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जब तमिलनाडु में हुआ ‘हिंदी विरोधी आंदोलन’, CM स्टालिन के ताजा बयान ने 1965 के जख्मों को किया हरा

सीएम एमके स्टालिन के बयान ने तमिलनाडु में हिंदी को लेकर पुरानी बहस को नई जान दे दी है. रविवार को डीएमके ने चेन्नई में 'भाषा शहीद दिवस' मनाया. इस दौरान स्टालिन ने हिंदी विरोधी आंदोलन के शहीदों को याद किया.

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हिंदी भाषा को लेकर साउथ इंडिया में अक्सर विवाद सामने आते रहते हैं. उत्तर भारतीयों को जबरन स्थानीय भाषा में बात करने के लिए मजबूर करना हो या राज्य सरकारों द्वारा भाषा पर राजनीति करने का मामला हो. हिंदी को लेकर साउथ के कई राज्यों में ये विवाद नया नहीं है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने हाल ही में हिंदी को लेकर एक ताजा बयान दिया, जिसने फिर से भाषा विवाद की चिंगारी को हवा दे दी है. सीएम स्टालिन ने तमिलनाडु में कई दशकों पहले हुए हिंदी विरोधी आंदोलन की भी याद दिलाई, जिसमें करीब 70 लोगों की जान चली गई थी.

सीएम MK स्टालिन ने जख्मों को किया हरा

सीएम एमके स्टालिन के बयान ने तमिलनाडु में हिंदी को लेकर पुरानी बहस को नई जान दे दी है. रविवार को डीएमके ने चेन्नई में ‘भाषा शहीद दिवस’ मनाया. इस दौरान स्टालिन ने हिंदी विरोधी आंदोलन के शहीदों को याद किया और एक्स पर लिखा, ‘हिंदी के लिए न तब थी जगह, न अब है, न कभी होगी.’ स्टालिन ने पोस्ट में कहा कि तमिलनाडु अपनी भाषा से जीवन रक्षा जैसा लगाव रखता है. हिंदी थोपने के हर प्रयास का बहादुरी से मुकाबला किया. शहीदों को नमन करते हुए उन्होंने 1965 आंदोलन का वीडियो शेयर किया, जिसमें अन्नादुरै और करुणानिधि का जिक्र था.

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तमिलनाडु का 1937 से 1965 तक का हिंसक इतिहास


आंदोलन 1937 में शुरू हुआ, जब सी राजगोपालाचारी ने मद्रास प्रांत में हिंदी लागू करने की कोशिश की. द्रविड़ कषगम का विरोध हिंसा में बदल गया. उस दौरान इस हिंसक प्रदर्शन में दो लोगों की मौतें हुईं. एक बार फिर जब 1965 में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव आया तो दक्षिणी राज्य उफान पर आए. मदुरै में प्रदर्शनकारियों ने कांग्रेस दफ्तर जला दिया. इस प्रदर्शन में आठ लोगों जिंदा जला दिया गया, जबकि दो हफ्ते में 70 से ज्यादा मौतें दर्ज कई गईं और हजारों गिरफ्तारियां हुईं. 25 जनवरी को काले झंडे फहराए गए. पश्चिम बंगाल तक विरोध फैला.

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नेहरू और शास्त्री को हटना पड़ा पीछे


प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पहले प्रधानमंत्री नेहरू को हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने के अभियान से पीछे हटना पड़ा. इसके बाद इंदिरा गांधी सरकार ने राजभाषा अधिनियम संशोधित कर अंग्रेजी को सहायक भाषा का दर्जा दिया. तमिलनाडु ने तमिल-अंग्रेजी नीति अपनाई लेकिन हिंदी को राज्य द्वारा कभी अपनाया नहीं गया. आज भी राज्य में हिंदी भाषा का नाम सुनते ही लोगों में आक्रोश फैल जाता है.

First published on: Jan 25, 2026 05:22 PM

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About the Author

Akarsh Shukla

आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला ने India.com (ZEE Media), 'नवोदय टाइम्स' (पंजाब केसरी ग्रुप), 'ओपेरा न्यूज' और 'वनइंडिया' (डेली हंट) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करके अपनी व्यापक पत्रकारिता क्षमता का परिचय दिया। उनकी विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी अनुभव है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

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आकर्ष शुक्ला (Akarsh Shukla) एक अनुभवी पत्रकार हैं, जो पिछले 12 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। वर्तमान में वो News 24 Digital टीम को शिफ्ट हेड के तौर पर लीड कर रहे हैं। आकर्ष शुक्ला ने India.com (ZEE Media), 'नवोदय टाइम्स' (पंजाब केसरी ग्रुप), 'ओपेरा न्यूज' और 'वनइंडिया' (डेली हंट) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करके अपनी व्यापक पत्रकारिता क्षमता का परिचय दिया। उनकी विशेषज्ञता प्रिंट, डिजिटल मीडिया (वेबसाइट) और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से खबरों को सजीव और प्रभावी रूप में पेश करने में है। देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरों के साथ-साथ आकर्ष को मनोरंजन, लाइफस्टाइल, ट्रेंडिंग और खेल जगत की खबरों का भी बखूबी अनुभव है। आकर्ष शुक्ला, पत्रकारिता को सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि समाज की आवाज और जनसंवाद का एक सशक्त माध्यम मानते हैं।

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