इजरायल और हमास के बीच जारी तनाव को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 'गाजा बोर्ड ऑफ पीस' के दूसरे चरण के गठन की घोषणा की है जिसका मुख्य उद्देश्य गाजा में पूरी तरह से शांति स्थापित करना है. इस शांति पहल को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया है. हालांकि गाजा में अभी भी छिटपुट हमलों की खबरें आ रही हैं लेकिन ट्रंप की यह योजना युद्धविराम के ढांचे को मजबूती देने के लिए तैयार की गई है. इस बोर्ड का गठन ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह दुनिया के प्रमुख देशों को साथ लेकर मध्य पूर्व के इस पुराने विवाद को सुलझाना चाहते हैं.
गाजा के पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा बोर्ड
गाजा बोर्ड ऑफ पीस केवल कागजी समझौता नहीं होगा बल्कि इसके पास जमीन पर काम करने की अहम जिम्मेदारी होगी. यह बोर्ड एक तकनीकी समिति के कामकाज की निगरानी करेगा जो गाजा के रोजमर्रा के प्रशासनिक मामलों को संभालेगी. ट्रंप की योजना के अनुसार इस बोर्ड का सबसे बड़ा लक्ष्य गाजा क्षेत्र में स्थिरता लाना और युद्ध से तबाह हुए इलाकों के पुनर्निर्माण के लिए रणनीति बनाना है. इस योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक धनराशि जुटाई जाएगी ताकि गाजा को फिर से रहने लायक और बेहतर बनाया जा सके. शांति और विकास के इस मॉडल में भारत जैसे देशों की भागीदारी से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि राहत और निर्माण कार्य निष्पक्ष तरीके से पूरे हों.
यह भी पढ़ें: PM मोदी ने 3 अमृत भारत एक्सप्रेस को दिखाई हरी झंडी, जानें किन-किन जिलों को मिलेगा फायदा?
सदस्यता की शर्तें और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी
अमेरिका ने भारत के अलावा कम से कम चार अन्य प्रभावशाली देशों को भी इस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए बुलाया है. इस योजना के चार्टर के अनुसार सदस्यता के लिए कुछ आर्थिक शर्तें भी रखी गई हैं. यदि कोई देश इस शांति बोर्ड में स्थायी सदस्यता चाहता है तो उसे पुनर्निर्माण कोष में 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देना होगा. वहीं जो देश आर्थिक प्रतिबद्धता नहीं जताना चाहते उनके लिए तीन साल की सदस्यता का विकल्प रखा गया है जिसमें कोई वित्तीय शर्त अनिवार्य नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि इस बोर्ड के लिए पाकिस्तान को भी न्योता मिलने की खबरें हैं जिसकी पुष्टि खुद वहां के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने की है. इस तरह अमेरिका एक बड़ा गठबंधन बनाकर गाजा की समस्या का हल निकालने की कोशिश में है.
विश्व मंच पर बढ़ता भारत का प्रभाव
भारत को मिला यह निमंत्रण वैश्विक राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी और भारत के बढ़ते कद का सीधा प्रमाण है. वर्तमान में जब दुनिया कई युद्धों और संघर्षों से जूझ रही है ऐसे में अमेरिका का भारत पर भरोसा करना यह दिखाता है कि भारत एक संतुलित और जिम्मेदार देश के रूप में उभरा है. मिडिल ईस्ट की स्थिरता में भारत का सक्रिय भागीदार बनना न केवल भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों को भी सुरक्षा देगा. ट्रंप की इस पहल और भारत की संभावित एंट्री से गाजा में शांति की उम्मीदें पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं. अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत इस बोर्ड में अपनी भूमिका को किस तरह आगे बढ़ाता है.
इजरायल और हमास के बीच जारी तनाव को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए अमेरिका ने एक बड़ा कदम उठाया है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘गाजा बोर्ड ऑफ पीस’ के दूसरे चरण के गठन की घोषणा की है जिसका मुख्य उद्देश्य गाजा में पूरी तरह से शांति स्थापित करना है. इस शांति पहल को सफल बनाने के लिए अमेरिका ने भारत को भी इस बोर्ड में शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया है. हालांकि गाजा में अभी भी छिटपुट हमलों की खबरें आ रही हैं लेकिन ट्रंप की यह योजना युद्धविराम के ढांचे को मजबूती देने के लिए तैयार की गई है. इस बोर्ड का गठन ट्रंप की उस रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वह दुनिया के प्रमुख देशों को साथ लेकर मध्य पूर्व के इस पुराने विवाद को सुलझाना चाहते हैं.
गाजा के पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा बोर्ड
गाजा बोर्ड ऑफ पीस केवल कागजी समझौता नहीं होगा बल्कि इसके पास जमीन पर काम करने की अहम जिम्मेदारी होगी. यह बोर्ड एक तकनीकी समिति के कामकाज की निगरानी करेगा जो गाजा के रोजमर्रा के प्रशासनिक मामलों को संभालेगी. ट्रंप की योजना के अनुसार इस बोर्ड का सबसे बड़ा लक्ष्य गाजा क्षेत्र में स्थिरता लाना और युद्ध से तबाह हुए इलाकों के पुनर्निर्माण के लिए रणनीति बनाना है. इस योजना के तहत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवश्यक धनराशि जुटाई जाएगी ताकि गाजा को फिर से रहने लायक और बेहतर बनाया जा सके. शांति और विकास के इस मॉडल में भारत जैसे देशों की भागीदारी से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाएगी कि राहत और निर्माण कार्य निष्पक्ष तरीके से पूरे हों.
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सदस्यता की शर्तें और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी
अमेरिका ने भारत के अलावा कम से कम चार अन्य प्रभावशाली देशों को भी इस बोर्ड का हिस्सा बनने के लिए बुलाया है. इस योजना के चार्टर के अनुसार सदस्यता के लिए कुछ आर्थिक शर्तें भी रखी गई हैं. यदि कोई देश इस शांति बोर्ड में स्थायी सदस्यता चाहता है तो उसे पुनर्निर्माण कोष में 1 अरब अमेरिकी डॉलर का योगदान देना होगा. वहीं जो देश आर्थिक प्रतिबद्धता नहीं जताना चाहते उनके लिए तीन साल की सदस्यता का विकल्प रखा गया है जिसमें कोई वित्तीय शर्त अनिवार्य नहीं है. दिलचस्प बात यह है कि इस बोर्ड के लिए पाकिस्तान को भी न्योता मिलने की खबरें हैं जिसकी पुष्टि खुद वहां के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने की है. इस तरह अमेरिका एक बड़ा गठबंधन बनाकर गाजा की समस्या का हल निकालने की कोशिश में है.
विश्व मंच पर बढ़ता भारत का प्रभाव
भारत को मिला यह निमंत्रण वैश्विक राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी और भारत के बढ़ते कद का सीधा प्रमाण है. वर्तमान में जब दुनिया कई युद्धों और संघर्षों से जूझ रही है ऐसे में अमेरिका का भारत पर भरोसा करना यह दिखाता है कि भारत एक संतुलित और जिम्मेदार देश के रूप में उभरा है. मिडिल ईस्ट की स्थिरता में भारत का सक्रिय भागीदार बनना न केवल भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह क्षेत्र में भारत के रणनीतिक हितों को भी सुरक्षा देगा. ट्रंप की इस पहल और भारत की संभावित एंट्री से गाजा में शांति की उम्मीदें पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई हैं. अब दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि भारत इस बोर्ड में अपनी भूमिका को किस तरह आगे बढ़ाता है.