भारत अपनी विविधताओं और अनोखी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाली जनजातियों के रीति-रिवाज आम समाज से काफी अलग और दिलचस्प होते हैं. ऐसा ही एक अनोखा रंग छत्तीसगढ़ के आदिवासी अंचलों में देखने को मिलता है, जहां शादी से पहले युवक-युवतियों को एक-दूसरे को समझने और अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी आजादी दी जाती है. यहां की सदियों पुरानी एक खास परंपरा के तहत परिवार की सहमति से लड़के-लड़कियों को साथ समय बिताने का मौका मिलता है, जिसे सामाजिक रूप से बेहद पवित्र माना जाता है.
क्या है यह पारंपरिक घोटुल?

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छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में रहने वाली मुरिया और माड़िया जनजाति के बीच यह अनोखी प्रथा निभाई जाती है, जिसे 'घोटुल' कहा जाता है. दरअसल, घोटुल गांव के किनारे मिट्टी और लकड़ी से बनाई गई एक बड़ी सी झोपड़ी या कुटिया होती है. इसे आदिवासियों का एक पारंपरिक सामाजिक केंद्र माना जा सकता है, जहां समुदाय के युवा इकट्ठा होते हैं. इस जगह पर गांव के बुजुर्गों की देखरेख में लड़के और लड़कियों को एक-दूसरे से मिलने-जुलने, बातचीत करने और आपसी तालमेल को बेहतर ढंग से समझने का पूरा अवसर दिया जाता है.
युवाओं के खास कबीलाई नाम

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इस खास परंपरा में शामिल होने वाले युवक-युवतियों को समुदाय में कुछ अलग और विशेष नाम दिए जाते हैं. जो भी कुंवारी लड़कियां घोटुल का हिस्सा बनती हैं उन्हें 'मोतियारी' और लड़कों को 'छेलिक' कहकर पुकारा जाता है. इस समूह को सही ढंग से चलाने के लिए एक कमेटी बनाई जाती है जिसमें लड़कियों की प्रमुख को 'बेलोसा' और लड़कों के मुखिया को 'सरदार' कहा जाता है. ये मुखिया ही घोटुल के भीतर अनुशासन और सभी व्यवस्थाओं को बनाए रखने की जिम्मेदारी संभालते हैं.
आदिवासियों का बैचलर्स

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अगर इस प्रथा को और भी आसान शब्दों में समझें तो घोटुल को आदिवासियों का एक तरह का 'बैचलर्स डोरमिटरी' या युवा गृह भी कहा जाता है. यहां कबीले के लड़के-लड़कियां शाम ढलते ही जमा होते हैं और रात का बसेरा करते हैं. हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा के नियम थोड़े भिन्न हैं. कुछ इलाकों में युवा रात भर घोटुल में ही रुकते हैं, जबकि कुछ गांवों में दिनभर साथ वक्त बिताने, नाच-गाने और बातचीत के बाद सभी लड़के-लड़कियां सोने के लिए अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं.
बुजुर्ग करते हैं युवाओं का मार्गदर्शन

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आदिवासियों के लिए घोटुल सिर्फ एक मिलने जुलने की जगह नहीं बल्कि यह इन जनजातियों का एक बड़ा सांस्कृतिक स्कूल भी है. यहां युवाओं को अपनी जाति से जुड़ी हर तरह की धार्मिक आस्थाएं, पारंपरिक लोक नृत्य, संगीत, कला और पूर्वजों की कहानियां के बारे में भी बताया जाता है. इस दौरान कबीले के अनुभवी और वरिष्ठ नागरिक भी वहां मौजूद रहते हैं. बुजुर्गों की उपस्थिति का मकसद युवाओं पर पहरा देना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी समृद्ध संस्कृति से रूबरू कराना, उनका मार्गदर्शन करना और उन्हें उत्सव के लिए प्रेरित करना होता है.
बेहद शानदार ढंग से होती है उत्सव की शुरुआत

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जैसे ही शाम होती है, कबीले के लड़के-लड़कियां टोली बनाकर लोक गीत गाते हुए घोटुल की तरफ बढ़ने लगते हैं. इस उत्सव की शुरुआत बेहद शानदार ढंग से होती है, जहां समुदाय के विवाहित पुरुष बड़े-बड़े ढोल बजाते हैं और युवा उस थाप पर थिरकते हैं. नाच-गाने के बाद सभी लोग छोटे-छोटे समूहों में बैठकर आपस में बातचीत करते हैं और गांव की समस्याओं पर चर्चा करते हैं. इसी मेल-मिलाप के दौरान युवाओं को एक-दूसरे को जानने और अपना पार्टनर चुनने का मौका मिलता है, जो आज के प्रॉम नाइट जैसा लगता है.
फूल लगाकर होता है रिश्ते का ऐलान

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इस परंपरा का एक बेहद खूबसूरत नियम नाम बदलने से जुड़ा हुआ है. कहा जाता है कि जब कोई लड़का और लड़की घोटुल का हिस्सा बनते हैं, तो उन्हें वहां इस्तेमाल के लिए एक नया गुप्त नाम दिया जाता है. जब कोई लड़का किसी लड़की को पसंद करता है और लड़की भी अपनी सहमति दे देती है, तो रिश्ता पक्का माना जाता है. इसके बाद लड़का बड़ी ही शालीनता से लड़की के बालों में एक सुंदर फूल लगा देता है, जो इस बात की सार्वजनिक घोषणा होती है कि दोनों ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया है.
7 दिन में चुनते हैं जीवनसाथी

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घोटुल की इस अनोखी प्रथा में शामिल होने के लिए युवाओं की एक निश्चित उम्र भी तय की गई है. नियमों के अनुसार, लड़कों की उम्र कम से कम 21 साल और लड़कियों की उम्र 18 साल होनी चाहिए. शुरुआत में जब नए लड़के-लड़कियां इस माहौल में आते हैं, तो वे थोड़े झिझकते हैं. उनकी इस हिचकिचाहट को दूर करने के लिए उन्हें पूरे 7 दिनों का समय दिया जाता है. इन 7 दिनों में प्रत्येक युवक और युवती को अलग-अलग लोगों से बात करने और अपनी पसंद का सही जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट मिलती है.