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पश्चिम बंगाल सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव नतीजों से पहले त्रिशंकु विधानसभा की चर्चा तेज हो गई है. जब किसी एक पार्टी या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तब सरकार बनाने की प्रक्रिया संवैधानिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बेहद अहम हो जाती है. ऐसे हालात में सबसे बड़ी पार्टी, पोस्ट-पोल गठबंधन, निर्दलीय समर्थन और राज्यपाल की भूमिका सभी चर्चा के केंद्र में आ जाते हैं.
त्रिशंकु विधानसभा क्या होती है?

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त्रिशंकु विधानसभा वह स्थिति होती है जब चुनाव के बाद किसी भी एक पार्टी या पहले से बने गठबंधन को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता. बहुमत का मतलब है कुल सीटों के आधे से एक ज्यादा सीटें, ताकि सरकार स्थिर रूप से बनाई जा सके. ऐसी स्थिति में किसी एक दल के लिए अकेले सत्ता बनाना संभव नहीं रह जाता.
बहुमत का नियम क्या है?

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हर विधानसभा में सरकार बनाने के लिए साधारण बहुमत जरूरी होता है. उदाहरण के तौर पर, अगर विधानसभा में 294 सीटें हैं, तो बहुमत के लिए कम से कम 148 सीटें चाहिए होती हैं. अगर कोई दल या गठबंधन इस आंकड़े तक नहीं पहुंचता, तो स्थिति त्रिशंकु मानी जाती है.
सबसे बड़ी पार्टी को मौका

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त्रिशंकु स्थिति में आमतौर पर सबसे बड़ी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने का मौका दिया जाता है. राज्यपाल उस दल के नेता को आमंत्रित कर सकते हैं और उसे बहुमत साबित करने के लिए समय दिया जाता है. यह समय सीमित होता है और इस दौरान समर्थन जुटाना पड़ता है.
बहुमत साबित कैसे होता है?

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सरकार बनाने के दावे के साथ दल को विधानसभा में अपना बहुमत दिखाना पड़ता है.
यह बहुमत फ्लोर टेस्ट के जरिए साबित किया जाता है. अगर संख्या पूरी नहीं होती, तो सरकार गिर सकती है या दावा अस्वीकार किया जा सकता है.
पोस्ट-पोल गठबंधन का रास्ता

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कई बार चुनाव के बाद दल आपस में समझौता करके नया गठबंधन बना लेते हैं. इसे पोस्ट-पोल अलायंस कहा जाता है. ऐसे समझौते में छोटे दल भी अहम भूमिका निभा सकते हैं क्योंकि उनकी सीटें सत्ता का गणित बदल देती हैं.
अल्पमत सरकार का विकल्प

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कभी-कभी कोई पार्टी बाहर से मिले समर्थन के सहारे सरकार बना लेती है. इसे अल्पमत सरकार कहा जाता है. ऐसी सरकारें अक्सर कमजोर मानी जाती हैं, क्योंकि समर्थन वापस लेते ही उनका बहुमत खत्म हो सकता है.
राज्यपाल की भूमिका

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त्रिशंकु विधानसभा में राज्यपाल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है. वह पहले सबसे बड़ी पार्टी, फिर गठबंधन और जरूरत पड़ने पर दूसरे विकल्पों पर विचार कर सकते हैं. राज्यपाल का फैसला संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर रहकर सरकार गठन की दिशा तय करता है.
राजनीतिक सौदेबाजी क्यों बढ़ती है?

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जब किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो छोटे दलों और निर्दलीयों की ताकत बढ़ जाती है. ऐसे हालात में मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और मंत्री पदों पर भी बातचीत होती है. इसी वजह से त्रिशंकु विधानसभा को राजनीतिक अनिश्चितता और सौदेबाजी का दौर माना जाता है.