होता. यहां कई जगहों पर उन्हें कुर्बानी करने और धार्मिक परंपराएं निभाने पर कानूनी पाबंदियों का सामना करना पड़ता है.
1974 के कानून ने बदल दी अहमदियों की पहचान

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पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय पर लगी पाबंदियों की शुरुआत साल 1974 से मानी जाती है. उस समय संविधान में बदलाव करके अहमदिया समुदाय को आधिकारिक तौर पर गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया था, जिसके बाद उनकी धार्मिक स्वतंत्रता सीमित होती चली गई.
अध्यादेश XX के बाद और सख्त हुए नियम

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साल 1984 में पाकिस्तान सरकार ने अध्यादेश XX लागू किया, जिसने अहमदिया समुदाय पर कई नई रोक लगा दीं. इस नियम के तहत उन्हें इस्लामी शब्द, धार्मिक प्रतीक और कई परंपराओं का इस्तेमाल करने से भी रोका गया. यहां तक कि पूजा स्थल को मस्जिद कहना भी विवाद का कारण बन सकता है.
कुर्बानी करने पर दर्ज हो सकता है केस

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इस समुदाय को लेकर नियम इतने ज्यादा सख्त हैं कि, पाकिस्तान के कानून के अनुसार अगर कोई अहमदी व्यक्ति बकरीद पर जानवर की कुर्बानी करता है, तो इसे इस्लामी परंपराओं की नकल माना जा सकता है. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 298-B और 298-C के तहत मामला दर्ज किया जा सकता है, जिसमें जेल और जुर्माने का प्रावधान है.
त्योहार से पहले पुलिस करती है निगरानी

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कई मीडिया रिपोर्ट्स और मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक बकरीद से पहले कुछ इलाकों में प्रशासन अहमदिया परिवारों पर विशेष नजर रखता है. कई बार उनसे हलफनामा भरवाने या जमानती बांड साइन करवाने की बात भी सामने आती रही है, ताकि वह कुर्बानी में हिस्सा न ले सके.
घरों की हो जाती है तलाशी

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रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि कुछ मामलों में पुलिस ने अहमदिया समुदाय के घरों की तलाशी ली और कुर्बानी के लिए रखे गए जानवरों को जब्त कर लिया. कई बार ईद से जुड़े मांस को भी कब्जे में लेने के आरोप लगे हैं, जिससे समुदाय में डर का माहौल बना रहता है.
अहमदिया समुदाय को क्यों नहीं मानते मुस्लिम

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अहमदिया समुदाय के लोग खुद को मुसलमान मानते हैं, लेकिन मुख्यधारा के मुस्लिम विद्वान उन्हें इस्लाम से खारिज करते हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि अहमदिया संप्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद (1835-1908) ने खुद को एक नबी (पैगंबर) घोषित किया था. जबकि मुख्यधारा के मुस्लिम मानते हैं कि इस्लामी मान्यता के अनुसार हजरत मुहम्मद आखिरी पैगंबर (खातिम-अन-नबीय्यीन) थे और उनके बाद कोई दूसरा पैगंबर नहीं आ सकता. (Image:Pexels/AI)