दरअसल, वाराणसी में भूकंप के दौरान मिट्टी के दलदल में बदलने (साइल लिक्विफैक्शन) के खतरे पर वैज्ञानिक अध्ययन पूरा हो गया है। स्टडी रिपोर्ट के साथ एक नक्शा बनाया गया है, जिसमें बताया गया है कि भूकंप के तेज झटकों में शहर के कौन-कौन से इलाकों की मिट्टी दल-दल बन सकती है और वे धंस सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने की वाराणसी की डीप स्टडी

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पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने मॉडर्न GIS मैपिंग और AHP टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल से वाराणसी की स्टडी की और नक्शा तैयार किया। इस नक्शे में उन इलाकों को चिह्नित किया गया है, जिनकी मिट्टी भूकंप आने पर पानी के दबाव से दलदल जैसी हो सकती है। पिछले सप्ताह जर्मनी के मशहूर स्प्रिंगर नेचर डिस्कवर जियोसाइंस में रिसर्च प्रकाशित हुई है।
मिट्टी के दलदल बनने की वजह गंगा नदी

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वैज्ञानिकों ने नक्शे के साथ जारी रिपोर्ट में इस संकट की वजह भी बताई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जब किसी इलाके में नदी के किनारे पर ढीली रेतीली मिट्टी होती है और भूजल स्तर काफी ऊपर होता है तो भूकंप के तेज झटकों के कारण मिट्टी अपनी पकड़ खो देती है। तब जमीन ठोस नहीं रहती, बल्कि पानी के साथ मिलकर दलदल या गाद बन जाती हैं, जिसमें कई इमारतें धंस सकती हैं।
6 मानकों के आधार पर स्टडी की गई

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वैज्ञानिकों ने वाराणसी की स्टडी 6 मानकों के आधार पर की। इनमें जमीन के अंदर 3 मीटर, 6 मीटर, 9 मीटर और 12 मीटर की गहराई पर मिट्टी के प्रकार, भूजल स्तर और भूकंपीय तरंगों की गति आदि शामिल हैं। 6 महीने तक राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के डॉ. अनुराग तिवारी, डॉ जेएल गौतम, BHU जियोफिजिक्स के प्रो. जीपी सिंह ने स्टडी की, जिसमें पता चला कि यहां जमीन के नीचे गहरे जलोढ़ यानी नदी द्वारा बहाकर लाई गई ढीली मिट्टी के बड़े-बड़े ढेर हैं।
स्टडी में दलदली मिली वाराणसी की मिट्टी

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स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, वाराणसी में अगर मिट्टी दलदल बनी तो गंगा किनारे की बलुआ और दोमट मिट्टी इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार (37.9 प्रतिशत) होगी। क्योंकि शहर के 7.52 प्रतिशत हिस्से में जमीन के नीचे 3 मीटर की गहराई पर मिट्टी दलदली है। 27.18 प्रतिशत इलाके की मिट्टी दलदल के मुहाने पर खड़ी है। वहीं 32.20 प्रतिशत इलाके की मिट्टी को समय रहते दलदल बनने से रोका जा सकता है। क्योंकि जमीन में गहराई बढ़ने पर मिट्टी ज्यादा होने के कारण उसके दलदल बनने का खतरा कम है, लेकिन दक्षिणी हिस्से में गंगा किनाने बने BHU-सुसुवाही कारिडोर पर धंसने का खतरा मंडर रहा है।
आपदा प्रबंधन विभाग को अलर्ट किया

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वैज्ञानिकों की स्टडी और नक्शा वाराणसी जैसे घनी आबादी वाले और तेजी से विकसित हो रहे शहर के लिए चेतावनी है। साथ ही शहर के भविष्य के लिए एक गाइड मैप भी है। इसे भविष्य में स्मार्ट सिटी के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का मौका मिलेगा। मेट्रो चलाने, मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बनाने और आपदा प्रबंधन के लिए नीति बनाने में मदद मिलेगी। रिसर्च टीम ने अपनी रिपोर्ट और नक्शा केंद्रीय मंत्रालय को सौंप दिया है। BHU और राज्य सरकार को भी रिपोर्ट दे दी गई है। को भी साझा की गई है।