सावधान! कहीं फल-सब्जियां तो नहीं दे रही कैंसर? नई रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

हम सभी अपनी डाइट को लेकर काफी सतर्क रहते हैं. अपनी डाइट में हम फलों, सब्जियों और साबुत अनाज को भी शामिल करते हैं जिससे हमारे शरीर को प्रोटीन और विटामिन्स मिलते हैं. लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि फलों, सब्जियों और अनाज से भी किसी को कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है? आप भी सुनकर चौंक गए ना. बता दें कि दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (USC) के शोधकर्ताओं ने अध्ययन किया है, जिसमें यह दावा किया गया है.

fruits and vegetable
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फेफड़ों के कैंसर का बढ़ रहा जोखिम

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बता दें कि इस अध्ययन में दावा किया गया है कि फलों, सब्जियों और साबुत अनाज से भरपूर डाइट, युवा और धूम्रपान न करने वाले लोगों में फेफड़ों के कैंसर के बढ़ते जोखिम से जुड़ी हो सकती है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इसकी वजह ये खाद्य पदार्थ खुद नहीं हैं, बल्कि पारंपरिक तरीकों से उगाई गई फसलों पर इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक हैं.

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187 मरीजों पर किया गया अध्ययन

187 मरीजों पर किया गया अध्ययन3 / 7

यह अध्ययन, जो 187 मरीजों के खान-पान के विश्लेषण, धूम्रपान और जनसांख्यिकीय आंकड़ों पर आधारित था, अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च की 2026 की वार्षिक बैठक में प्रस्तुत किया गया. इन मरीजों में 50 वर्ष या उससे कम उम्र में फेफड़ों के कैंसर का पता चला था. 'हेल्दी ईटिंग इंडेक्स' का इस्तेमाल करके—जो 100 में से डाइट की क्वालिटी को स्कोर करता है- शोधकर्ताओं ने पाया कि प्रतिभागियों का औसत स्कोर 65 था, जो US के औसत 57 से काफी ज्यादा है. इन युवा मरीजों ने आम अमेरिकियों की तुलना में गहरे हरे रंग की सब्ज़ियां, फलियां और साबुत अनाज ज्यादा मात्रा में खाए. इस समूह की महिलाओं का स्कोर खास तौर पर ज्यादा था.

फलों, सब्जियों और साबुत अनाजों में कीटनाशकों के अवशेष

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फॉक्स न्यूज डिजिटल के अनुसार, इस स्टडी का नेतृत्व करने वाले केके मेडिसिन के USC नॉरिस कॉम्प्रिहेंसिव कैंसर सेंटर के MD जॉर्ज नीवा ने कहा, 'व्यावसायिक रूप से उगाए गए (गैर-ऑर्गेनिक) फलों, सब्जियों और साबुत अनाजों में डेयरी, मांस और कई प्रोसेस्ड फ़ूड की तुलना में कीटनाशकों के अवशेष ज्यादा होने की संभावना होती है.'

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फसलों पर इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक के कारण हो रहा कैंसर?

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शोधकर्ताओं का मानना ​​है कि पारंपरिक तरीकों से उगाई गई फसलों पर इस्तेमाल होने वाले कीटनाशक ही इस बीमारी के संबंध की वजह हो सकते हैं. नीवा ने यह भी बताया कि जो कृषि मजदूर कीटनाशकों के संपर्क में आते हैं, उनमें फेफड़ों के कैंसर की दर ज्यादा होती है. नीवा के अनुसार, 'फेफड़ों के कैंसर के मरीजों का एक बड़ा समूह ऐसा है, जिनकी बीमारी की वजह धूम्रपान नहीं है.'

50 साल और उससे कम उम्र में आम होता जा रहा कैंसर

50 साल और उससे कम उम्र में आम होता जा रहा कैंसर6 / 7

अध्ययन के अनुसार, 50 साल और उससे कम उम्र के उन लोगों में कैंसर ज्यादा आम होता जा रहा है जो धूम्रपान नहीं करते, खासकर महिलाओं में. उन्होंने आगे कहा, 'इन मरीजों ने अपनी बीमारी का पता चलने से पहले, आम अमेरिकियों की तुलना में कहीं ज्यादा सेहतमंद खाना खाया होता है.' उन्होंने कहा, 'हमें इस बात को समझने के लिए रिसर्च का समर्थन करने की जरूरत है कि आखिर क्यों अमेरिकी और खासकर महिलाएं - जो अब ज्यादा धूम्रपान नहीं करतीं, उन्हें भी फेफड़ों का कैंसर हो रहा है.' उन्होंने आगे कहा, 'इसके अलावा, सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों ने खुद ही इसमें शामिल होने का फैसला किया था, और इस वजह से सर्वे के नतीजों में कुछ पक्षपात हो सकता है.'

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पिछली रिसर्च में ये बात आई थी सामने

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पिछली रिसर्च में इस बढ़ोतरी की वजह वायु प्रदूषण और हार्मोन में गड़बड़ी पैदा करने वाले केमिकल्स को बताया गया था. नए डेटा से पता चलता है कि खान-पान—खास तौर पर उन चीजों से पेस्टिसाइड का संपर्क जिन्हें 'हेल्दी फ़ूड' माना जाता है- भी इसकी एक और वजह हो सकता है.

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लेखक के बारे में

Versha Singh

Versha Singh

वर्षा स‍िंह News 24 ड‍िजिटल में बतौर सीन‍ियर सब एड‍िटर के पद पर कार्यरत हैं. वर्षा को ड‍िजिटल मीड‍िया में 6 साल से अधि‍क का अनुभव है. राष्‍ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय और समसमाय‍िक व‍िषयों पर वर्षा की अच्‍छी पकड़ है. इसके अलावा राजनीत‍िक, क्राइम और ट्रेंडिंग खबरें भी ल‍िखती हैं. वर्षा ने मास्टर इन न्यू मीडिया टेक्नोलॉजी की पढ़ाई माखन लाल चतुर्वेदी यूनिवर्सिटी, भोपाल से की है और जर्नलिज्म एवं मास कम्युनिकेशन में स्नातक की डिग्री लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की है. वर्षा अपने करियर में Jagran New Media, Asia News International (ANI) और ETV Bharat जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी हैं. उन्हें हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन और समसामयिक घटनाओं, राजनीति, हाइपरलोकल खबरों और मानवीय रुचि से जुड़ी कहानियों को डिजिटल दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने का अनुभव है.
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