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दुनिया भर की नदियों और झीलों में बढ़ता प्रदूषण अब जलीय जीवों के लिए एक ऐसी मुसीबत बन गया है जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था. इंसानों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे नशीले पदार्थों के अवशेष अब पानी के रास्ते बेजुबान मछलियों के शरीर तक पहुंच रहे हैं.
कैसे टल्ली हो रही हैं मछलियां?

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स्वीडन के वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि कोकीन और उसके केमिकल पानी में मिलकर मछलियों के व्यवहार को पूरी तरह बदल रहे हैं. प्रदूषित पानी में रहने वाली मछलियां और शार्क इन रसायनों को अपने शरीर में सोख रही हैं जिससे उनमें नशे जैसा असर दिख रहा है.
क्या कहता है वैज्ञानिकों का अध्ययन?

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अटलांटिक सैल्मन मछलियों पर किए गए प्रयोग के नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे जो हाल ही में करंट बायोलॉजी मैगजीन में प्रकाशित हुए हैं. कोकीन वाले पानी में रहने वाली मछलियां सामान्य मछलियों के मुकाबले ज्यादा बेचैन रहती हैं और अपनी दिशा भूलकर दूर तक निकल जाती हैं.
क्यों भटक रही हैं सैल्मन मछलियां?

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रिसर्च के दौरान देखा गया कि जिन मछलियों के शरीर में कोकीन का केमिकल मौजूद था वे हर हफ्ते सामान्य मछलियों से करीब दो गुना ज्यादा दूरी तय कर रही थीं. दो महीने बाद ये मछलियां अपने तय ठिकाने से लगभग 32 किलोमीटर दूर तक भटकती हुई पाई गईं.
क्या है कोकीन का पानी में असर?

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इंसानों पर नशे का असर कुछ ही घंटों में खत्म हो जाता है लेकिन कोकीन का मुख्य केमिकल बेंजॉइलेकोगोनिन पानी में लंबे समय तक टिका रहता है. यही वजह है कि यह केमिकल मछलियों के शरीर में ज्यादा वक्त तक रहता है और उनकी हरकतों को असामान्य बना देता है.
क्यों बढ़ रही है वैज्ञानिकों की चिंता?

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विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा भटकने की वजह से मछलियां खुद शिकारियों का आसान शिकार बन सकती हैं जिससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ सकता है. अब सरकारों को जल प्रदूषण पर सख्त कदम उठाने की जरूरत है ताकि कोकीन जैसे जहर को जलीय जीवन बर्बाद करने से रोका जा सके.