
1 / 6
देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹3 की हालिया बढ़ोतरी से जनता अभी संभल भी नहीं पाई थी कि अंतरराष्ट्रीय मोर्चे से भारत के लिए एक बेहद बुरी खबर आ गई है। रविवार (17 मई) को अमेरिकी प्रशासन ने रूस से समुद्र के रास्ते आने वाले कच्चे तेल पर दी गई प्रतिबंधों की छूट (Sanctions Waiver) को खत्म कर दिया है। एक तरफ पश्चिम एशिया (मिड-ईस्ट) में ईरान युद्ध के कारण तेल की सप्लाई पहले से ही बाधित है, वहीं दूसरी तरफ अब भारत के लिए सस्ता रूसी तेल खरीदना भी जोखिम भरा हो गया है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि इस दोहरे झटके का आपकी जेब पर क्या असर होने वाला है।
भारत का सबसे बड़ा महंगाई कवच टूटा!

2 / 6
पिछले दो साल से रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना हुआ था। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने रूस से रिकॉर्ड सस्ता तेल खरीदा, जिसने देश में महंगाई को बढ़ने से रोके रखा। मई में भारत रूस से रोजाना 23 लाख बैरल तेल आयात कर रहा था (कुल आयात का लगभग आधा)। लेकिन अमेरिकी छूट खत्म होने से अब भारतीय रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल खरीदना बेहद मुश्किल हो जाएगा।
होर्मुज संकट और $105 का डबल अटैक

3 / 6
रूस पर प्रतिबंध ऐसे समय में लौटे हैं जब ईरान युद्ध के कारण दुनिया का सबसे मुख्य तेल मार्ग, होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पहले से ही ठप पड़ा है। इस तनाव की वजह से जहाजों का बीमा महंगा हो गया है और वैश्विक बाजार में कच्चा तेल $72 से उछलकर $105 प्रति बैरल के पार चला गया है। यानी अब न तो मिड-ईस्ट से तेल लाना सुरक्षित है और न रूस से लाना आसान।
क्या फिर बढ़ेंगे पेट्रोल, डीजल और LPG के दाम?

4 / 6
भारत अपनी जरूरत का 85 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। सस्ता रूसी तेल बंद होने से भारत का तेल आयात बिल भारी भरकम हो जाएगा। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची रहीं, तो सरकारी तेल कंपनियों के पास रिटेल कीमतों (पेट्रोल, डीजल, एलपीजी) को एक बार फिर से बढ़ाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
क्या फिर लौटेगा वर्क फ्रॉम होम का दौर?

5 / 6
ऊर्जा विशेषज्ञों (Energy Economists) का मानना है कि यदि यह तेल संकट लंबा खिंचा, तो सरकार तेल की खपत कम करने के लिए कड़े कदम उठा सकती है। आने वाले दिनों में ईंधन बचाने के लिए कंपनियों को वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) को बढ़ावा देने, दफ्तरों की टाइमिंग बदलने और गैर-जरूरी यात्राओं पर रोक लगाने जैसी पुरानी तरकीबों पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
फैक्ट्रियों में ताले और एक्सपोर्ट पर संकट

6 / 6
एक्सपर्ट्स के मुताबिक, तेल महंगा होने से देश के भीतर ट्रांसपोर्टेशन और विदेशों में माल भेजने का भाड़ा बहुत बढ़ गया है। लागत बढ़ने के कारण कई छोटे और कम प्रतिस्पर्धी निर्माताओं ने उत्पादन धीमा कर दिया है। वे नए माल बनाने के बजाय पुराना स्टॉक बेचकर काम चला रहे हैं, जिससे इस सेक्टर में कंसॉलिडेशन (कंपनियों के बंद होने या विलय) का खतरा बढ़ गया है।